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शाह की ताजपोशी के बाद भाजपा पर संघ का रंग और गाढ़ा होगा

समीर चौगांवकर | Updated on: 25 January 2016, 22:17 IST
QUICK PILL
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी अमित शाह दोबारा बीजेपी अध्यक्ष चुने गए हैं. पहली बार पूरे टर्म के लिए अध्यक्ष बने अमित शाह का यह कार्यकाल उनके सांगठनिक हुनर का बड़ा इम्तिहान होगा.
  • पीएम मोदी और अमित शाह के रंग-ढंग में ढल चुकी भाजपा में अब संघ के भगवा रंग का भी \r\nअसर दिखेगा. शाह को अध्यक्ष बनाने पर सहमति देकर संघ अब भाजपा को नियंत्रित\r\n करने की कोशिश करेगा.

सूत्रों की माने तो अमित शाह को भाजपा का अध्यक्ष फिर से बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सामने शाह का पुराना बायोडाटा रख दिया था. मोदी के मुताबिक 1995 में गुजरात राज्य वित्त निगम का अध्यक्ष बनने के 16 महीनों के भीतर ही शाह ने उसे घाटे से उबार लिया था. फिर अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक का अध्यक्ष बने तो उसका भी 18 महीने में कायाकल्प करते हुए करोड़ों के घाटे से उबरकर 20 करोड़ के प्रॉफिट में पहुंचा दिया.

उनकी सफलता की कहानी लंबी है. कहा जाता है कि उन्होंने परिवहन मंत्री रहते हुए गुजरात राज्य सड़क परिवहन निगम का भी बेड़ा पार कर दिया. उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहते हुए 80 में से 71 सीटें भाजपा की झोली में डाल दीं. और तो और राजनाथ सिंह का बचा हुआ कार्यकाल पूरा करते हुए उन्होंने भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बना दिया. 2019 में भाजपा को फिर से सत्ता में आना है तो अमित शाह की हर हाल में जरूरत पड़ेगी.

सफलता की इतनी चमकीली कहानी सुनने के बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत मुस्करा दिए और यह तय हो गया कि शाह ही भाजपा के अगले शाहंशाह होंगे.

पहली बार पूरे टर्म के लिए अध्यक्ष बने अमित शाह का यह कार्यकाल उनके सांगठनिक हुनर का बड़ा इम्तिहान होगा. शाह के सामने दिल्ली और बिहार की प्रचंड हार के बाद मायूस हो रहे कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने के साथ ही सीनियर नेताओं को साधने की जरूरत भी होगी. युवा और वरिष्ठ नेताओं में संतुलन स्थापित करने की चुनौती भी होगी. राज्यों में संगठन को नए सिरे से खड़ा भी करना होगा. इन सभी चुनौतियों से ऊपर संघ को भी पूरी तरह से भरोसे में लेना होगा.

शाह के सामने दिल्ली और बिहार की प्रचंड हार के बाद मायूस हो रहे कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने की जिम्मेदारी होगी

कह सकते हैं कि अमित शाह के सांगठनिक हुनर की असली परीक्षा अब होगी. कुछ ही माह बाद पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और पांडिचेरी में चुनाव होने जा रहे है. 2017 में शाह और मोदी के गृह राज्य गुजरात, सबसे बड़े और सबसे महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश के साथ ही हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब और मणिपुर में भी चुनाव होने वाले है.

अमित शाह के सामने गुजरात, गोवा में सरकार बरकरार रखने के साथ ही हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और असम में कांग्रेस से सत्ता छीनने की चुनौती भी होगी. अगर शाह 2017 में मोदी के संसदीय सीट वाले राज्य उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने में सफल हो जाते हैं तो यह उपलब्धि उनकी तमाम नाकामियों और असफलताओं पर भारी पड़ेगी.

उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहते हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को 73 सीटें दिलाने वाले अमित शाह को अध्यक्ष बनने के बाद 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी. इसी बात को समझते हुए शाह ने बहुत पहले ही उत्तर प्रदेश के प्रभारी ओम माथुर, सह संगठन महामंत्री शिव प्रकाश और सुनील बंसल को उत्तर प्रदेश में सक्रिय कर दिया है.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि मोदी के कारण भाजपा अध्यक्ष बने शाह की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे मोदी के मिजाज को बेहद करीब से समझते है और अपनी रणनीति उसी के अनुसार बनाते है. वही संघ के राष्ट्रीय पदाधिकारी का शाह के बारे में कहना है कि वह मोदी के मिजाज को अच्छी तरह समझते है, यह अच्छी बात है लेकिन शाह को संघ और आम आदमी के मिजाज को भी समझने की कला विकसित करनी होगी.

