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शिखर पर 'अकेला' खड़ा सदी का 'सौदागर'!

अभिषेक श्रीवास्तव | Updated on: 11 October 2016, 7:26 IST
(गेटी इमेजेज़)
QUICK PILL
  • अमिताभ बच्चन आज अपने अमृत वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं. 75 की उम्र आते-आते उन्होंने सफलता के ऐसे अनगिनत आयाम छू लिए हैं जिसकी अधिकांश लोग सिर्फ कल्पना करते हैं. उनके फिल्मी सफर के इतर उनकी राजनीति भी समय सापेक्ष, व्यावहारिकता, सटीक निर्णय और सही समय पर सही साथी चुनने का अद्भुत उदाहरण है. नेहरू के नजदीकी एक कांग्रेसी पिता का पुत्र, राजीव गांधी का बालसखा एक समय में समाजवाद की चादर ओढ़ मुलायम सिंह और मुंहबोले भाई अमर सिंह के साथ उठने-बैठने लगा. उनकी पत्नी आज भी समाजवादी सांसद हैं. अमिताभ की राजनीति संगम के पानी की तरह फिर भी प्रवाहमय बनी रही. वे गुजरात के ब्रांड अंबेस्डर हो गए. यह रिश्ता और गाढ़ा होता गया. मौजूदा केंद्र की भाजपा सरकार से उनके गहरे रिश्ते लोग कहते-सुनते हैं. वे हमेशा तमाम जरूरी राजनीतिक मसलों पर चुप्पी साधते हुए जब तब देशभक्ति की सुरक्षित पिच पर \'भारत माता की जय\' करते नजर आ जाते हैं. दक्षिणपंथी सरकार से उनकी नजदीकी का आलम यह है कि अटकलें उनके अगले राष्ट्रपति बनने तक की हैं. 40-50 सालों में मध्य से बाएं होते हुए अमिताभ का दक्षिणमुखी होना राजनीतिक सफलता की और खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की दिलचस्प कहानी है. लिहाजा महानायक के इस जन्मदिन पर हम उनकी राजनीतिक सफलता के सफर पर चलते हैं.

पीछे मुड़ कर कभी न देखना, अगर उस राह पर लौटने की योजना न हो: हेनरी डेविड थोरो

अपनी 74वीं वर्षगांठ से महीने भर पहले अमिताभ बच्‍चन ने 'ऑफ दि कफ' नामक एक संवाद सत्र में पत्रकार शेखर गुप्‍ता और बरखा दत्‍त के सामने अपनी ज़िंदगी के इकलौते पश्‍चाताप का उद्घाटन किया. उन्‍हें इस बात का खेद था कि 1984 में इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद वे वहां की जनता से किए अपने वादे पूरे नहीं कर पाए और तीन साल में ही संसद से इस्‍तीफा दे डाला. अमिताभ बोले, 'मैं जानता हूं कि यह एक ऐसी बात है जिसे इलाहाबाद के लोग हमेशा याद रखेंगे.'

बीते 32 साल के दौरान संगम में बहुत पानी बह चुका है, गंगा-जमुना पर कंक्रीट के कई विशाल पुल भी बन गए और दो अदद पीढियां जवानी की दहलीज को पार कर गईं. इलाहाबाद की जनता को अमिताभ से आज कोई शिकवा हो या न हो, लेकिन अहम यह है कि अमिताभ को इस बात की खुशफ़हमी है. यह खुशफ़हमी ऐसी भी नहीं, जो उनके पिता हरिवंश राय के शब्‍दों में 'याद सुखों की आंसू लाती/ दुख की, दिल भारी कर जाती/ दोष किसे दूं जब अपने से, अपने दिन बरबाद करू मैं/ क्‍या भूलूं क्‍या याद करू मैं' वाले भाव से उपजी हो.

अमिताभ ने 1969 में आई मृणाल सेन की 'भुवन शोम' में पहली बार अपनी आवाज़ देने से लेकर आज तक एक भी दिन 'बरबाद' नहीं किया है. आज अपने अमृत वर्ष में प्रवेश करते वक्‍त वे वजूद के जिस पायदान पर खड़े हैं, वहां से इलाहाबाद को खेदपूर्वक याद करना क्‍या महज रूमानियत है, उनका सिनिसिज्‍म है, एक स्‍वांग है, कोई शातिराना हरक़त है या कोई ख़लिश जो रह-रह कर 'सदी के महानायक' की देह पर खसरे की तरह उभर आती है?

