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स्मृति ईरानी को एक अनाम नौकरशाह का पत्र

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 February 2016, 20:59 IST
QUICK PILL
संसद भवन में अपने आक्रामक रुख के चलते इन दिनों मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी चर्चा में हैं. एक तरफ उनकी आक्रामता की तारीफ हो रही है तो कुछ लोग इसकी आलोचना भी कर रहे हैं. एक वरिष्ठ नौकरशाह हैं जिन्होंने स्मृति ईरानी के बयान के मद्देनजर उन्हें एक खुला पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने तमाम पूछे हैं. हालांकि वो अपना नाम उजागर नहीं करना चाहते. यहां हम उनका पत्र जस का तस प्रकाशित कर रहे हैं.

प्रिय स्मृति जी,

लोकसभा में आपका भाषण सुना. ज़बर्दस्त तेवर थे. ख़ूब गरजीं आप. लेकिन मुझे दुःख हुआ. दुःख हुआ क्यूंकि मुझे आपके भाषण में युद्धघोष का स्वर सुनाई दिया. दुःख हुआ क्यूंकि मैं मानता हूं कि जब देश में जनता उद्विग्न हो, आक्रोशित हो, तब संसद में मंत्री का भाषण ज़ख़्मों पर रुई के नरम फ़ाहे जैसा होना चाहिए.

लेकिन आप ने ऐसा नहीं किया. आप ने अपनी कला का पूरा इस्तेमाल ख़ुद को निर्दोष साबित करने में कर दिया, जबकि राजधर्म का अर्थ तो सबसे पहले देश में अमन शांति पैदा करना है. देश में छात्रों का एक बड़ा वर्ग उद्वेलित है. लेकिन उनकी चिंताओं पर आपने एक शब्द नहीं कहा. बस कही तो अपनी बात और वह भी इस अन्दाज़ में कि जो आपके तर्क से सहमत ना हों, वो आपके तेवर तो कम से कम समझ ही जाएं.

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कन्हैया जेल में है, देशद्रोह के आरोप में. लेकिन यह नहीं बताया कि आख़िर देशद्रोह था क्या. आपने वो नारे पढ़ कर सुनाए जो उसकी मौजूदगी में लगे. लेकिन वह तो सिर्फ़ मौजूद था. आपने यह नहीं बताया कि पूरे सरकारी तंत्र और इंटेलिजेेंस के तामझाम के बावजूद नारे लगाने वाले लोग कौन थे, कहां हैं और अभी तक पकड़े क्यूं नहीं गए.

क्या आपकी सरकार ने प्रशासन और सत्ताधारी राजनैतिक संगठनों का फ़र्क़ समाप्त कर दिया है?

और हां, आपने आरोप सुनाया कि जेएनयू में सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए बुकिंग की गयी थी लेकिन राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया. ज़रा इनका फ़र्क़ आरएसएस से भी पूछ लें, स्वयं आपके यहां इस मामले में बहुत महारत हासिल है.

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आपने किताबों से पढ़ कर सुनाया कि कैसी कैसी बातें शिक्षकों को सिखायी जा रही हैं. पोस्टरों का ज़िक्र किया जो हिंदू देवी के ख़िलाफ़ थे. आपको यह सब आपत्तिजनक लगा होगा, मुझे भी लगता है, लेकिन इनसे कन्हैया देशद्रोही कैसे हो गया? आपने नहीं बताया.

आपने ठीक कहा कि इन मुद्दों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. मैं भी सहमत हूं. लेकिन यह भी तो समझा दीजिए कि एबीवीपी की शिकायतों पर हुई आपकी तमाम कार्यवाही अराजनीतिक कैसे हुई? क्या आपकी सरकार ने प्रशासन और सत्ताधारी राजनैतिक संगठनों का फ़र्क़ समाप्त कर दिया है?

मैंने देखा कि रोहित वेमुला की बात करते करते आप द्रवित हो उठी . मां के दिल का वास्ता दिया. किसी बेटे के जाने का दर्द महसूस किया. लेकिन आप ने यह नहीं बताया कि जिसे आपके मंत्री ने देशद्रोही कहा था, वह मृत्यु उपरांत देश का बेटा कैसे हो गया?

