Home » इंडिया » Anti-trafficking draft bill: Here is all you need to know
 

‘मानव तस्कर’ को सजा दो, तस्करी के पीड़ितों को नहीं

श्रिया मोहन | Updated on: 11 June 2016, 14:12 IST
(कैच न्यूज)

वर्तमान समय में मानव तस्करी पूरी दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है. 30 मई को महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने भारत में ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिये बहुत लंबे समय से लंबित पड़े मानव तस्करी (एंटी-ट्रैफिकिंग) विधेयक के मसौदे को ‘‘खामियों को दूर करने और भारतीय दंड संहिता में स्थान बना पाने में असफल रहे अतिरिक्त अपराधों को शामिल करने’’ के प्रयास के रूप में पेश किया.

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस महीने के अंत तक इस बिल पर सुझाव आमंत्रित किये हैं जिसके बाद इसे संशोधित करते हुए संसद के शीतकालीन सत्र में सदन के सामने पेश किया जाएगा. कैच ने इस बिल की विस्तृत पड़ताल की है:

पढ़ें: मुंबई के वैश्यालयों में सबसे बड़ी संख्या बांग्लादेशी युवतियों की

इस विधेयक के मसौदे में आने वाला सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि इसमें ‘मानव तस्कर’ और ‘पीड़ित’ के बीच व्यापक भेद किया गया है जिसके माध्यम से पीड़ित के पुनर्वास पर ध्यान देते हुए उसके प्रति सुरक्षात्मक दृष्टिकोण दिखाया जा सके और आरोपी तस्कर के खिलाफ कठोरतम कानूनी कार्रवाई कर उसे सजा दी जा सके.

यह मानव तस्करी के खिलाफ लागू मौजूदा कानून से बिल्कुल उलट है जिसमें पीड़ित को भी आरोपी की ही तरह जेल भेजा जाता है और फिर उसे भी सजा दी जाती है. लिहाजा इस नए मसौदे को पीड़ितों के प्रति सहानुभूति रखने वाला कहा जा सकता है. प्रस्तावित कानून में उनकी सुरक्षा और पुनर्वास के लिये एक विस्तृत रूपरेखा भी तैयार की गई है.

विशेष अदालतों, समितियों और जांच एजेंसियों की स्थापना

मानव तस्करी के मामलों को तेजी से निबटाने के लिये विशेष अदालतों का गठन करने के अलावा जिला, राज्य और केंद्रीय स्तर पर मानव-तस्करी विरोधी समितियों और विभिन्न राज्यों के बीच सामंजस्य और कार्य का समन्वय स्थापित करते हुए तस्करी से संबंधित मामलों की खुफिया जानकारी जुटाने के लिये विशेष जांच एजेंसी स्थापित करना इस योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.

विशेषज्ञों की राय में अभी देखना बाकी है कि इस कानून से अपराध को रोकने की दिशा में कितनी सफलता मिलती है.

विभिन्न अपराधों में दंड का प्रावधान करना

प्रस्तावित विधेयक में पीड़ितों को आश्रय उपलब्ध करवाने वाले संरक्षण गृह के प्रभारी को उसके अधिकारों के उल्लंघन का दोषी पाये जाने पर एक वर्ष के कारावास या फिर कम से कम एक लाख रुपये के जुर्माने से दंडित करने का प्रस्ताव भी किया गया है.

सरकार ने पीड़ितों के पुनर्वास और कल्याण के लिये एक नए कोष का प्रस्ताव भी दिया है

सबसे दिलचस्प बिंदु यह है कि अगर कोई मीडिया संस्थान तस्करी के पीड़ितों की पहचान किसी भी तरीके से सार्वजनिक करने का दोषी पाया जाता है तो वह छः महीने के कारावास या एक लाख रुपये तक के जुर्माने या फिर दोनों सजाओं का उत्तरदायी होगा.

पढ़ें: कमाठीपुरा की गलियों में पढ़ाने वाली रॉबिन दुनिया की टॉप 10 शिक्षकों में शामिल

इसके अलावा विधेयक का मसौदा तस्करी या शोषण के इरादे से नशीले या रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल को भी अपराध की श्रेणी में लाता है, जो पहले के कानून में नहीं था.

