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महाराष्ट्र के जानलेवा सूखे के बीच आशा की किरण दिखाता शिरपुर

अश्विन अघोर | Updated on: 17 April 2016, 21:14 IST
QUICK PILL
  • शिरपुर राज्य के बेहद कम नमी वाला क्षेत्र है जहां बेहद कम बारिश होती है. गुजरते समय के साथ इस तहसील के भूजल का स्तर 120 फीट सेे नीचे तक चला गया था
  • शिरपुर ने वह दौर भी देखा है जब माॅनसून के बाद सालभर फसलों को बनाए रखने में असमर्थ किसान पलायन को मजबूर थे

महाराष्ट्र इस बार लगातार चौथे वर्ष गंभीर सूखे की चपेट में है. पिछले कुछ वर्षों से यहां के कुछ इलाकों में न के बराबर हुई बारिश और गिरते हुए भू-जल के स्तर ने किसानों को उनकी जमीनों को छोड़ने और पशुधन को बेचने के लिये मजबूर कर दिया है. हजारों की संख्या में लोग पानी और नौकरियों की तलाश में मुंबई और पुणे जैसे शहरों का रुख कर चुके हैं.

एक तरफ मराठवाड़ा, विदर्भ, खंदेश और राज्य के उत्तरी हिस्सों की स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है, जिसमें पर्याप्त बारिश होने तक किसी भी प्रकार के सुधार की गुंजाइश नहीं है वहीं दूसरी तरफ धूलिया जिले की शिरपुर तहसील में पीने के अलावा सिंचाई के लिये भी पर्याप्त पानी मौजूद है.

शिरपुर तहसील में पीने के अलावा सिंचाई के लिये भी पर्याप्त पानी मौजूद है

वास्तव में शिरपुर तहसील के किसान दो फसलों की खेती कर रहे हैं. इसके अलावा मुंबई में आने वाली सब्जियों में से 80 प्रतिशत की आपूर्ति भी यहीं से होती है.

लेकिन यहां की घास हमेशा से ही हरी नहीं थी

अबसे करीब एक दशक पहले शिरपुर की स्थिति भी राज्य के अन्य सूखा प्रभावित क्षेत्रों से जुदा नहीं थी. शिरपुर ने वह दौर भी देखा है जब माॅनसून के बाद सालभर फसलों को बनाए रखने में असमर्थ किसान पलायन को मजबूर थे.

यह क्षेत्र राज्य के बेहद कम नमी वाला क्षेत्र है जहां बेहद कम बारिश होती है. समय के साथ इस तहसील के भूजल का स्तर 120 फीट सेे नीचे चला गया था. जमीनों के पर किसानों ने खेती करना बंद कर दिया था फलस्वरूप बड़े पैमाने पर कृषि भूमि बंजर हो गई थी.

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स्थिति हर बीतते दिन के साथ बदतर होती जा रही थी. धूलिया के विधायक अमरीश पटेल अपने क्षेत्र के लोगों की पानी की समस्या का एक स्थायी समाधान खोजने में लगे हुए थे. वर्ष 2003 के मध्य में उन्होंने राज्य सरकार के भूविज्ञान विभाग की एक बेहद सफल जल संरक्षण योजना को कार्यान्वित होते देखा.

पटेल इस योजना की सफलता के जिम्मेदार वरिष्ठ भूविज्ञानी सुरेश खानापुरकर से मिले. इस योजना की क्षमताओं को पहचानते हुए और यह समझते हुए कि यह योजना उनके क्षेत्र के लोगों की दिक्कतों का अंत कर सकती है, पटेल ने खानापुरकर से धूलिया आकर शिरपुर तहसील में एक जल संरक्षण परियोजना पर काम करने का अनुरोध किया. खानापुरकर ने छह महीने बाद होने वाली सेवानिवृत्ति के बाद इस परियोजना को संभालने की हामी भर दी.