किंवदंती

अमिताभ जीते जी किंवदंती बन चुके हैं. जीवित किंवदंतियों को समझना थोड़ा मुश्किल होता है. खासकर तब, जबकि उनके बारे में ढेरों पन्‍ने रंगे जा चुके हों और वे आज भी समाज में चर्चा का केंद्र बने हुए हों. उनकी आलोचनाएं पर्याप्‍त हैं. आलोचना से परे कोई नहीं होता, लेकिन स्‍वीकार्यता के मामले में वे हमारे समाज को दो हिस्‍सों में कभी नहीं बांटते.

उनके आलोचकों को भी यह मानने में गुरेज़ नहीं होगा कि अमिताभ बच्‍चन तकरीबन एक सर्वस्‍वीकार्य 'फिगर' हैं. इसी स्‍वीकार्यता का तकाज़ा था कि आज से नौ साल पहले मुलायम सिंह यादव ने उन्‍हें राष्‍ट्रपति बनवाने के लिए पूरी ताकत लगा दी थी. क्‍या यह महज संयोग है कि एक बार फिर हम ऐसा ही कुछ सियासी गलियारों में सुन पा रहे हैं?

तेज़ी से बदलते हुए एक समाज में करीब पांच दशक तक खुद को प्रासंगिक बनाए रखना आसान काम नहीं होता. उसके लिए आईने में अपना अक्‍स बार-बार देखने और समझने की जरूरत पड़ती है. उसके लिए सौदों में पारंगत होना पड़ता हैं. सुधेंदु रॉय की 1973 में आई फिल्‍म 'सौदागर' में मोती ने अपनी ज़िंदगी से यही सबक लिया था इश्‍क़ चाहे कितना ही मीठा क्‍यों न हो, लेकिन उसके चक्‍कर में गुड़ की मिठास कम नहीं पड़नी चाहिए क्‍योंकि असली मुनाफा वहीं है.

अमिताभ जीते जी किंवदंती बन चुके हैं. जीवित किंवदंतियों को समझना थोड़ा मुश्किल होता है

अमिताभ की जिंदगी इश्‍क़ और मुनाफ़े के इसी द्वंद्व से शुरू होती है जहां नायक को असल जिंदगी में पता ही नहीं होता कि उसे वास्‍तव में शिकायत किससे है. क्‍या यह महज संयोग है कि हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित और 1982 में प्रदर्शित 'बेमिसाल' का नायक इसी द्वंद्व को साकार करता है जब भरी महफ़िल में वह कहता है, 'किसी बात पर मैं किसी से ख़फ़ा हूं/ मैं ज़िंदा हूं पर ज़िंदगी से ख़फ़ा हूं....'

ऐसी दिमागी उहापोह हादसों में कब तब्‍दील हो जाए, पता नहीं चलता. ठीक अगले साल 1983 में आई 'कुली' में एक हादसा हुआ जिसने बच्चन को एक बार फिर आईने में अपना अक्‍स देखने पर मजबूर कर दिया. वे सोचने लगे कि क्‍या लोग उन्‍हें दोबारा उसी तरह स्‍वीकार कर पाएंगे. उन्‍हें अपने ऊपर शक़ था, सो उन्‍होंने राह बदल ली. पुराना खानदानी इश्‍क़ परवान चढ़ा और वे रिकॉर्ड मार्जिन से हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ इलाहाबाद से लोकसभा की सीट जीत गए, लेकिन तीन साल में सौदागर के गुड़ की मिठास जाती रही.

बोफोर्स के आरोपों ने बच्‍चन को सिखा दिया कि सियासत का इश्‍क़ इतना आसान नहीं होता. वे 1988 में दोबारा फिल्‍मों की ओर लौटे, लेकिन इस दौर की पहली कामयाब शहंशाहत (शहंशाह, 1988) के बाद उनका पारा जो गिरना शुरू हुआ, तो जादूगर, तूफ़ान, मैं आज़ाद हूं, अजूबा, खुदा गवाह आदि खराब फिल्‍मों से होता हुआ तकरीबन रिटायरमेंट मोड तक पहुंच गया. इस बीच 1990 में आई अग्निपथ ही थोड़ा राहत देने वाली थी, लेकिन यह दीवार पर लिखी इबारत जैसा साबित हुई. इसके बाद बच्‍चन का का रास्‍ता वाकई ''इक आग का दरिया था जिसमें डूब के जाना था.''