स्मृति ईरानी जी मुझे दुःख हुआ क्यूंकि आपके भाषण में युद्धघोष का स्वर सुनाई दिया

आपने यह भी तो नहीं बताया अगर तमाम वैचारिक मतभेद के बावजूद रोहित देश का बेटा हो सकता है, आपका ह्रदय उसके लिए द्रवित हो सकता है, तो फिर उसी की सोच रखने वाले हज़ारों हज़ार छात्र जो सड़कों पर उतरे हैं, उनके लिए आपकी इतनी बेरुख़ी क्यूं है. आप उनसे वार्ता तक नहीं कर रहीं, पूरे भाषण में उन्हें सम्बोधित तक नहीं किया, बल्कि पूरे समय उनके प्रति आपकी युद्ध भंगिमा ही नज़र आयी.

क्या ये हज़ारों बच्चे देश के बेटे बेटियां नहीं हैं? क्या ये सभी देश हित के ख़िलाफ़ हैं? मानता हूं कि आपके बाद देश के गृहमंत्री बोले तो उन्होंने कहा कि वह जेएनयू को देश का उत्कृष्ट शिक्षण संस्थान मानते हैं. लेकिन न आपने, न ही उन्होंने बताया कि आपके ही नेता और सोशल मीडिया सैनिक उस यूनिवर्सिटी को क्यूं बदनाम करने पर तुले हैं?

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आप और आपकी सरकार उन्हें रोकती नहीं है. आप यह नहीं कह सकतीं कि आप लोग इन सोशल मीडिया सैनिकों को नहीं जानते, क्यूंकि देश के प्रधानमंत्री ने पिछले साल ख़ुद ही उन्हें अपने घर पर आमंत्रित कर उनका आभार व्यक्त किया था और हौसला बढ़ाया था.

संसद में तारीफ़ और बाहर आक्रमण का यह तरीक़ा बेचैन करने वाला है. यह सब एक कहावत की याद दिलाता है- मुंह में राम, बग़ल में छुरी. देश के मंत्रियों के संदर्भ में ऐसी कहावत का याद आना मुझे अंदर तक हिला देता है, डरा देता है.

अगर एक भी वीसी उनपर संघ का एजेंडा लागू करने का आरोप लगाए तो आप इस्तीफ़ा दे देंगी?

यह डर इसलिए भी है क्यूंकि आपने या आपके किसी साथी मंत्री ने इसी मामले पर बोलते हुए कोर्ट परिसर में वकीलों के उत्पात पर एक शब्द नहीं कहा, मानो ये कोई बड़ी बात ही नहीं हो. अगर इंडिया गेट के पास स्थित कोर्ट परिसर में ऐसी गुंडागर्दी कोई चिंता नहीं जगाती, हजार दो हजार किलोममीटर दूर दराज़ के इलाक़ों में स्थिति की भयावहता का सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है. अगर मैं सही समझ रहा हूं तो देश भर में आपकी सरकार कोई संकेत दे रही हैं?

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आपने कहा कि देश की ज्यादातर युनिवर्सिटी के वीसी पिछली सरकार के चुने हुए हैं. अगर एक भी वीसी उनपर संघ का एजेंडा लागू करने का आरोप लगाए तो आप इस्तीफ़ा दे देंगी. पर शायद आप भूल गईं कि आपकी कार्यप्रणाली के ख़िलाफ़ मशहूर परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोदकर आईआईटी मुंबई के चेयरमेन के पद से और शिवगांवकर IIT दिल्ली के निदेशक के पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं. अब याद आ गया है तो क्या अब आप इस्तीफ़ा देंगी?

हम जानते हैं कि आप न तो इस्तीफ़ा देंगी ना ही हज़ारों हज़ार आंदोलनकारी छात्रों से कोई बात करेंगी . क्यूँकि अतिरेक से परे, आपकी मंशा शिक्षा के विकास की नहीं है, विश्वविध्यालयों को पनपाने की नहीं है, बल्कि उन्हें क़ब्ज़ाने की है.

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आपका भाषण इसीलिए मुझे दुखी कर गया. वह शब्द और वह तेवर 125 करोड़ देशवासियों की प्रतिनिधि होने की ज़िम्मेदारी का अहसास नहीं कराते, क्षोभ और आक्रोश को शांत करने का प्रयास नहीं करते, बल्कि सत्ता की ताक़त और व्यक्तिगत खुन्नस की जुगलबंदी से ख़ौफ़ज़दा करने की कोशिश करते नज़र आते हैं.

(अपना नाम नहीं लिख रहा हूं क्यूंकि आपके भाषण में छिपे संदेश को कुछ-कुछ समझ रहा हूं और डरा हूं, एक लड़का देशद्रोह के आरोप में जेल में है)

First published: 26 February 2016, 20:59 IST
 
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