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दर-बदर: एमनेस्टी रिपोर्ट ने खोली भारत में कोल माइनिंग की पोल

श्रिया मोहन | Updated on: 15 July 2016, 8:41 IST
QUICK PILL
  • पर्यावरण मंजूरी लेने की प्रक्रिया के तहत राज्य के प्रदूषण नियंत्रण विभाग को प्रभावित समुदाय के लोगों के साथ सार्वजनिक बातचीत करनी होती है. इस बैठक में वह अपनी चिंताओं को साझा करते हैं. एमनेस्टी ने पाया कि इन इलाकों में ऐसी कोई बैठक नहीं हुई.
  • रिपोर्ट बताती है कि खदान वाले इलाकों में सरकार ने पंचायती राज अधिनियम को ठीक ढंग से लागू नहीं किया. इस एक्ट के तहत अधिसूचित इलाकों में जमीन लेने से पहले पंचायतों और ग्राम सभाओं से बातचीत करनी होती है.
  • भारत दुनिया में कोयला का तीसरा बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता देश है. हमारी दो तिहाई बिजली कोयले से आती है. भारत सरकार की योजना 2020 तक कोयले का सालाना उत्पादन दोगुना करने की है ताकि बढ़ती ऊर्जा की जरूरतों को पूरा किया जा सके.

निरुपा बाई उस दिन को याद करती हैं जब उनका घर ढहा दिया गया था. छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के बरकूटा गांव में उनके पास 6 एकड़ जमीन हुआ करती थी. 9 फरवरी 2014 को उनका घर गिरा दिया गया क्योंकि कोल इंडिया को अपनी विस्तार योजना को पूरा करना था. कंपनी या सरकार की तरफ से उन्हें किसी तरह का कोई नोटिस नहीं दिया गया.

कुछ ही देर में उनके मकान को बुलडोजर ने जमींदोज कर दिया. उन्हें घरा से अपना सामान बाहर निकालने तक का मौका नहीं मिला. उनका पूरा परिवार बेबस होकर खुद को विस्थापित होता देखता रहा. परिवार में उनकी मां, बहन और चार बेटे हैं.

विकल्प के तौर पर उन्हें पास ही में आधा एकड़ जमीन दी गई. वैसी जमीन जिस पर खेती नहीं हो सकती थी. उन्हें मिली जमीन खनन इलाके के पास थी और उनके पास कोई नौकरी भी नहीं थी. कैच से बातचीत में उन्होंने बताया, 'खेती के लिए कोई भूजल नहीं है. हवा में राख बिखरी हुई है. यह जमीन पर नर्क की तरह है. हम सांस नहीं ले सकते. हम अब दिहाड़ी मजदूर बन गए हैं.' बुधवार को दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में एमनेस्टी इंडिया ने 'व्हेन लैंड इज लॉस्ट, डू वी ईट कोल' के नाम से रिपोर्ट जारी हुई.

एमनेस्टी की रिपोर्ट संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले आई है. सरकार मानसून सत्र के दौरान भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस ले सकती है और इसके बाद राज्यों को अपनी मर्जी के मुताबिक कानून बनाने में मदद मिलेगी.

उल्लंघन

भारत दुनिया में कोयला का तीसरा बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता देश है. हमारी दो तिहाई बिजली कोयले से आती है. भारत सरकार की योजना 2020 तक कोयले का सालाना उत्पादन दोगुना करने की है ताकि बढ़ती ऊर्जा की जरूरतों को पूरा किया जा सके.

करीब 70 फीसदी भारत का कोयला मध्य और पूर्वी भारत के राज्यों में है. छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा में करीब 2.8 करोड़ आदिवासी रहते हैं.

इन इलाकों में तीन बड़े कोयला के खदान हैं: 

  1. छत्तीसगढ़ में एईसीसीएल कुसमांडा खदान
  2. झारखंड के तेतरियाखड़ में सीसीएल खदान
  3. ओड़िशा के बसुंधरा में एमसीएल खदान
एमनेस्टी के मुताबिक इन तीनों खदानों की वजह से 9,250 परिवार प्रभावित हैं.

खामी सहित कानून

एमनेस्टी की रिपोर्ट में इन उल्लंघनों का जिक्र किया गया है.

