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इशरत जहां: सियासत और न्यायपालिका के गले में अटका 'फर्जी' एनकाउंटर

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 11 February 2016, 17:52 IST

गुजरात हाई कोर्ट की एसआईटी ने जिस इशरत जहां के एनकाउंटर को फर्जी करार दिया था उस इशरत को लश्कर आतंकी डेविड हेडली ने फिदायीन बताकर विवाद खड़ा कर दिया है. मुंबई की विशेष अदालत में चल रही हेडली की गवाही में उसने बताया कि जिस दिन इशरत का एनकाउंटर हुआ, वह अपने कुछ साथियों के साथ पुलिस नाके को बम से उड़ाने के लिए निकली थी.

क्या है इशरत एनकाउंटर से जुड़ा पूरा वाकया?

इस विवाद की शुरुआत 15 जून 2004 को अहमदाबाद में हुए एक एनकाउंटर से हुई. इस एनकाउंटर में इशरत जहां समेत जावेद उर्फ प्रणेश पिल्‍लई, अमजद अली राणा और जीशान जौहर भी मारे गए थे. इस ऑपरेशन में तीन राज्यों की पुलिस, खुफिया एजेंसी आईबी, एक पुलिस कमिश्नर, एक ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर, एक डीसीपी और दो एसीपी समेत पूरी पुलिस टीम शामिल थी. एनकाउंटर के वक़्त इशरत की उम्र महज़ 19 साल थी और वो मुंबई के मुंब्रा इलाके में रहती थी. वह गुरु नानक खालसा कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई कर रही थी.

एनकाउंटर के बाद पुलिस ने दावा किया कि मारे गए चारो व्यक्ति कथित आतंकी हैं और गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी की हत्‍या करने आए थे. इस एनकाउंटर का आधार खुफिया एजेंसियों में मिले इनपुट को बताया गया. पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक 15 जून को अहमदाबाद के एंट्री प्वाइंट नारोल से नीले रंग की एक इंडिका कार गुजरी. एक खुफिया इनपुट के आधार पर तत्कालीन एसीपी एनके अमीन ने इस कार का पीछा करना शुरू कर दिया. अमीन को बताया गया था कि इस कार के अंदर चार आतंकवादी मौजूद हैं और ये लोग नरेंद्र मोदी की हत्या करने के लिए आए हैं.

एनकाउंटर के वक़्त इशरत की उम्र महज़ 19 साल थी और वो मुंबई के मुंब्रा इलाके में रहती थी

पुलिस की कहानी के मुताबिक कुछ देर तक उसका पीछा करने के बाद अमीन और उनके साथी अधिकारी ने फैसला लिया कि इस कार को अहमदाबाद में घुसने देना सुरक्षित नहीं होगा. उन्होंने रास्ते में पड़ने वाली अगली पुलिस चौकी को नाकाबंदी करने के आदेश जारी किया. कोतरपुर इलाके में इस कार को रोकने की कोशिश की गई लेकिन कार में बैठे लोगों ने पुलिसवालों पर फायरिंग कर दी. जवाब में पुलिस टीम ने भी फायरिंग शुरू कर दी और इस फायरिंग में गाड़ी में बैठे चारो कथित आतंकी मारे गए.

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इसके बाद गुजरात क्राइम ब्रांच ने अपनी चार्जशीट में दावा किया कि चारों लोग लश्कर के आतंकवादी थे. इशरत के अलावा मारे गए तीन लोगों में से जावेद शेख पर नकली नोटों की तस्करी करने का आरोप भी था. एक तीसरे शख्स अमजद अली राणा को पुलिस ने पाकिस्तानी नागरिक बताया, हालांकि जांच में वो इससे संबंधित कोई सबूत नहीं दे पाई. पुलिस ने चौथे शख्स जीशान जौहर को भी पाकिस्तानी नागरिक बताया था. हालांकि जीशान और अमज़द के शवों पर किसी ने कोई दावा नहीं किया.

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बता दें कि एनकाउंटर के एक महीने बाद लश्कर के माउथपीस माने जाने वाले गजवा टाइम्स ने इशरत और उसके साथ मारे गये लोगों को मुजाहिदीन करार देते हुए, इशरत के शव को बिना पर्दा जमीन पर लिटाये जाने पर ऐतराज जताया था. इसके करीब तीन साल बाद दो मई, 2007 को लश्कर के एक और फ्रंट जमात उद दावा ने इशरत का खुद से कोई संबंध न बताते हुए पूरे मामले से पल्ला झाड़ लिया. हालांकि ख़ुफ़िया एजेंसियों ने इसे आतंकी संगठनों की रणनीति करार दिया था.

छह अगस्त 2009 को आईबी और गृह मंत्रालय ने इस मामले में अपना हलफनामा दायर किया. इन दोनों हलफनामों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि इशरत और जावेद करीबी दोस्त थे और साथ मिलकर लश्कर के लिए काम कर रहे थे. आईबी का दावा है कि जावेद मार्च 2004 में ओमान जाकर लश्कर के कमांडर मुजम्मिल से भी मिला था. जावेद और इशरत पति-पत्नी बनकर एनकाउंटर से पहले अहमदाबाद, लखनऊ और फैजाबाद जिले के इब्राहिमपुर में होटलों में जाकर रुके थे. हालांकि इशरत की मां शमीमा कौसर ने पूरी कहानी को झूठा बताते हुए पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की.