ऐसे मामले में दोषी पाये जाने पर आरोपी को सात से 10 वर्ष तक के कारावास का सामना करना पड़ सकता है. शोषण के इरादे से रासायनिक पदार्थों या हारमोन्स के इस्तेमाल को भी समान सजा के लिये दंडनीय बनाया गया है. इसके अलावा इन दोनों अपराधों का दोषी पाये जाने पर एक लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान भी इसमें है.

विशेषज्ञों ने इस कदम को बेहद महत्वपूर्ण माना है क्योंकि ऐसा होने से रेड-लाइट क्षेत्रों में तस्करी के पीड़ितों को आॅक्सिटोसिन के इंजेक्शन लगाने पर रोक लगेगी जिनका प्रयोग उन्हें जल्द बड़ा दिखाने के लिये और जल्द से जल्द वयस्क बनाने के लिए किया जाता है. अब इस तरह के कृत्य दंडनीय अपराध की श्रेणी में आएंगे.

पुनर्वास का अधिकार, एक नई पहचान

इस नए विधेयक में तस्करी के सभी पीड़ितों के लिये नई पहचान और तस्करी की गई महिलाओं के लिये सुरक्षा प्रोटोकाॅल के माध्यम से पुनर्वास के अधिकार का प्रस्ताव दिया गया है. यह पीड़ित की पहचान की रक्षा करने के प्रावधानों के अलावा उन्हें एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिये आवश्यकता पड़ने पर एक नई पहचान भी देता है.

एजेंसियों का पंजीकरण अनिवार्य करना, जो पहले से ही है

नए विधेयक के जिस पहलू की सर्वाधिक आलोचना हो रही है वह यह है कि इस बिल के प्रावधान अनैतिक तस्करी (प्रिवेंशन) एक्ट-1956 जैसे ही हैं जिनमें यह सुधार करने की बात करता है.

नए विधेयक में सभी पीड़ितों के लिये पुनर्वास के अधिकार का प्रस्ताव दिया गया है

सबसे बड़ी समानता यह है कि यह मानव तस्करी के सबसे बड़े अड्डे के रूप में जानी जाने वाली प्लेसमेंट एजेंसियों के पंजीकरण को अनिवार्य करने की बात करता है. लेकिन प्लेसमेंट एजेंसियों के लिये पंजीकरण करवाना पहले से ही अनिवार्य है.

पढ़ें: भारत में आतंकवाद से ज्यादा मौतें प्रसव के दौरान माता और शिशुओं की होती हैं

एक और बड़ी समस्या यह कि अब तक कोई भी पंजीकरण की इस अनिवार्य प्रक्रिया को लागू करने का तरीका नहीं खोज पाया है और ऐसे में हजारों की संख्या में अवैध प्लेसमेंट एजेंसियां एक अवैध व्यापार के माध्यम से मोटा मुनाफा कमा रही हैं.

हालांकि अगर कोई प्लेसमेंट एजेंसी पंजीकरण की शर्तों का उल्लंघन करती हुई पाई जाती है तो उसका पंजीकरण निलंबित या फिर रद्द भी किया जा सकता है.

धन के उपयोग की अस्पष्टता

सरकार ने पीड़ितों के पुनर्वास और कल्याण के लिये एक नए कोष का प्रस्ताव भी दिया है लेकिन उसमें इस धन के प्रयोग को लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं है. इस बिल के अनुसार राशि को कोष में स्वैच्छिक दान, योगदान या फिर किसी व्यक्ति या संस्थान के माध्यम से कोष में जमा किया जा सकता है.

इसको लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं किया गया है मसलन राशि कितनी होगी, उसका प्रबंधन कौन करेगा, उसका विशेष रूप से इस्तेमाल कैसे किया जाएगा इत्यादि. हमें इस बात का डर है कि कहीं इसकी हश्र भी निर्भया फंड की तरह ही न हो जाए जो अभी तक अप्रयुक्त पड़ा हुआ है.

भारत में अबतक मानव तस्करी ने निबटने के लिये कोई अलग कानून नहीं है और यह अपराध विभिन्न मंत्रालयों के तहत आने वाले कई कानूनों के अंतर्गत आता है. ऐसे में यह अपनी तरह का पहला कानून होगा. इस बात की पूरी उम्मीद है कि अगर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय सामने आने वाले अच्छे सुझावों पर गौर करता है तो हो सकता है कि हमें एक ऐसा सुदृढ़ कानून मिल सके जो इस सदी के सबसे गंभीर अन्याय से निबटने में सहायक हो.

First published: 11 June 2016, 14:12 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी