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इस अग्नि का मकसद बस्तर में आग लगाना ही है

राजकुमार सोनी | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST

आदिवासी, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के साथ की गई अमानवीय यातनाओं को लेकर शनिवार को जब बस्तर बंद था और उसकी हलचल देश की राजधानी दिल्ली में भी देखी जा रही थीं लगभग उसी दौरान सोशल मीडिया पर छपी दो पोस्ट से बवाल मचा हुआ था. एक पोस्ट वर्दी पहने हुए जगदलपुर के एसपी आरएन दास की थी जिसमें उन्होंने लिखा  था- 'दिल्ली में कुछ चोर लोग बस्तर के भाग्य से चांद को छूना चाह रहे हैं. वे डंडा भी भूल गए. फोटो देखा, जैसे नक्सलियों के पालतू कुत्ते. जय हो. ना रहेगा बांस और बजेगी बांसुरी.

दूसरी पोस्ट में लिखा था- 'दिल्ली में माओवादी समर्थक इंटरव्यू में मस्त हैं, मगर बस्तर पुलिस माओवादियों के उन्मूलन में व्यस्त है.'

यह एक जिले के पुलिस कप्तान की भाषा है जिसमें धमकी और गाली दी जा रही है. इन दोनों पोस्टों का निशाना हाल ही में जमानत पर रिहा हुए पत्रकार प्रभात सिंह को माना जा रहा है. गौरतलब है कि माओवाद समर्थक होने के आरोप में प्रभात सिंह को जेल में डाल दिया गया था. प्रभात सिंह पिछले हफ्ते जमानत पर रिहा होने के बाद दिल्ली में थे.

इन दोनों पोस्टों के आने चंद घंटों बाद ही बस्तर में माओवादियों के खिलाफ संघर्ष करने के लिए एक्शन ग्रुप फॉर नेशनल इंटेग्रिटी यानी 'अग्नि' नाम के एक नए संगठन का उदय हो गया.

इस आग पर पानी डालने के मकसद सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने तत्काल ही पीपुल्स एक्शन फॉर नेशनल इंटीग्रेशन यानी 'पानी' नामक संगठन बनाने की घोषणा की. 'अग्नि' दरअसल बदले हुए नाम की आड़ में कुछ पुराने लोगों का नया संगठन भर है. इसके कर्ताधर्ता वही लोग हैं जिन्होंने सलवा-जुडूम और सामाजिक एकता मंच का गठन किया था.

बदनाम हो गया बस्तर

अग्नि के संयोजक आनंद मोहन मिश्रा कहते हैं, 'देश-प्रदेश के कथित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने माओवाद के नाम पर बस्तर को बदनाम कर दिया है. स्थानीय मीडिया में तो जैसे-तैसे बस्तर की वस्तुस्थिति प्रकाशित हो जाती है, लेकिन प्रदेश के बाहर और विदेशी मीडिया में बस्तर का चेहरा बेहद डरावना बताया जाता है.'

उन्होंने कहा कि उनके संगठन में सलवा जुडूम और सामाजिक एकता मंच के फारुख अली, संपत झा, सुब्बा राव, मधुकर राव जैसे अन्य कई कार्यकर्ता, व्यवसायी और बुद्धिजीवी जुड़े हुए हैं. मिश्रा के मुताबिक सामाजिक एकता मंच का दायरा केवल बस्तर तक सीमित था लेकिन अग्नि उन सभी जगहों पर अपनी दस्तक देगा जहां-जहां भी माओवाद या आंतकवाद मौजूद है.

मिश्रा का कहना है कि उनका नया संगठन माओवाद के खात्मे के लिए उन सभी लोगों से मदद लेगा जिनका भरोसा लोकतंत्र पर है चाहे वह बस्तर के आईजी शिवराम कल्लूरी हों या कोई और.

फिर से डराएंगे गुंडे और बदमाश

सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार का कहना है कि पुलिस हर दूसरे रोज यह दावा करती है कि बस्तर से माओवाद का खात्मा हो गया है तो फिर माओवाद से लड़ने के लिए सलवा- जुडूम पार्ट-3 क्यों पैदा किया गया.

हिमांशु का आरोप है कि नए संगठन अग्नि को बस्तर पुलिस ने संरक्षण देकर गुंडे और बदमाशों को यह अवसर दे दिया है कि वे बस्तर में लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्षरत बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और पत्रकारों का सिर कुचले.

हिमांशु बताते हैं कि सामाजिक एकता मंच को भंग करने की वजह यह थी कि सलवा जुडूम को ठिकाने लगाने वाली प्रोफेसर नंदिनी सुंदर ने इस मंच के खिलाफ भी याचिका दायर कर दी थी. मंच के भंग होने के साथ ही यह साफ हो गया था कि टकराव के लिए कुछ दूसरे छद्म मंच बनाए जाएंगे, अग्नि, सलवा जुडूम और सामाजिक एकता मंच का विस्तार भर है.

