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चुनावी गणित में भूलती जा रही है संवैधानिक जिम्मेदारी

जगदीप एस छोकर | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
(कैच)

आम तौर पर चुनावी विश्लेषण किसी एक चुनावी नतीजे पर केंद्रित होता है. ये कुछ वैसा ही हुआ कि हम पेड़ों को गिनती करें लेकिन जंगल को भूल जाएं. लेकिन हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों के समग्र अध्ययन से जंगल के विश्लेषण का अवसर मिला. 

सीएसडीएस लोकनीति ने पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव के नतीजों का सार पेश किया था. इसमें कहा गया हैः

"भाजपा की असम में पहली जीत के पीछे एक सामाजिक समीकरण है. असम राज्य अपनी अंतरव्यापी जातीय विविधता के लिये प्रसिद्ध है, वहां हिन्दू-मुस्लिम के बीच एक सामाजिक दरार उभरी है."

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"हमारे सर्वे के अनुसार राज्य में भाजपा अच्छी-खासी संख्या में नायर, एझावा और एससी वर्ग के लोगों को रिझाने में कामयाब रही. वहीं कांग्रेस अल्पसंख्यक बन कर रह गई."

इसका राज्य के अन्तर जातीय सन्तुलन पर काफी गहरा प्रभाव है. असम की तरह केरल चुनाव में भी धार्मिक घटक हावी है. 

संभव है यह निष्कर्ष गलत हो लेकिन चाहें कम ही सही है लेकिन इनके सही होने की संभावना भी है. यहां सवाल उठता है क्या धार्मिक एकीकरण, चुनावी अंकगणित के लिए उचित है?

धार्मिक एकीकरण

धार्मिक एकीकरण की घटना किसी एक पार्टी, धर्म या क्षेत्र तक सीमित नहीं है. अक्सर कहा जाता है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी, मुस्लिम वोट पाने में कामयाब रहती हैं. हालांकि आॅल इण्डिया यूनाइटेड, डेमोक्रेटिक और आॅल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तिहाद-उल-मुस्लिमीन कथित रूप से मुस्लिम पार्टी के तौर पर जानी जाती है.

शिरोमणी अकाली दल सिख वोट को आकर्षित करने के लिए जाना जाता है. इस राजनैतिक दल के ऊपर कोर्ट केस भी चल रहा है. ऐसे ही शिवसेना मराठी हिन्दूओं की पार्टी के तौर पर जानी जाती है. ये विचार कहां तक ठीक है, विवाद का विषय है. 

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इस तथ्य को नजरअंदाज करते हुये कि वर्तमान में धार्मिक घटक राजनीति में काफी हावी है, यह सवाल अब भी वैध कि क्या धार्मिक एकीकरण चुनावी अंकगणित के लिए आवश्यक है? दूसरा सवाल ये है कि क्या चुनावी और राजनैतिक प्रक्रिया के लिए एकीकरण महत्वपूर्ण है? एकीकरण किसी विचारधारा से प्रेरित होता है. लेकिन भारत में जाति और धर्म जैसे कई मुद्दों के लिए राजनीति में एकीकरण होता है.

महत्वपूर्ण बात ये है कि भारत में धर्म के नाम पर एकीकरण उसी तरह से देखा जाना चाहिए जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर एकीकरण होता है.

ऐसे में हमें देश के बुनियादी दस्तावेजः भारतीय संविधान की मदद लेना वाजिब होगा. संविधान की प्रस्तावना में देश को संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की बात कही गई है.

धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा

धर्मनिरपेक्ष एक पेचीदा शब्द है जिसको सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के सन्दर्भ में समझा जा सकता है. एसआर बोमई बनाम भारत सरकार (1994 एआईआर 1919) में सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की पीठ द्वारा लिये गये निर्णय के कुछ अंश:-

"...राज्य में कोई भी धर्म और धार्मिक पंथ हो लेकिन वो राज्य की धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों में बाधा नहीं बनेंगे."

’’राज्य की धार्मिक सहिष्णुता उस राज्य को धार्मिक राज्य नहीं बनाती है.’’

’’राज्य में धर्म की आजादी और सहिष्णुता, आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने के लिए है.’’

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यह उपखण्ड 3 के खण्ड 123 रिप्रजेंटेशन आॅफ द पीपुल एक्ट 1951 के अनुसार, ’’किसी चुनावी उम्मीदवार द्वारा धर्म, नस्ल, जाति और भाषा के आधार पर वोट की अपील को प्रतिबंधित करता है.’’ इसी खण्ड के (3-ए) के अनुसार ऐसे चुनाव प्रचार को प्रतिबंधित करता है जिससे धर्म, नस्ल, जाति में दुर्भावना या शत्रुता उत्पन्न होने की संभावना हो.

जब एक वकील ने ये तर्क दिया कि उपयुक्त सेक्शन वास्तव में चुनावी उम्मीदवार को धर्म के नाम पर अपील करने से प्रतिबंधित नहीं करता तो उसके उत्तर में न्यायालय ने कहा, "निश्चित रूप से किसी धर्म विशेष की बुराई करना या धर्म के नाम पर वोट मांगना प्रतिबंधित है.’’

चुनाव में धार्मिक ध्रवीकरण शुद्ध रूप से असंवैधानिक है लेकिन ये जाति और आर्थिक श्रेणियों के नाम पर चुनावी अपील करने से अलग है. अब यह पूर्ण रूप से हम पर निर्भर करता है कि समाज और राष्ट्र होने के नाते हम पाखंडी बनकर संविधान की अनदेखी करना चालू रखें या शुर्तुमुर्ग की तरह सिर रेत में गड़ाकर अंजान बने रहे या फिर हम इन चीजों के खिलाफ संघर्ष करें.

हम अपनी जिम्मेदारी उस न्यायपालिका पर डाल सकते है मगर न्यायपालिका का समाज के बगैर कोई अस्तित्व नही है. ये एक सामाजिक मुद्दा है और समाज को इस पर निर्णय लेना होगा.

First published: 15 June 2016, 10:12 IST
 
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