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क्या उल्फा नेता अनूप चेतिया के यूटर्न से बदलेंगे असम के हालात?

राजीव भट्टाचार्य | Updated on: 16 December 2015, 20:30 IST
QUICK PILL
  • \r\n\r\n\r\n \r\n \r\n \r\n पूर्वोत्तर के अलगाववादी संगठन उल्फा\r\nके संस्थापक सदस्य अनूप चेतिया\r\nको पिछले महीने बांग्लादेश\r\nसे भारत\r\nलाया गया था.
  • चेतिया भारत सरकार और उल्फा के बीच चल रही बातचीत में शामिल होने को तैयार हैं. उन्होंने संगठन की गलतियों के लिए असम के लोगों से माफी मांगी है.

यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम(उल्फा) के महासचिव अनूप चेतिया ने 'अतीत की गलतियों' के लिए असम के लोगों से 'माफी' मांगी है.

चेतिया अब उल्फा और केंद्र सरकार के बीच शुरू हुई शांति वार्ता के पक्ष में है. यह वार्ता उल्फा के चेयरमैन अरबिंद राजखोवा के नेतृत्व में केंद्र सरकार के साथ 2011 में शुरू हुई थी. ये बातें मंगलवार को चेतिया ने विशेष टाडा कोर्ट से निकलते हुए मीडिया के सामने कहीं.

1985 से 1995 के बीच प्रभावी टाडा कानून आतंकवाद पर काबू पाने के लिए बनाया गया था लेकिन बाद में इसे निरस्त कर दिया गया.

संभावना जताई जा रही है कि चेतिया की जमानत याचिका का विरोध पुलिस नहीं करेगी


चेतिया ने कहा है कि 1992 में कोलकाता में हुई गिफ्तारी के बाद भारत सरकार ने उनसे दोनों पक्षों के बीच बातचीत की संभावनाएं तलाशने की अनुमति दी थी. चेतिया ने दावा किया कि नागांव के पास हुई कुछ वार्ताओं में वह शामिल थे. लेकिन उल्फा प्रमुख परेश बरुआ की तरह कट्टरपंथी बनने के लिए वह सीमापार बांग्लादेश चला गया.

2011 में पहले जेल से रिहा होने वाले राजखोवा ने भी शांति वार्ता के लिए इसी तरह इशारा किया था. रिहाई के बाद राजखोवा ने कहा था कि वह बिना शर्त शांति वार्ता के लिए तैयार है. चेतिया का बयान ऐसे समय में आया है जब अटकलें चल रही हैं कि उसने केंद्र के साथ समझौता कर लिया है.

संभावना जताई जा रही है कि उसकी जमानत याचिका पर सरकार विरोध नहीं करेगी. उसके खिलाफ पुलिस ने नौ जबकि सीबीआई ने एक केस दर्ज कर रखा है.

चेतिया अब शांतिदूत की महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है. असम के लोग पहले की तरह अब उल्फा का समर्थन नहीं कर रहे हैं. हालांकि, डिब्रुगढ़ और तिनसुकिया इलाकों में अब भी उसका प्रभाव है. बिना शर्त वार्ता उल्फा के लिए समर्थन बढ़ाने का काम कर सकता है.

2011 में उल्फा के चेयरमैन अरबिंद राजखोवा ने केंद्र सरकार के साथ वार्ता शुरू की थी


धेमाजी ब्लास्ट जिसमें 10 स्कूली छात्र मारे गए थे और माजुली के विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता संजय घोष के अपहरण जैसी घटनाओं ने उल्फा का सामाजिक आधार खिसकाने का काम किया. इसके अलावा बांग्लादेशी अप्रवासियों पर उल्फा की नीतियां बदलने से लोगों के बीच उसका समर्थन कम हुआ.

चेतिया के नजदीकी सूत्रों के अनुसार वह केंद्र के साथ होने वाले समझौते में 1985 में हुई घटना की पुनरावृति नहीं चाहते. 30 साल पहले वार्ता असम के स्वदेशी समुदायों के लिए सुरक्षा प्रदान करने और बांग्लादेशी घुसपैठिये की जांच करने के मुद्दे पर असफल हो गई थी.

