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अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी: सरकार एक ग़ैर जरूरी विवाद को जन्म दे रही है

अब्दुल हफीज़ गां | Updated on: 19 January 2016, 17:25 IST
QUICK PILL
  • केंद्र की एनडीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह कहकर एक नए विवाद को हवा दी है कि वह अलीगढ़ मुस्लिम \r\nयुनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्था नहीं मानती. इससे कई कानूनी और \r\nसंवैधानिक सवाल खड़े हो गए हैं.
  • पिछली यूपीए सरकार ने इसी केस में अदालत से कहा था कि अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी \r\nअल्पसंख्यक संस्था है परन्तु मौजूदा सरकार इसके विपरीत सोचती है. इसके तमाम दूसरे पहलुओं को समझना जरूरी है.

केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट में यह कहना कि वह अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्था नहीं मानती अपने आप में कई कानूनी और संवैधानिक सवाल खड़े करता है. सबसे पहला सवाल यह कि क्या केंद्र सरकार अपना क़ानूनी पक्ष समय तथा सुविधाओं के मुताबिक़ बदल सकती है? क्या सरकारों के बदलने पर सच और क़ानून बदल जाता है?

केंद्र में एनडीए की सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में लिया गया पक्ष बड़ा चौंकाने वाला है. पिछली यूपीए सरकार ने इसी केस में कहा था कि अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी अल्पसंख्यक संस्था है परन्तु मौजूदा सरकार इसके विपरीत सोचती है. यह काफ़ी चिंताजनक पहलू है क्योंकि क़ानून सरकारों के बदलने से नहीं बदल जाते.

इस बात को अधिक समझने के लिए थोड़ा इतिहास में भी झांकने की आवश्यकता है. जब हमारे देश के संविधान का निर्माण हो रहा था तो धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कुछ प्रावधान किए गए थे. यह प्रावधान अल्पसंख्यक समाजों की भाषा, परंपरा और पद्धतियों को संरक्षण देने का एक आधारभूत प्रयास था.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 में यह प्रावधान है कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यको को यह अधिकार होगा कि वह अपने शैक्षिक संस्थाओं को बना और चला सकते हैं. हमारे संविधान निर्माताओं ने यह अधिकार इसलिए दिए हैं ताकि अल्पसंख्यक समाज अपनी संस्कृति और भाषा का प्रचार और प्रसार कर सकें. इसी अधिकार को अल्पसंख्यक स्वरुप (माइनॉरिटी कैरेक्टर) कहते हैं.

संविधान ने अल्पसंख्यक समाजों की भाषा, परंपरा और पद्धतियों को संरक्षण देने का कुछ प्रावधान तय किया था

इस स्वरुप के तहत कोई भी संस्था अपने को चलाने, फीस के निर्धारण, कर्मचारियों की नियुक्ति और एडमिशन के नियमों के निर्धारण का अधिकार रखती है. इन्ही अधिकारों की श्रृंखला में आरक्षण का भी अधिकार आता है. आरक्षण न सिर्फ एक संवैधानिक सत्यता है बल्कि सामाजिक न्याय का एक अति महत्त्वपूर्ण साधन भी है.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने 2004 में इसी अधिकार का उपयोग कर मेडिकल पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्सेस में पचास प्रतिशत आरक्षण मुसलमानों को देने का प्रावधान किया जिसे 25 फरवरी 2005 को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने भी हरी झंडी दे दी. इस निर्णय को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई.

अक्टूबर 2005 में इलाहबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 20 अक्टूबर 1967 में दिया गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला अजीज़ बाशा बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया एक सही क़ानून है जिसमे कहा गया था कि अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी अल्पसंख्यक संस्था नहीं है.

साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि 1981 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट-1920 में संसद द्वारा किये गए संशोधन असंवैधानिक हैं, और संसद के पास उसे बदलने का अधिकार नहीं है. इसलिए 1967 का अजीज़ बाशा फैसला मामले में आया फैसला अभी भी क़ायम है जो मानता है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पास अल्पसंख्यक स्वरुप नहीं है.

यहां पर यह जानना उचित होगा कि हाईकोर्ट द्वारा यह कहना कि संसद को संशोधन करने कि शक्ति नहीं है, न्याय संगत नहीं दिखता. संविधान के सातवें शेड्यूल की एंट्री नंबर 63 अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के विषय पर संसद को क़ानून बनाने का अधिकार देती है, और इसलिए 1981 में किये गए संशोधन क़ानून की परिधि में हैं. 

संसद ने 1981 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट में संशोधन किया. इसकी धारा 5(2) (सी) युनिवर्सिटी को मुस्लिमों दशा में सुधार के लिए काम करने का अधिकार देती है

अगर हम संवैधानिक स्थिति पर ध्यान दें तो हम पाते हैं कि संसद सुप्रीम कोर्ट के  किसी भी फैसले का आधार बदल कर उस फैसले के उलट क़ानून बना सकती है. इसी बात को ध्यान में रखकर अजीज़ बाशा केस के आधार को खत्म करने के लिए संसद ने 1981 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट में संशोधन किये जिसमें साफ़ तौर पर धारा 5(2) (सी) में यह कहा गया कि अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी को यह शक्ति होगी कि वह भारतीय मुस्लिम समाज की शैक्षिक और सांस्कृतिक तरक्की के लिए काम कर सके. यही नहीं धारा-1 में युनिवर्सिटी को परिभाषित करते हुए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट-1920 कहता है कि युनिवर्सिटी का अर्थ है एक ऐसा शैक्षिक संस्थान जो अपनी विशेष प्रकार की शिक्षा के लिए भारतीय मुस्लिम समाज द्वारा  स्थापित किया गया है.

उपरोक्त कानूनी तथ्य यह साबित करते हैं कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक ऐसी संस्था है जिसको भारतीय मुस्लिम समाज की शैक्षिक ज़िम्मेदारी दी गयी है.

बदलती सरकारों के साथ आधारभूत संवैधानिक मूल्य नहीं बदलते. इसलिए सरकार को चाहिए कि वह सुप्रीम कोर्ट में इस बात को स्वीकार करे कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक अल्पसंख्यक संस्थान है. जबतक संसद द्वारा बनाया गया क़ानून बदला नहीं जाएगा तबतक उसे मानने की बाध्यता सरकार पर रहेगी.

मौजूदा सरकार का सुप्रीम कोर्ट में यह कहना कि 1981 का संशोधन ग़लत है बड़े सवालों को जन्म देता है. सरकार अपने द्वारा ही बनाये गए क़ानून को सुप्रीम कोर्ट में ग़लत कैसे ठहरा सकती है?

(लेखक लॉ विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर और एएमयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं)

First published: 19 January 2016, 17:25 IST
 
अब्दुल हफीज़ गां @catch_hindi

लेखक अलीगढ़ युनिवर्सिटी के लॉ कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं

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