इससे घटना में नया मोड़ आ गया. केंद्र सरकार को दूसरा हलफनामा दाखिल करना पड़ा. ये हलफनामा आरवीएस मणि के ज़रिए 29 सितंबर, 2009 को दाखिल करवाया गया. इसमें कहा गया कि केंद्र सरकार को इस मामले मे सीबीआई जांच से कोई परहेज़ नहीं है और आतंकियों के बारे में खुफिया सूचना देने का मतलब ये नहीं कि गुजरात पुलिस उसको आधार बनाकर सबको गोली मार दे.

गुजरात हाईकोर्ट के निर्देश पर बनी एसआईटी ने 2011 में इशरत एनकाउंटर को फर्जी करार दिया

असली बवाल अहमदाबाद के न्यायिक मजिस्ट्रेट एसपी तमांग की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद शुरू हुआ. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में इशरत के एनकाउंटर को फर्जी करार दिया और आरोप लगाया कि इसमे शामिल पुलिस अधिकारियों ने शोहरत और प्रमोशन के लिए नृशंस तरीके से इशरत समेत चारो लोगों की हत्या की है.

इसके बाद हर दिन के साथ इशरत के मामले में एक नया मोड़ आने लगा. गुजरात हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित डीजीपी आरआर वर्मा की अगुआई वाली एसआईटी ने 2011 में इशरत एनकाउंटर को फर्जी करार दिया. SIT ने कहा कि इशरत के आलावा बाकी तीन लोगों पर अपराधिक मामले दर्ज थे लेकिन इशरत का बिना किसी मज़बूत आधार के एनकाउंटर कर दिया गया.

एसआईटी की रिपोर्ट के आधार पर ही हाईकोर्ट ने पूरे केस की सीबीआई जांच के आदेश भी दे दिए. कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने 16 दिसंबर 2011 को मामले में पहली FIR दर्ज की. इस एनकाउंटर के नौ साल बाद सीबीआई ने तीन जून 2013 को पहली चार्जशीट दायर की.

सीबीआई ने भी मुठभेड़ को फर्जी करार दिया. इस केस में गुजरात के एडीजीपी पीपी पांडे, पूर्व डीआइजी डीजी वंजारा, आइपीएस जीएल सिंघल समेत तरुण बारोट, एनके अमीन, जेजी परमार और अनाजू चौधरी को आरोपी बनाया गया. इस केस में अमित शाह को भी नोटिस जारी किया गया था, हालांकि उन्हें बाद में क्लीन चिट दे दी गई.

2010 में यह खबर आई कि लश्कर आतंकी डेविड कोलमैन हेडली ने एनआईए की पूछताछ में इशरत को भी लश्कर आतंकी बताया है तो एक बार फिर इस मामले ने तूल पकड़ लिया. आईबी, सीबीआई और एनआईए आपस में ही एक दूसरे से उलझ गए. अपने एक वरिष्ठ अधिकारी राजेंद्र कुमार पर इस मामले की आंच आती देख आईबी उन्हें बचाने के लिए होम मिनिस्ट्री तक पहुंच गई.

इशरत केस में अमित शाह को भी नोटिस जारी किया गया था, हालांकि उन्हें क्लीन चिट मिल गई

इस मामले में फंसे ज़्यादातर पुलिस अधिकारी एक अन्य फर्जी एनकाउंटर केस में भी सज़ा काट रहे हैं. डीजी वंजारा 2005 में हुए सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर में मुख्य आरोपी हैं जबकि जेजी परमार और तरुण बरोट भी सादिक जमाल फर्जी मुठभेड़ मामले में आरोपी हैं. इशरत मामले में आरोपी एडीजीपी पीपी पांडे भी गिरफ्तार हो चुके हैं. आरोपी बनाए जाने के बाद से ही वे फरार हो गए थे और उन्‍होंने सुप्रीम कोर्ट में अग्रिम ज़मानत याचिका भी दायर की थी हालांकि फैसला उनके खिलाफ रहा. सीबीआई का दावा है कि पांडे ही इशरत एनकाउंटर के मास्टर माइंड थे.

इशरत को लेकर हेडली के खुलासे पर भी कई सवाल उठने शुरू हो गए हैं. भारत की तीन एजेंसियों के बीच जारी उठापटक में हेडली को एनआईए और आईबी का मोहरा माना जा रहा है. उधर पाकिस्तान ने भी आरोप लगाया है कि भारत हेडली का इस्तेमाल अपने फायदों के लिए कर रहा है. हेडली के खुलासों पर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है. एक बात साफ है कि इससे मोदी सरकार को राहत मिलती दिख रही है.

जिन लोगों ने इशरत को निर्दोष बताया था उनके ऊपर शोशल मीडिया में हमले शुरू हो गए हैं. सामाजिक कार्यकर्ता मधु किश्वर ने पत्रकार राणा अयूब को ट्विटर पर निशाना बनाया है. वे उनसे सबूत मांग रही हैं. हालांकि बाद में किश्वर ने वह ट्वीट डिलीट कर दिया.

First published: 11 February 2016, 17:52 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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