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विरोधों और विद्रोहों के बीच अडिग वीरभद्र

राजीव खन्ना | Updated on: 15 July 2016, 8:55 IST
(कैच न्यूज)

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अपने खिलाफ विज्ञापनों और विरोधों के बीच डट कर खड़े दिख रहे हैं. ऐसा लगता है कि समय के साथ वे एक खुद को और प्रासंगिक नेता के तौर पर स्थापित कर रहे हैं.

विपक्षी पार्टी भाजपा उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गाहे-बगाहे निशाना बनाती रहती है जिसकी जांच प्रवर्तन निदेशालय कर रहा है. हाल ही में इस मामले में एक एलआईसी एजेंट आनंद चैहान की गिरफ्तारी हुई है. बावजूद इसके उन्हें अपनी पार्टी का जबर्दस्त अंदरूनी समर्थन देखने को मिला. पार्टी ने एक लाइन का प्रस्ताव पारित करके उनके नेतृत्व में विश्वास जताया है.

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राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब सिंह को ऐसे विषम हालात का सामना करना पड़ रहा है. पिछले तीन दशक से वे ऐसे ही विषम स्थितियों से निपटते आए हैं और हर बार उनसे उबरने में सफल भी रहे हैं. ऐसा क्या है जो सिंह को विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूती से खड़ा रखे हुए है.

वीरभद्र सिंह प्रदेश में एक मात्र प्रभावशाली कांग्रेसी नेता

सबसे पहला तो यही कि सिंह एक मात्र कांग्रेसी नेता हैं, जिनकी पूरे हिमाचल प्रदेश में मास अपील है. प्रदेश में कोई और नेता इतना प्रभावशाली और कद्दावर नहीं है. ज्यादातर नेताओं की लोकप्रियता केवल उनके विधानसभा या संसदीय क्षेत्र तक ही सीमित है.

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शिमला के एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, 'कांग्रेस आलाकमान भी इस बात को मान चुके हैं.' उन्होंने आगे कहा इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि कांग्रेस को बार-बार उन्हीं को अपना राजनीतिक चेहरा बनाना पड़ता है.

पार्टी ने दो बार वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कौलसिंह ठाकुर पर दांव खेला. ठाकुर को यह सोच कर प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष बनाया गया कि वे चुनाव में पार्टी को भारी जीत दिलाएंगे लेकिन दोनों ही बार पार्टी को चुनाव से ठीक पहले वीरभद्र सिंह को आगे करना पड़ा.

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पिछले विधानसभा चुनाव में भी यही हुआ था जब 2012 में सिंह को केंद्रीय मंत्री पद छोड़ना पड़ा था. उन पर और उनके परिवार पर 2009 से 2011 के दौरान अज्ञात स्रोतों से आय से 6.1 करोड़ रुपए की अतिरिक्त संपत्ति जुटाने के आरोप लगे थे.

दूसरी बात जो सिंह के पक्ष में जाती है वह यह कि वह इस समय राज्य में सबसे अनुभवी और कद्दावर कांग्रेसी नेता हैं. जो सिंह का विकल्प हो सकते थे उनके समकक्ष नेताओं में कुछ का तो निधन हो चुका और कुछ सक्रिय राजनीति से दूर हो गए. इनमें सुखराम, नारायणचंद पाराशर, जेबीएल कांची ठाकुरराम लाल आदि के नाम लिए जा सकते हैं. उनकी पीढ़ी के नेताओं में एक मात्र विद्या स्टोक्स ही ऐसी हैं जो अब भी राजनीति में सक्रिय हैं.

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फिलहाल वे भी सिंह के साथ खड़ी हो गईं हैं और आजकल उनकी प्रबल समर्थकों में से एक है

पार्टी के लिए अपरिहार्य बन चुके हैं वीरभद्र

एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक और शिमला के पत्रकार ने बताया कि सिंह और कांग्रेस पार्टी दोनों ही पार्टी के प्रदेश नेतृत्व में दूसरी पंक्ति को नहीं उभरने देना चाहते. सिंह की गैर मौजूदगी में पार्टी में टूट की आशंका बनी रहती है. इस प्रकार सिंह पार्टी के लिए अपरिहार्य बन चुके हैं.

