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सूरत कुर्सी कांड: खतरे में शाह की शांहशाही, पटेलों से रिश्ता और बिगड़ा

रथिन दास | Updated on: 10 September 2016, 7:56 IST

गुजरात भाजपा ने सरकारी नौकरियों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की मांग को लेकर पिछले करीब एक साल से आंदोलन कर रहे पटेलों से जुड़ने के लिए धन्यवाद कार्यक्रम का आयोजन किया था. लेकिन पटेलों तक वापस अपनी पहुंच बनाने के उद्देश्य से आयोजित यह कार्यक्रम सूरत में बुरी तरह विफल रहा. नतीजा यह रहा कि ‘विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष को अपने ही गृहराज्य में अपना भाषण तीन मिनट में समाप्त कर मंच से हटना पड़ा.

पटेलों के हृदयस्थल सूरत में समुदाय के अगड़ों और नेताओं को सम्मानित करने के इस कार्यक्रम को पटेल समुदाय ने आरक्षण आंदोलन चला रहे नेतृत्व के बीच भाजपा द्वारा मनमुटाव के बीज बोने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. भाजपा इस कार्यक्रम की शुरुआती सफलता से गदगद थी. लेकिन गुजरात भाजपा की पहचान बन चुकी करोड़ों रुपए की यह फिजुलखर्ची सूरत में कुछ मिनटों का मामला बनकर रह गई.

पटेल युवाओं ने अपनी प्यारी और पुरानी पार्टी को उसके ही खेल में मात दे दी. वे सिर पर केसरिया टोपी पहने और गले में रुमाल बांधे, सभास्थल में घुस आए. ये वही पहनावा है जिसे पहनकर ये युवा पिछले दो दशक से नैतिक पुलिसिंग की ताकत पाते रहे हैं.

हीरों के शहर में पटेल बहुल श्रोताओं को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह केवल यही संदेश दे पाए कि गुजरात में भाजपा के दो दशक लम्बे शासनकाल में पटेलों को काफी लाभ हुआ है.

पटेल युवाओं ने अपनी पुरानी पार्टी को उसके ही खेल में मात दे दी. वे सिर पर केसरिया टोपी पहन सभा में घुस आए

शाह का यह दावा गलत भी नहीं है, क्योंकि लगभग सभी विकास योजनाओं में पटेलों ने ही सबसे ज्यादा लाभ उठाया है, चाहे वह भूसम्पदा के सौदे हों, आधारभूत ढांचे से जुड़ी परियोजनाएं हों या बड़े ठेके. ऐसा इसलिए किया गया ताकि पार्टी को ‘धनसंग्रह’ में कोई बाधा न आए. इस फैशनेबल संस्कृत शब्द को आलोचक सहयोग, दान, वसूली या चंदा जैसा कोई भी नाम दें सकते हैं.

शाह ने यह बात जोर देकर कही कि गुजरात का विकास, भाजपा की बढ़ोतरी और पटेलों की उन्नति, सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. लेकिन पटेलों पर भाईचारे की भावना के इस बखान का कोई असर नहीं हुआ. हार्दिक पटेल के स्वागत में नारे लगने लगे. युवाओं ने भाजपा अध्यक्ष को बता दिया कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है.

तेईस वर्षीय हार्दिक पटेल ने आर्थिक और सामाजिक रूप से प्रभावशाली पटेल समुदाय के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का आंदोलन चलाकर विकसित गुजरात के भ्रम को तोड़ दिया है.

पुलिस ने जैसे ही प्रदर्शनकारियों को कार्यक्रम स्थल से खदेड़ने का प्रयास शुरू किया, भाजपा कार्यकर्ताओं के भेष में बैठे पटेल युवक नाराज हो गए. उन्होंने कुर्सियां फेंकने और पोस्टर फाड़ने जैसी हरकतें शुरू कर दीं.

आयोजकों को ऐसी अफरातफरी की आशंका पहले से ही थी. इसी कारण विशाल मंच को तारों की जाली लगाकर दर्शक दीर्घा से पहले ही अलग रखा गया था ताकि कोई भी चीज फेंकी जाए तो नेताओं के मंच तक नहीं पहुंचे लेकिन गालियां और भावनात्मक भड़ास किसी तारबंदी को कहां मानते हैं, वो निर्बाध अमित शाह और मंचासीन नेताओं तक पहुंचती रहीं.

आयोजकों को अफरातफरी की आशंका पहले से थी, इसीलिए मंच को तारों की जाली से घेरकर रखा गया था

हकीकत यह रही कि कार्यक्रम के लिए तैयार किए गए विशाल टेन्ट में भगदड़ मच गई. अफरा-तफरी के माहौल में  भाजपा अध्यक्ष अमित शाह व पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जीतूभाई वाघानी को कुछ ही मिनटों में अपने भाषण समेटना पड़ा.

यहां तक कि भाजपा के कार्यक्रमों में देशभक्ति का मानक समझे जाने वाले ‘भारत माता की जय’ जैसे नारे के सामने भी पटेल युवकों ने 'जय सरदार, जय पाटीदार' जैसे नारे लगाए. इशके अलावा चौतरफा 'हार्दिक, हार्दिक' के नारे वहां गूंजते रहे.

यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि भाजपा के साथ अपने सुखद क्षणों में यही पटेल युवक 'भारत माता की जय' के नारे की अवमानना करने वाले के साथ मारपीट करने पर उतारू हो जाते थे. भाजपा के प्रिय नारे 'भारत माता की जय' के प्रति पटेल युवकों की यह उदासीनता भी इस बात की द्योतक है कि यह समुदाय मानसिक तौर पर भाजपा से कितनी दूर निकल आया है.

यह वही पार्टी है जिसे आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने अपने पूरे धनबल, बाहुबल, रणनीतिक और वोटों की ताकत से मदद की थी.

इलेक्ट्रॉनिक ताकत का प्रतीक जो सोशल मीडिया कभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा और मोटे तौर पर हिन्दुत्व के जयगान में लगा था, वही सोशल मीडिया भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेश अध्यक्ष वाघानी का यह कह कर मजाक उड़ा रहा है कि उनके भाषणों को इतिहास के सबसे छोटे भाषणों के रूप में गिनीज बुक में दर्ज किया जाना चाहिए.

पटेल नेताओं के सम्मान के लिए इस कार्यक्रम का आयोजन कर सत्ताधारी भाजपा साबित तो यह करना चाहती थी कि आरक्षण आंदोलन के साल भर बाद भी पटेल समुदाय में पार्टी की पकड़ काफी मजबूत है, लेकिन अन्ततः दिखाई यही दिया कि उस कवच में गहरी दरारें पड़ चुकी हैं.

अब उपद्रव करने के आरोपों में पटेल युवकों की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ आरोप पत्र पेश किए जाने की सम्भावना को देखते हुए भाजपा और पटेलों के बीच दूरी और बढ़ेगी. इस ताकतवर समुदाय की मान-मनव्वल के लिए भाजपा का यह प्रयास बुरी तरह विफल हुआ है.

First published: 10 September 2016, 7:56 IST
 
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