खानापुरकर के अनुसार यह क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम माॅनसून पर निर्भर है जो बेहद कम अवधि के लिये सक्रिय होता है. बरसात के कुल 36 दिनों में से 13 दिनों में ही 75 प्रतिशत वर्षा हो जाती है. खानापुरकर कहते हैं, ‘‘जल संसाधनों में भारी मात्रा में गाद जमा होने और जल स्रोतों के अतिशय उपभोग के चलते भूजल-पुर्नभरण किसी भी सूरत में संभव नहीं है. हमने लोगों से बारिश होते ही पानी के लिये न भागने की अपील की ताकि यह पानी जमीन में रिस कर भूगर्भीय जल को रीचार्ज कर सके.’’

इस क्षेत्र के 30 हजार से भी अधिक किसान कई पीढ़ियों से मौजूद भूजल संसाधनों का उपयोग करते आ रहे हैं. 1990 तक इस क्षेत्र में खोदे गए तमाम कुंए सूख चुके थे.

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इस क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना के चलते एक्वीफर रीचार्ज की प्रक्रिया काफी धीमी रहती है क्योंकि बारिश का अधिकतर पानी रुकने की जगह बह जाता है. खानापुरकर बताते हैं, ‘‘इस तहसील का एक-तिहाई क्षेत्र तापी का कछार है और बाकी दक्कन का चट्टानी इलाका. इन दोनों ही बेल्टों में लाखों की संख्या में एक्वीफर विभिन्न स्तरों पर मौजूद हैं. चट्टानी इलाके, कछार के मुकाबले कम समय में रीचार्ज हो जाते हैं.’’

बदला हुआ शिरपुर

खानापुरकर कहते हैं, ‘‘हमने सबसे पहले इस तहसील के सभी गांवों का सर्वेक्षण करने का काम किया. जब तक आप किसी भी क्षेत्र की मिट्टी की संरचना को नहीं जान लेते हैं, तब तक जल संरक्षण के कार्य में वांछित परिणाम नहीं प्राप्त होंगे. एक बार सर्वेक्षण का काम पूरा होने के बाद वास्तविक काम तो 2004 के प्रारंभ में शुरू हुआ. इसमें हमने जल निकायों को गहरा और चौड़ा करने के अलावा गाद से मुक्त किया. मैं वर्षा की प्रत्येक बूंद का उपयोग करते हुए उसे जमीन के नीचे पहुंचाना चाहता था.’’

आठ सालों की कड़ी मेहनत के बाद क्षेत्र के तमाम नाले, नदी, पोखर, झील इत्यादि सहित तमाम जल निकाय वर्ष भर पर्याप्त पानी से भरे रहने लगे. बीते करीब 10 वर्षों से इस तहसील के किसान प्रतिवर्ष दो से तीन फसलों का उत्पादन सफलतापूर्वक कर रहे हैं. इनमें से अधिकतर फलों का उत्पादन करने के साथ उनका निर्यात भी कर रहे हैं.’’

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खानापुरकर कहते हैं, ‘‘मुंबई में इस्तेमाल होने वाली सब्जियों में से 80 प्रतिशत शिरपुर तहसील से आती हैं. छोटे-मोटे कामों की खोज में पुणे और मुंबई का रुख करने वाले हजारों युवा वापस अपने गांवों में आकर अपनी जमीनें जोत रहे हैं. यहां तक कि मात्र दो एकड़ जमीन के मालिक भी करीब 6 लाख रुपये प्रतिवर्ष तक कमाने में सफल हो रहे हैं.’’

प्रारंभिक दौर में इस परियोजना को 149 में से मात्र 35 गांवों में लागू किया गया था जो तहसील का करीब 150 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र कहा जा सकता है. समय के साथ विस्तार के क्रम में इसमें और अधिक गांव जुड़ते गए और अब यह क्षेत्रफल करीब 200 वर्ग किलोमीटर का हो चुका है.

स्रोत की एन्जियोप्लास्टी

समूचे क्षेत्र के वैज्ञानिक अध्ययन के बाद खानापुरकर ने जल संसाधनों को पुनर्जीवित करने और साथ ही एक्वीफर्स को रीचार्ज करने के लिये एक कार्यक्रम तैयार किया. वे कहते हैं, ‘‘इसके पीछे कोई राॅकेट साइंस नहीं है. इसके लिये सिर्फ जल निकायों को वैज्ञानिक पद्धति से गहरा करना, चौड़ा करना और उनमें भरी गाद हो हटाना था ताकि एक्वीफर्स खुल जाएं और वर्षा का जल उनमें से रिस सके. यह सिद्धांत बिल्कुल मनुष्यों पर होने वाली एन्जियोप्लास्टी की ही तरह है. इसी वजह से मैं इसे स्रोत की एन्जियोप्लास्टी कहता हूं.’’