संक्रमण काल

यह दौर संक्रमण का था. कांग्रेस कमज़ोर पड़ चुकी थी. 1991 में राजीव गांधी की हत्‍या ने उनके सामने मोहभंग की स्थिति पैदा कर दी थी. करीब सात-आठ साल तक वे रिटायरमेंट के मोड में पड़े रहे, लेकिन 1992 में विदेशी पूंजी के ताज़ा झोंके ने सौदागर में नई जान फूंकी. इस बार अखाड़ा वही था, बस भूमिका बदल चुकी थी. फिल्‍म निर्माता से लेकर 1996 की मिस वर्ल्ड प्रतिस्‍पर्धा के आयोजक तक कई भूमिकाओं में अमिताभ का कारोबारी पुनर्जन्‍म हुआ.

वे विशुद्ध कारोबार के लिए नहीं बने थे, इतना साफ़ था. उनकी कंपनी एबीसीएल कर्ज में डूब गई और यहीं अमर सिंह संकटमोचक की भूमिका में उनकी जिंदगी में आए. इसके बाद मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह, सुब्रत राय आदि की सोहबत में अमिताभ ने कांग्रेसी विरासत को तिलांजलि दे दी, हालांकि उन्‍होंने कभी भी खुले तौर पर गांधी परिवार से अपने रिश्‍ते खराब होने की बात नहीं कुबूली.

पतन एक मोर्चे पर नहीं होता. वह एक साथ सभी मोर्चों पर होता है. ध्‍यान से देखें तो पता चलता है कि अमिताभ के फिल्‍मी करियर का पतन उस दौर में सबसे ज्‍यादा हुआ जब वे सियासी या कारोबारी बोझ तले दबे हुए थे. बड़े मियां छोटे मियां, लाल बादशाह, सूर्यवंशम् और हिंदुस्‍तान की कसम इसी दौर की फिल्‍में हैं जिन्‍हें बच्‍चन की सबसे खराब फिल्‍में कहा जा सकता है. एक बार फिर अमिताभ ने आईने में अपना अक्‍स देखा. वे बूढ़े हो चुके थे. उनकी सामाजिक छवि धूमिल हो चुकी थी.

अब तक वे बाज़ार को संभालते आए थे लेकिन अब उन्‍हें बाज़ार ही संभाल सकता था. इक्‍कीसवीं सदी की दहलीज पर खड़े बच्‍चन ने इमेज मेकओवर का फैसला किया. अपनी उम्र के हिसाब से दिखने के लिए उन्‍होंने ब्रांड मैनेजरों का सहारा लिया. करना कुछ नहीं था, बस पुरानी शराब को नई बोतल में ढालना था. यहां से शुरू हुआ उनके सफ़र का तीसरा अध्‍याय, जो सियासी स्‍तर पर गुजरात का ब्रांड एम्‍बेसडर बनने तक जा पहुंचा.

चुप्पी

गांधी परिवार के साथ उनके खानदानी रिश्‍ते को एक तरफ़ रख दें, तो सवाल उठता है कि अमिताभ ने पिछले एक दशक के दौरान एक साथ समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी को कैसे साधे रखा. इसे समझना ज्‍यादा मुश्किल नहीं है. कांग्रेस के सियासी अवसान के दौर में भाजपा की सांप्रदायिकता को सीधी चुनौती सपा, बसपा या आरजेडी जैसे दलों से मिल रही थी.

कह सकते हैं कि कभी जनता पार्टी से निकले क्षेत्रीय दलों का सेकुलरवाद भाजपा की सांप्रदायिकता पर ही टिका था. वरिष्‍ठ पत्रकार जावेद नक़वी के शब्‍दों में कहें तो- 'एक सेकुलर-कम्‍युनल कम्‍बाइन इस देश को चला रहा था'. अमिताभ उसी सेकुलर-कम्‍युनल कम्‍बाइन के साझा खिलाड़ी थे जो अहम मसलों पर अपनी ज़बान बंद रखकर एक तरफ़ तो सेकुलर बने रहे, दूसरी ओर बाज़ार के हाथों खेलते हुए धीरे-धीरे हिंदूवादी 'गुजरात मॉडल' के एंडोर्समेन्‍ट तक पहुंच गए.

याद करें, राष्‍ट्रीय परिदृश्‍य पर प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार के बतौर नरेंद्र मोदी तो 2013 में उभरे लेकिन अमिताभ ने गुजरात का आधिकारिक एंडोर्समेंट 2010 में ही शुरू कर दिया था. हो सकता है कि उस वक्‍त इसके पीछे उनकी कोई सियासी महत्‍वाकांक्षा न रही हो, लेकिन एक सौदागर के बतौर वे बाज़ार का मूड तो भांप ही चुके थे. शायद कांग्रेस या दूसरे दलों से काफी पहले, जिन्‍हें 2014 के लोकसभा चुनाव में जाकर कॉरपोरेट और सांप्रदायिक ताकतों के गठजोड़ का स्‍वाद चखने को मिला जबकि अमिताभ को नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर कोई आश्‍चर्य नहीं हुआ.