छत्तीसगढ़ में लंबे समय काम कर रही लीगल एड की सदस्य ईशा खंडेलवाल बताती हैं, 'बस्तर की पुलिस ने सामाजिक एकता मंच की तर्ज पर आदिवासी महिला एकता मंच, संघर्ष समिति जैसे दो दर्जन छद्म संगठन खड़े कर रखे हैं. जब सामाजिक एकता मंच भंग किया गया था तब मैंने कहा था पुलिस अन्य संगठनों को पाल-पोसकर खड़ा करेगी. नया संगठन अग्नि भी पुलिस के असंवैधानिक कामों को बढ़ावा देने के लिए सामने आया है.'

बस्तर बनाम प्रयोगशाला

माओवाद के खात्मे के लिए बस्तर में कई तरह के प्रयोग हो चुके हैं, लेकिन किसी भी प्रयोग को सफलता नहीं मिल पाई है. सलवा जुडूम से पहले एक वरिष्ठ पुलिस अफसर दिनेश जुगरान बस्तर में हल्ला बोल नाम का एक कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं. हल्ला बोल में बस्तर की नाट्य मंडलियां गांव-गांव में दस्तक देती थी और गा-बजाकर यह संदेश देने का प्रयास करती थी कि जब तक ग्रामीण पुलिस का साथ नहीं देंगे और खुद को बलवान नहीं बनाएंगे तब तब लुटेरे और डाकू (माओवादी) उन्हें लूटते रहेंगे.

जवाब में माओवादियों की सांस्कृतिक मंडलियां भी ग्रामीणों को यह समझाने का प्रयास करती रहीं कि गांव की बेटियों की अस्मत पर डाका डालने वाले कौन है? उनके मुर्गे और बकरे और धान को कौन लूटकर ले जाता है?

हल्ला बोल के बंद होने के बाद वर्ष 2005 में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा की अगुवाई और सरकार के संरक्षण में सलवा-जुडूम अभियान शुरू हुआ. पहले-पहल तो इस अभियान को स्वत:स्फूर्त बताया गया, लेकिन बाद में इस अभियान की पोल खुलने लगी. सलवा जुडूम अभियान के दौरान हिंसक घटनाओं में इजाफा हुआ. लगभग 644 गांव सलवा जुडूम ने इस दौरान खाली कराए और 50 हजार से ज्यादा आदिवासी राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भुपेश बघेल कहते हैं, 'बस्तर की पुलिस माओवादियों से सीधे लड़ना नहीं चाहती. वह आदिवासियों से आदिवासियों को लड़ाती है. हम सब माओवाद का खात्मा चाहते हैं, लेकिन इस खात्मे में गरीब ग्रामीणों और आदिवासियों को मोहरा नहीं बनाना चाहिए.'

आदिवासियों के हाथों में बंदूक थमाकर माओवादियों से मुकाबला करने के प्रयोग पर जब सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई तब जुडूम को बंद किया गया. इसके बाद छिटपुट तरीके से कभी दंतेश्वरी विकास समिति माओवादियों से लोहा लेने की बात करती रही तो कभी बस्तर विकास समिति, आदिवासी महिला मंच तो कभी सामाजिक एकता मंच.

राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इस कदम का समर्थन किया है. उन्होंने कहा, 'माओवादियों के खिलाफ अगर लोग संगठन बना रहे हैं तो यह हिम्मत का काम है. अगर कोई आवाज उठाता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. यह अच्छी बात है.'

इसलिए उठा विवाद

अग्नि के गठन के बाद से नया विवाद इसलिए खड़ा हो गया है क्योंकि इसमें जुड़े लोग सलवा जुडूम और सामाजिक एकता मंच के लिए कार्य करते रहे हैं. सामाजिक एकता मंच का गठन दिसम्बर 2015 में किया गया था लेकिन अपने गठन के कुछ दिनों बाद ही यह मंच नकारात्मक सुर्खियां बटोरने लगा था.

पहली बार यह मंच सुर्खियों में तब आया जब एक कुख्यात माओवादी लक्ष्मण और कोसी का धूमधाम से विवाह करवाया गया. इस विवाह समारोह में बस्तर के आईजी कल्लूरी सहित कई पुलिस अफसर गले में नोटों की माला डालकर शामिल हुए थे. उस वक्त यह सवाल उठा था कि एक माओवादी की भव्य शादी का खर्चा किसने उठाया?

जगदलपुर लीगल एड से जुड़ी शालिनी गेरा, ईशा खंडेलवाल और सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया को बस्तर छोडऩे के लिए विवश करने के मामले में भी इस मंच की भूमिका सामने आई थी. यही बात आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी के ऊपर किए गए केमिकल हमले के बाद भी कहीं गई.

अग्नि के गठन के साथ बस्तर इलाके में नए सिरे से आग लगने की प्रबल संभावना है.

First published: 18 July 2016, 8:07 IST
 
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