Home » इंडिया » amu minority status issue, fight amu vs modi govt
 

केंद्र सरकार: एएमयू नहीं है अल्पसंख्यक संस्थान

पाणिनि आनंद | Updated on: 9 July 2016, 18:07 IST
(कैच)

अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दिए गए अपने ताज़ा हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि यह विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है.

केंद्र की मोदी सरकार ऐसा पहले भी दोहरा चुकी है. लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक संस्थान होने का विवाद अब केवल अदालत के कमरे तक सीमित नहीं है.

केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी के लिए इस विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक होने का मुद्दा अब एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन चुका है.

बीजेपी का गेम

ऐसा नहीं है कि अलीगढ़ के अल्पसंख्यक संस्थान होने को लेकर पहले विवाद नहीं रहा है. लेकिन फिलहाल यह राजनीतिक रूप से एक अहम मुद्दा बनता नज़र आ रहा है और इसकी वजहें भी हैं.

भाजपा 42 विधायकों के साथ 403 सदस्यों वाली विधानसभा के लिए अगले कुछ महीनों में चुनावी मैदान में उतरेगी. पार्टी के पास भले ही राज्य से 73 सांसद हैं लेकिन विधानसभा में भाजपा एक खासी कमज़ोर पार्टी है.

पार्टी चाहती है कि वो 2014 के प्रदर्शन को दोहराए और इसके लिए वो कोई कोर कसर छोड़ने को तैयार नहीं है. लेकिन जो एक सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के सामने है, वो है प्रदेश में अल्पसंख्यक वोटों और पिछड़ों, दलितों के बीच की बनती साझेदारी. मतदान में अगर ये वर्ग एकसाथ आते हैं तो भाजपा के लिए खासी मुश्किल खड़ी हो सकती है.

वोट बैंक की राजनीति

दूसरा यह कि केवल अगड़ों के वोट के सहारे भाजपा पार नहीं उतर सकती. भाजपा को और वोट पाने के लिए दलितों और पिछड़ों के वोटबैंक में सेंध लगानी पड़ेगी.

अगर रोहित वेमुला से लेकर दादरी तक की घटनाओं के कारण दलित मुस्लिम एकता के संकेत मिल रहे हैं, तो यह भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं है.

मायावती खुद दलित वोटों को लामबंद रखना चाहती हैं और मुस्लिम वोटों को अपनी ओर रिझा रही हैं. ऐसे में पार्टी के सामने चुनौती है कि कैसे मुस्लिम दलित वोट के एक होने की संभावनाओं को कमज़ोर किया जाए.

संघ की गणित

यहां अलीगढ़ विश्वविद्यालय का मुद्दा एक माध्यम के रूप में उभरता है. संघ और भाजपा का सीधा निशाना फिलहाल इस संस्थान पर है.

दोनों चाहते हैं कि जहाँ एक ओर केंद्र सरकार के अंतरर्गत आने वाले संस्थान के अल्पसंख्यक दर्जे के औचित्य के बहाने मुसलमानों को अलग खड़ा किया जाए वहीं पिछड़ों को भी इस संस्थान के विरोध में लाया जाए.

दरअसल, जहाँ एक ओर पिछड़े वर्ग के बीच यह प्रचार किया जा रहा है कि इस युनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक होने का तर्क केवल उनके अधिकारों का हनन है और उनके आरक्षण के प्रावधानों की अवहेलना है, वहीं दूसरी ओर यह हिंदू बनाम मुस्लिम जैसे ध्रुवीकरण के लिए भी इसे इस्तेमाल किया जाएगा.

यह चुनाव वर्ष है और केंद्र सरकार का ताज़ा हलफनामा इसी दिशा में एक और कदम है.

बीजेपी की अगली रणनीति

पार्टी अलीगढ़ के मुद्दे को अब सड़कों पर लेकर जाना चाहती है. पिछले दिनों इसे लेकर अलीगढ़ और आगरा के कार्यकर्ताओं की कुछ बैठकें हो चुकी हैं.

इस पर विमर्श किया जा रहा है कि इस मुद्दे को किस तरह से आगे लेकर जाया जाए और इसके लिए उपयुक्त चेहरे और रणनीति क्या होगी.

कुछ दिनों पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम भी इस बाबत आयोजित किया गया था जहाँ उत्तर प्रदेश के दो दर्जन से ज्यादा सांसद मौजूद थे.

इनमें साक्षी महाराज, निरंजन ज्योति, हरबंस सिंह जैसे नाम शामिल हैं. यहां भी इस बात को लेकर चर्चा हुई कि इस मुद्दे पर कैसे आगे बढ़ा जाए.

First published: 9 July 2016, 18:07 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

पिछली कहानी
अगली कहानी