तहसील के सभी जल स्त्रोतों को 5-30 मीटर तक चौड़ा करने के अलावा 10-15 मीटर तक गहरा किया गया. आज इन स्रोतों और झीलों की न्यूनमत भंडारण क्षमता 280 मिलियन क्यूबिक मीटर है और ये अधिकतम 4240 क्युबिक मीटर पानी को सोख सकते हैं.

इस क्रांति ने शिरपुर के निवासियों के जीवन को बदल दिया है. आत्मविश्वास से भरे खानापुरकर कहते हैं, ‘‘ कई लोग इस परियोजना को अपने क्षेत्र में लागू करवाने के इच्छुक हैं और मेरे पास निरंतर उनके अनुरोध आ रहे हैं. और हमनें ऐसा राज्य के कई अन्य हिस्सों में प्रारंभ भी कर दिया है जिसके सकारात्मक परिणाम आगामी वर्षों में दिखाई देने लगेंगे.’’

इस बीच महाराष्ट्र के बाकी हिस्सों में...

मराठवाड़ा राज्य का सर्वाधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र है. अधिकतर गांवों और शहरों में महीने में सिर्फ एक बार पानी की आपूर्ति हो रही है. लातूर और परभनी जैसे शहरों में तो स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई है कि प्रशासन को लोगों के बीच पानी को लेकर संभावित टकराव को रोकने के लिये पानी के टैंकों और जलाशयों के आसपास धारा-144 लगानी पड़ी.

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लातूर अपने शिक्षा परिवेश के लिये देश-विदेश में मशहूर है. प्रतिवर्ष कई छात्र इस शहर में आकर 10वीं और 12वीं कक्षा के लिये मशहूर ‘‘लातूर पैटर्न’’ वाली विशेष समर क्लासेस में पढ़ने आते हैं जो अब तक कई मेधावी छात्रों को तैयार कर चुकी हैं. बोर्ड की परीक्षाओं की तैयारी से पहले आयोजित होने वाली ये ग्रीष्मकालीन कक्षाएं राज्यभर के छात्रों के बीच उनके प्रदर्शन को निखारने के लिये पहली पसंद हैं.

हालांकि इस वर्ष इन छात्रों को अपने घरों पर रहते हुए ही पढ़ाई करनी पड़ रही है. राज्य सरकार ने क्षेत्र में पानी की भयंकर कमी को देखते हुए इस वर्ष इन ग्रीष्मकालीन कक्षाओं की अनुमति देने से इंकार कर दिया है.

उत्तरी महाराष्ट्र और कोंकण जैसे राज्य के अन्य क्षेत्रों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है. वास्तव में ठाणे का पुलिय प्रशासन पहले से ही किसी अप्रिय घटना से पहले क्षेत्र के पानी के टैंकों और जलाशयों के आसपास पुलिस बल की तैनाती पर विचार कर रहा हैं. इस जिले में भी पानी के संसाधन तेजी से सूख रहे हैं और उन्हें मानसून तक बनाए रखना प्रशासन के लिये सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रहा है.

उत्तरी महाराष्ट्र और कोंकण जैसे क्षेत्रों में भी पानी के संसाधन तेजी से सूख रहे हैं

उत्तरी महाराष्ट्र का नासिक जिला भी पानी की भयंकर कमी का सामना कर रहा है. बीते 139 वर्षों में पहली बार गोदावरी नदी पर बना मशहूर रामकुंड पूरी तरह से सूख गया है. जिला प्रशासन को इसे टैंकरों से पानी मंगवाकर भरवाना पड़ा ताकि भक्त गुड़ी पड़वा यानि मराठी नववर्ष के प्रथम दिन पवित्र डुबकी लगा सकें.

ऐसे में इन सभी और दूसरे कारणों के चलते शिरपुर तहसील एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर रही है जिसे पूरे प्रदेश मे लागू किया जाना चाहिये.

First published: 17 April 2016, 21:14 IST
 
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