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आंबेडकर ने क्यों क़सम खाई थी कि वे हिंदू धर्म में नहीं मरेंगे?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 14 April 2017, 12:31 IST

डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की आज 126वीं जयंती है. उनकी विरासत पर दावा करने वाले आंबेडकर की अपने-अपने तरीके से व्याख्या करते हैं. ये ऐसा दौर है जब यूपी में दलित की बेटी यानी बसपा सुप्रीमो मायावती का करियर सबसे बुरे दौर में है. इसके बावजूद आंबेडकर की विरासत पर सियासत का दौर ख़त्म नहीं हुआ है. एक साल पहले दलित चिंतक और वरिष्‍ठ पत्रकार दिलीप मंडल से कैच न्यूज़ के चारु कार्तिकेय ने आरएसएस और आंबेडकर को लेकर कुछ ज्वलंत सवाल किए थे. पढ़िए इस इंटरव्यू के कुछ अंश:

आंबेडकर की विरासत को आरएसएस द्वारा कब्‍जाए जाने को आप कैसे देखते हैं?

जहां तक दलितों का सवाल है, आरएसएस और आंबेडकर दो विपरीत ध्रुव हैं. हिंदू धर्म में व्‍याप्‍त जातिगत असमानताओं पर सबसे तीखा हमला आंबेडकर ने मनुस्‍मृति को जला कर किया था. दूसरी ओर यही मनुस्‍मृति आरएसएस की आत्‍मा है. संघ आखिर कैसे आंबेडकर द्वारा किए गए इसके तीखे विरोध को पचा पाएगा?

वे टुकड़ों में भले ही उनकी विरासत पर दावा करने में कामयाब हो जाएं, लेकिन समग्र रूप में वे आंबेडकर को अपना नहीं बना पाएंगे.

क्‍या इस कदम का कोई राजनीतिक असर भी होगा?

यह देखना दिलचस्‍प होगा. इस कदम का अनिवार्य उद्देश्‍य यह है कि आरएसएस के खिलाफ दलित प्रतिरोध को निपटाया जा सके और वे काफी मेहनत भी कर रहे हैं. बीजेपी महज 31 फीसदी के बहुमत पर 2014 में सत्‍ता में आई थी और उसे अब यह आधार बढ़ाना है. जाहिर है, कोई भी राजनीतिक दल अपना सामाजिक आधार बढ़ाने की कोशिश करता ही है.

आरएसएस की पृष्‍ठभूमि हालांकि ऐसी है जो जातिगत असमानता को समाप्‍त करने की उसकी घोषणा की ईमानदारी पर ही संदेह पैदा करती है.

आरएसएस ने सभी हिंदुओं के लिए 'एक कुआं, एक मंदिर, एक श्‍मशान' की घोषणा की थी. क्‍या इसका कोई असर होगा?

यह महज नारा है. मंदिरों और कुओं तक दलितों की पहुंच उनकी सबसे बड़ी समस्‍या नहीं है. समस्‍याएं दूसरी हैं मसलन रोजगार और शिक्षा की समस्‍या, जिससे आर्थिक ताकत मिलती है. बीजेपी आखिर इन मोर्चों पर क्‍या कर रही है? एनडीए की सरकार ने सरकारी नौकरियों पर रोक लगा रखी है जो हमेशा से दलितों का सहारा थीं क्‍योंकि निजी क्षेत्र में अब भी आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है.

इसी तरह शिक्षा में यदि सरकारी क्षेत्र के विस्‍तार को बाधित किया गया तो उसका सबसे ज्‍यादा नुकसान दलितों को ही होगा. एनडीए की सरकार दलितों को कई मोर्चे पर नुकसान पहुंचा रही है. जहां तक सामाजिक सुधार का मसला है, तो आरएसएस यदि जातिगत असमानता को खत्‍म करना चाह रहा है तो क्‍या वह अंतरजातीय शादियों को भी प्रोत्‍साहित करेगा?

आरएसएस के भैयाजी जोशी ने कहा था कि आंबेडकर हिंदू दर्शन के नहीं, केवल कर्मकांडों के विरोधी थे

कर्मकांड और दर्शन अलग कैसे हैं? दर्शन ही तो कर्मकांड तक ले जाता है. इन्‍हें यदि अलग करके देखना है, तब आरएसएस को सोचना होगा कि ऐसा क्‍यों है. आंबेडकर ने साफ शब्‍दों में कहा था कि हिंदू धर्म में पैदा होना उनके वश में नहीं था लेकिन उन्‍होंने संकल्‍प लिया था कि वे इस धर्म में मरेंगे नहीं. इसीलिए वे अपने निधन से पहले लाखों हिंदू अनुयायियों के साथ बौद्ध बन गए. अगर इसे हिंदू दर्शन नहीं बल्कि कर्मकांड के विरोध के तौर पर देखा जा रहा है, तो यह गलत बात है.

आरएसएस के सरकार्यवाह कृष्‍ण गोपाल के मुताबिक आंबेडकर ने दावा किया था कि मुसलमान कभी भी भारत को अपनी मातृभूमि नहीं मान सकते. क्‍या यह आंबेडकर के सेकुलर होने पर सवाल खड़ा करता है?

कतई नहीं. आंबेडकर की कही बातों को उस संदर्भ में समझना होगा जिसमें ये कही गई थीं. संदर्भ से काटकर बात को कहना बेईमानी होगी. आखिर हम क्‍यों भूल जाते हैं कि आंबेडकर ने ही संविधान में अल्‍पसंख्‍यकों को अधिकार दिया था और यह भी सुनिश्चित किया था कि धर्म की स्‍वतंत्रता, मूलभूत अधिकार होनी चाहिए?

राष्‍ट्र और राष्‍ट्रीयता पर आंबेडकर के विचारों को पढ़कर हम उन्‍हें बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. एक राष्‍ट्र के लिए वे कहते हैं कि उसे बुरी स्‍मृतियों को भुला देना चाहिए और साझा भविष्‍य का सपना देखना चाहिए. वे साझा खुशी और साझा दुख पर ज़ोर देते हैं.

First published: 14 April 2017, 12:31 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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