उन्होंने बताया कि पीवी नरसिंहाराव के प्रधानमंत्रित्वकाल में जब सुखराम कैबिनेट मंत्री थे तब वीरभद्र सिंह के नेतृत्व को कड़ी चुनौती मिली थी. उस वक्त प्रदेश में सुखराम को कांग्रेस नेताओं और विधायकों का भारी समर्थन प्राप्त था. परन्तु किस्मत ने सिंह का साथ दिया और दूरसंचार घोटाले में फंसने के बाद सुखराम का राजनीतिक अवसान हो गया.

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आज की तारीख में हिमाचल प्रदेश में उनके कद का कोई नेता नहीं है. उनकी आलोचकों में से एक आशा कुमारी, जिनका नाम भूमि घोटाले में आने से उनकी भी चमक फीकी पड़ गई, हालांकि बाद में उच्च न्यायालय ने उनकी सजा निलम्बित कर दी थी. पार्टी ने हाल ही उन्हें पंजाब इकाई का अध्यक्ष बनाया है और वे राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में व्यस्त रहेंगी.

इस बीच सिंह अपने सबसे बड़े आलोचक विजय सिंह मनकोटिया के कारण थोड़ी मुसीबत में दिखाई दे रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा, उनके कड़े तेवरों के बावजूद वे मुश्किल से ही कहीं ठहरते हैं.

कांग्रेस आलाकमान की नजर में मजबूत नेता

करीब बीस सालों से हिमाचल प्रदेश में पत्रकारिता कर रहे एक पत्रकार ने बताया, 'सिंह के पक्ष में एक और चीज है जाती है. कांग्रेस आलाकमान की नजर में वे एक मजबूत नेता हैं. उन्होंने कभी केंद्रीय नेतृत्व का मुंह नहीं देखा और अपना रास्ता खुद तय किया. किसी और नेता में इस तरह अडिग रहने की खूबी दिखाई नहीं देती. इसीलिए वे न कभी झुके और न ही बाहर हुए.'

यह भी कहा जा रहा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शनों के चलते पार्टी जहां फिर से अपना आधार तलाश रही है, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य में वह नेतृत्व परिवर्तन का जोखिम नहीं उठाएगी.

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शिमला में पार्टी सूत्रों का कहना है कि आलोचनाओं और विभिन्न मोर्चों पर बार-बार निशाना बनाया जाने के बावजूद सिंह ने हर कीमत पर अपनी वफादारी भी साबित की है. इसे ऐसे समझा जा सकता है सिंह ने कई कांग्रेसियों को अलग-अलग बोर्डों और निगमों में अध्यक्ष और उपापध्यक्ष बनाया है. उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में हुए कड़वे अनुभव के बाद भाजपा भी फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है. उसे आशंका है कि अगर सिंह का आधार हिलाने की कोशिश की तो दांव उलटा पड़ सकता है और जन सहानुभूति सिंह के साथ होगी.

चूंकि हिमाचल में वैकल्पिक सरकार चुने जाने की प्रवृत्ति है, भाजपा को उम्मीद है कि अगली सरकार वही बनाएगी.

पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ रणनीति बनाने की बजाय भाजपा को पहले अपने घर में सुधार करना होगा और इसके लिए उसे थोड़ा समय चाहिए. हालांकि वह समय-समय पर सिंह और कांग्रेस सरकार पर शब्द बाण छोड़ती रहती है.

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चौहान की गिरफ्तारी के बाद सिंह द्वारा आनन-फानन में कैबिनेट बैठक बुला कर अपने पक्ष में समर्थन जुटाने की आलोचना करते हुए भाजपा ने सिंह की खिंचाई की. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सिंह ने कहा कांग्रेस को भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अपने मुख्यमंत्री का बचाव नहीं करना चाहिए था ऐसा करके उन्होंने भ्रष्टाचार का ही समर्थन किया है.

यह प्रतिक्रिया तब आई जब बैठक के बाद एक सरकारी प्रवक्ता ने कहा कि भाजपा द्वारा मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांगा जाना न सिर्फ मूर्खता है बल्कि यह भी साबित करता है कि भाजपा कानून को नहीं मानती. बजाय देश की कानून व्यवस्था के प्रति आदर भाव रखने के भाजपा के कुछ छुटभैये नेता लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर आए एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री को अपदस्थ करने के लिए कानूनी प्रक्रिया को धता बता रहे हैं

First published: 15 July 2016, 8:55 IST
 
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