चेतिया के करीबियों के अनुसार वह नई क्षेत्रीय पार्टी का गठन कर सकता है. 1985 में बना असम गण परिषद (एजीपी) असम में अस्तित्व बचाने का संघर्ष कर रहा है और उसकी राजनीतिक जमीन पर भारतीय जनता पार्टी कब्जा कर रही है.

उल्फा के एक पदाधिकारी ने बताया कहा, '' चेतिया काफी उत्साहित है और स्थिति को सही दिशा में ले जाने के लिए तत्पर है. बहुत संभावना है कि रिहाई के बाद वह तुरंत विभिन्न कैंपों में जाकर कैडरों से मुलाकात करेगा.'' यह जानकारी देने वाला उल्फा पदाधिकारी फिलहाल भूमिगत नहीं है.

उल्फा में शांति वार्ता को लेकर दोफाड़ हो चुका है ये बात सभी जानते हैं. उल्फा के टॉप, मिडिल और लोअर पदाधिकारी जो भूमिगत नहीं है उनके बीच वार्ता को लेकर दरार साफ दिखती है. उल्फा नेतृत्व के खिलाफ ये आम शिकायत है कि उसने शांति वार्ता से अपना ध्यान हटा लिया है.

उल्फा के निचले स्तर के पदाधिकारी केंद्र के मासिक 3000 हजार रुपए के मासिक सहायता राशि के प्रस्ताव से नाराज है


इस बात के आसार थे कि केंद्र के साथ वार्ता शुरू होने के बाद तुरंत नतीजों पर पहुंचा जा सकता है लेकिन वार्ता लंबे से पूरी नहीं हो पा रही है. इसका कारण है कि इस वार्ता के साथ ही केंद्र सरकार उत्तर-पूर्व के आतंकवादी संगठनों के साथ भी बातचीत कर रही है. नई दिल्ली में आखिरी बार बातचीत एक साल के बाद हुई है. अब देरी होने पर अटकलें लगाई जा रही कि सरकार वार्ता के लिए इच्छुक नहीं है.

वार्ता में उल्फा के कैडरों को 3000 रुपए मासिक सहायता राशि देने का प्रस्ताव है. उल्फा के कई निचले स्तर के पदाधिकारी पैसे को लेकर नाराज है और इसे मजाक बता रहे हैं. कई अवसरों पर केंद्र की ओर से पैसा जारी करने में देर हुई है. इसके बाद कईयों का कहना है कि यह 'जानबूझकर और सरकार की रणनीति' के अनुसार हो रहा है.

दूसरे नेताओं की तुलना में उल्फा के हर वर्ग में महासचिव अनूप चेतिया की स्वीकार्यता अधिक है. चेतिया उल्फा के संस्थापक सदस्य रहे हैं और उन्हें 1987 में जीतन गोगोई के साथ गुवाहाटी में पहली बार गिरफ्तार किया गया था.

बांग्लादेश में 1997 में जेल जाने के बाद से चेतिया लगातार विवादों घिरे रहे जिससे शीर्ष नेताओं की छवि धूमिल हुई है. पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से हाथ मिलाने, हथियार सौदों में देरी और भूटान में हुए भारतीय सेना के ऑपरेशन 'ऑल क्लीयर' का अनुमान लगाने की विफलता के कारण वह हमेशा असम में सार्वजनिक बहस के केंद्र में रहे.

चेतिया के सामने कैडरों की को एकजुट रखने और उनके मतभेदों को दूर करने की चुनौती है. अनुमान लगाया जा रहा है कि अब केंद्र के साथ एक नया समझौता होगा जिसे तय समयसीमा के भीतर लागू किया जाएगा.

First published: 16 December 2015, 20:30 IST
 
राजीव भट्टाचार्य @catchhindi

गुवाहाटी स्थित वरिष्ठ पत्रकार. 'रांदेवू विथ रिबेल्सः जर्नी टू मीट इंडियाज़ मोस्ट वांटेड मेन' किताब के लेखक.

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