 कोल बियरिंग एरियाज एक्ट 1957

एक्ट के मुताबिक अगर कोई सरकार धारा 4 के तहत किसी जमीन को अधिग्रहित करने की मंशा जाहिर करती है तो उसे प्रभावित समुदाय की सहमति लेने की कोई जरूरत नहीं होगी और नहीं उसे मूल निवासियों से पूर्व में इसके लिए अनुमति लेनी होगी.

अधिकारियों को जमीन लेने के बदले में कोई मुआवजा देने की भी जरूरत नहीं होगी. साथ ही मानवाधिकार के हनन को लेकर आकलन किए जाने की भी जरूरत नहीं होगी. इन अवधि के दौरान सभी लोगों के जमीन खरीदने और बेचने के अधिकार निलंबित रहेंगे.

सामाजिक कार्यकर्ता ब्रृजेश श्रीवास ने कैच को बताया, 'धारा 4 को 2009 में पास किया गया था. इसके तहत मेरी 0.6 एकड़ जमीन आती है. मैं अब फंस गया हूं. कोल इंडिया न तो मुझे मुआवजा देगी और नहीं मैं अपनी बेटी की शादी के लिए जमीन बेच सकता हूं.'

पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986

पर्यावरण मंजूरी लेने की प्रक्रिया के तहत राज्य के प्रदूषण नियंत्रण विभाग को प्रभावित समुदाय के लोगों के साथ सार्वजनिक बातचीत करनी होती है. इस बैठक में वह अपनी चिंताओं को साझा करते हैं.

एमनेस्टी ने पाया कि इन इलाकों में कोई बैठक नहीं हुई.

पंचायत अधिनियम 1996

पीईसीए एक्ट के तह अधिसूचित इलाकों में जमीन लेने से पहले पंचायतों और ग्राम सभाओं से बातचीत करनी होती है. एमनेस्टी की रिपोर्ट के मुताबिक इन अधिनियम को लागू करने की प्रक्रिया बेहद खराब रही है.  

राइट ओवर ट्रेडीशनल लैंड्स, फॉरेस्ट राइट्स एक्ट 2006

पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से 2009 में जारी आदेश के मुताबिक मंत्रालय से औद्योगिक परियोजना को मंजूरी मिलने के पहले राज्य सरकार को संबंधित परियोजना के लिए ग्राम पंचायत की सहमति लेनी होगी और इसमें कम से 50 फीसदी से अधिक सदस्यों का होना जरूरी होगा. इस सभी की वीडियो रिकॉर्डिंग कराई जाएगी. इस कानून की वजह से जबरन अधिग्रहण पर रोक लगती है.

रिपोर्ट की अहमियत

पिछले पांच दशकों के दौरान भारत में बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं की वजह से बड़ी संख्या में विस्थापन हुआ है. एक अनुमान के मुताबिक यह आंकड़ा 5 करोड़ हो सकता है. 

मार्च 2015 में कोयला बिल में यह प्रावधान जोड़ा गया है कि कोयला और खनिज खदानों का ठेका उन्हीं को दिया जाएगा जो इसके लिए सबसे ज्यादा बोली लगाएंगे.

सुधा भरद्वाज पूछती हैं, 'अगर सरकारी कंपनी कोल इंडिया नियमों का उल्लंघन कर रही है तो फिर कौन सी व्यवस्था निजी कंपनियों को ऐसा करने से रोकेगी?'

भारद्वाज ने कहा कि पहले जमीन अधिग्रहण में लोगों को मुआजवा कम और नौकरियां ज्यादा मिलती थी. लेकिन अब यह प्रवृति उल्टी हो गई है. अस्थायी नौकरियों का यह मतलब होता है कि कंपनी कभी भी मजदूरों को फायर कर सकती है. 

निरुपा बाई कहती हैं, 'मैं जानती हूं कि हमें कोयला की जरूरत है. उन्हें कोयला निकालने दीजिए. लेकिन हमारी इज्जत खत्म करने का कोई मतलब नहीं है. विस्थापितों का सम्मान करना होगा. हमें जिंदगी दीजिए. मैं बस यही चाहती हूं.'

First published: 15 July 2016, 8:41 IST
 
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