सिर्फ एकमेव मोदी से शाह का कार्यकाल सफल नहीं हो सकेगा. शाह को अपनी लीडरशिप स्टाइल काफी हद तक बदलनी होगी और संघ के साथ रिश्तों को संभलकर तय करना होगा. हर बार मोदी शाह को बचा नहीं सकते. शाह को खुद को विकसित करना होगा. यह भाजपा और संघ दोनों के लिए जरूरी है.

संघ और भाजपा की समन्वय बैठक में शाह पर लगी थी मुहर

भाजपा और संघ के शीर्ष नेताओं के बीच सितंबर के पहले सप्ताह में हुई समन्वय बैठक में आखरी दिन पहुंचे मोदी ने संघ प्रमुख मोहन भागवत से बंद कमरे में चली बैठक में साफ कर दिया था कि 2019 में केन्द्र में वापसी के लिए उन्हें अमित शाह बतौर अध्यक्ष जरूरी है. मोदी ने साफ कहा था कि शाह के अलावा कोई और नाम उन्हें अध्यक्ष के लिए स्वीकार नहीं होगा.

संघ की नीति निर्धारण में भूमिका निभाने वाले एक बड़े पदाधिकारी का कहना है कि मोदी की दो टूक के बाद संघ ने किसी और नाम पर विचार विमर्श करना जरूरी नहीं समझा. इसी वजह से सात और आठ जनवरी को महाराष्ट्र के जलगांव में हुई संघ के शीर्ष पदाधिकारीयों की बैठक में ही अमित शाह के नाम पर संघ ने बिना किसी झिझक के मुहर लगा दी.

संघ के एक बड़े पदाधिकारी ने स्वीकार किया है कि संघ भाजपा में चल रही व्यक्तिपूजा और केन्द्रीयकरण से चिंतित है. संघ की कोशिश है कि अमित शाह अपनी टीम में संघ के सुझाव को अहमियत दें और अपनी टीम में संघ के लोगों को शामिल करें.

18 महीने के कार्यकाल में चार योजनाओं से भाजपा में जान फूंकी

राजनाथ सिंह का बाकी बचा कार्यकाल पूरा करने के दौरान ही अमित शाह ने चार योजनाओं के द्वारा भाजपा में जान फूंकने और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाने का जिम्मा उठाया था. उन्होंने महासदस्यता अभियान शुरू कर पार्टी के सदस्यों की संख्या 3 करोड़ से 10 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा. पार्टी ने 11 करोड सदस्य बनाने की घोषणा कर भरतीय जनता पार्टी को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाने का दावा किया.

महासंपर्क अभियान: शाह ने महासंपर्क अभियान के दौरान सभी 11 करोड़ सदस्यों से संपर्क कर उनको भाजपा की रीति नीति से अवगत कराने के साथ ही मोदी सरकार की योजनाओं के बारे में जानकारी देना शामिल था.

महाप्रशिक्षण अभियान: इस अभियान के लिए महासचिव मुरलीधर राव, वी सतीश, महेश शर्मा, रामप्यारे पांडे, एल गणेशन, बाला शंकर और सुरेश पुजारी को शामिल किया गया. इस अभियान में 11 हजार मंडल, 600 जिलों और 35 प्रांतों में 15 लाख सक्रिय कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया गया.

शाह ने अपने कार्यकाल में भाजपा के सभी कार्यालयों को हाई टेक बनाने का जिम्मा उठाया था इसके लिए बाकायदा कमेटी गठित की गई थी. इस योजना के तहत देशभर के भाजपा कार्यालयों को आपस में हाईटेक टेक्नोलॉजी से जोड़ना था. उनके कार्यकाल में महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू कश्मीर में भाजपा की जीत हुई. वहीं दिल्ली और बिहार में बुरी हार का सामना करना पड़ा.

शाह के अध्यक्षीय कार्यकाल में होने वाले विधानसभा चुनाव

इसी साल पांच राज्यों बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पांडिचेरी में विधानसभा चुनाव होंगे. 2017 में सात राज्यों उत्तरप्रदेश, गुजरात, गोवा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और मणिपुर में चुनाव होंगे. इसके साथ ही अगला आम चुनाव भी शाह के नेतृत्व में लड़ा जाएगा.

मोदी और शाह के रंग-ढंग में ढल चुकी भाजपा में अब संघ के भगवा रंग का भी असर दिखेगा. शाह को अध्यक्ष बनाने पर सहमति देकर संघ अब भाजपा को नियंत्रित करने की कोशिश करेगा. संघ पृष्ठभूमि वाले पदाधिकारी अब भाजपा संगठन में ज्यादा महत्व पा सकते हैं. पार्टी ने नजरअंदाज कर दिए गए नेताओं की फिर से सुनवाई हो सकती है. हालांकि महत्वपूर्ण पदों पर युवाओं की नियुक्ति होगी.

First published: 25 January 2016, 22:17 IST
 
समीर चौगांवकर @catchhindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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