पिछले ही महीने नरेंद्र मोदी के 67वें जन्‍मदिन पर उन्‍होंने यह बात कहते हुए एक कविता प्रधानमंत्री के नाम समर्पित की जिसमें वे लिखते हैं कि 2009 के बाद से उनकी मोदी से जितनी भी मुलाकातें हुई हैं, वे काफी गरमाहट भरी रही हैं. गरमाहट का दुतरफ़ा आलम ये है कि एक तरफ़ बच्‍चन अपने 'बाबूजी' की समृद्ध साहित्यिक विरासत को 'चारण' गान में बदल चुके हैं तो दूसरी ओर उनकी जीवनसंगिनी जया बच्‍चन समाजवादी पार्टी से राज्‍यसभा में सांसद भी बनी हुई हैं. इस अद्भुत संतुलन के लिए बेशक उनकी निजी क्षमता को सारा श्रेय नहीं जाता. इसके पीछे समाजवादी पार्टी और भाजपा की एक-दूसरे पर निर्भर दुकानदारी भी काम कर रही है.

एक सेकुलर-कम्‍युनल कम्‍बाइन इस देश को चला रहा था, अमिताभ उसी सेकुलर-कम्‍युनल कम्‍बाइन के साझा खिलाड़ी थे

कह सकते हैं कि 'सदी का महानायक' अपने समय के साथ आज भी कदमताल कर रहा है. उसकी रस्‍सी तनी हुई नहीं है क्‍योंकि उसके पीछे समूचा बाज़ार खड़ा है. उसे गिरने का कोई ख़तरा भी नहीं है क्‍योंकि उसकी रीढ़ पहले ही दो दिशाओं में झुकी हुई है. हां, उसे रह-रह कर बाबूजी ज़रूर याद आते हैं, जिन्‍होंने कभी लिखा था कि 'मैं हूं उनके साथ खड़ा जो सीधी रखते अपनी रीढ़'.

उसे रह-रह कर उनका इलाहाबाद याद आता है, जहां के लोग उसके ख़याल में अब भी उससे ख़फ़ा होंगे. 1973 से 2016 के बीच इस 'सौदागर' ने कामयाबी की जो ज़मीन नापी है और उसके लिए जो बेशुमार सौदे किए हैं, उससे उसका पलटना तो मुमकिन नहीं है. हां, इलाहाबाद का कर्ज़ चुकाकर बाबूजी की लाज ज़रूर रखी जा सकती है. शायद यह ख़लिश अमिताभ के मन में आज भी है.

ऐसा लगता है कि 'बिग बी' इस बार खुद को पहले से कहीं ज्‍यादा फंसा हुआ पा रहे हैं. इस बार एक कलाकार या कारोबारी के बतौर नहीं, बल्कि एक मनुष्‍य के बतौर. उनकी हालत तीस साल पहले आई 'आखिरी रास्‍ता' के दोहरे किरदार वाली हो गई है. डेविड मुक्ति चाहता है लेकिन उसका बेटा विजय ही उसकी राह का रोड़ा बना हुआ है. ऐसे विभाजित व्‍यक्तित्‍व का अगले साल चाहे पूरी दुनिया अमृत महोत्‍सव मना ले, लेकिन उसकी मुक्ति के अमृत में 'चीनी कम' होगी, इसे वह अच्‍छे से जानता है.

अभिनेता अमिताभ आज बेशक शिखर पर हैं, लेकिन उनके भीतर मौजूद इंस्‍पेक्‍टर विजय वर्मा का अंश आज भी नितान्‍त 'अकेला' है. इसीलिए वह पीछे मुड़-मुड़ कर देख रहा है. क्‍या पता वह पीछे जाने की योजना बना ही रहा हो!

First published: 11 October 2016, 7:26 IST
 
अभिषेक श्रीवास्तव @abhishekgroo

स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. लंबे समय से देशभर में चल रही ज़मीन की लड़ाइयों पर करीबी निगाह रखे हुए हैं. दस साल तक कई मीडिया प्रतिष्‍ठानों में नौकरी करने के बाद बीते चार साल से संकटग्रस्‍तइलाकों से स्‍वतंत्र फील्‍डरिपोर्टिंग कर रहे हैं.

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