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अनुप्रिया पटेलः आसमान की चाह और ज़मीन की नहीं थाह

पाणिनि आनंद | Updated on: 1 July 2016, 14:43 IST
(गेट्टी इमेजेज़)

अनुप्रिया पटेल युवा हैं, महात्वाकांक्षी हैं, सांसद हैं. नज़रें दूर आसमान की उंचाइयों पर टिकी हैं लेकिन ऐसा लग रहा है कि ऊपर देखने की कवायद में वो अपने पैरों तले खिसक रही मिट्टी को नहीं साध पा रही हैं.

अनुप्रिया पटेल का नाम मोदी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में नए चेहरे के तौर पर सामने आ रहा है. माना जा रहा है कि उनका मंत्री बनना तय है. लेकिन अनुप्रिया पर जो दांव भाजपा लगा रही है, उसकी ज़मीन सिमटती जा रही है.

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अनुप्रिया आज अपनी ही पार्टी से निष्कासित हैं. उनके पिता, प्रदेश के बड़े नेता व अपना दल के संस्थापक डॉ सोनेलाल पटेल के बाद अब उनकी पार्टी अपना दल पर अनुप्रिया की मां कृष्णा पटेल का नियंत्रण है.

अनुप्रिया को उनकी मां ने ही पार्टी से बाहर कर दिया है. अब वो अपनी पार्टी बनाकर आगे बढ़ना चाह रही हैं. अनुप्रिया के एक सहयोगी जवाहर पटेल इस बाबत एक राजनीतिक दल का पंजीकरण भी करवा चुके हैं.

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दो जुलाई को अनुप्रिया बनारस में एक बड़ी रैली का आयोजन कर रही हैं. इस रैली में उनके साथ भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, उत्तर प्रदेश के प्रभारी ओम प्रकाश माथुर और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य भी मौजूद रहेंगे.

दरअसल, दो जुलाई सोनेलाल पटेल का जन्मदिन है और इस अवसर पर वो अपनी बिरादरी को अपने पक्ष में खड़ा करके शक्ति प्रदर्शन करना चाहती हैं. अनुप्रिया की आगे की राजनीति के लिए यह रैली अहम है. भाजपा इस रैली में मौजूद रहकर उनकी ताकत का अंदाज़ा लगाना चाहती है.

कुर्मी वोटबैंक

भाजपा की नज़र अनुप्रिया पटेल के कुर्मी वोटबैंक पर है. उत्तर प्रदेश का इतिहास उठाकर देखें तो पिछड़े वर्ग की जातियों में यादवों के अलावा अगर किसी एक जाति का दबदबा और हनक रही है तो वे कुर्मी हैं.

कुर्मी कई नामों से जाने जाते हैं. मसलन, वर्मा, पटेल, सचान, कटियार, गंगवार आदि इसी एक जाति के विभिन्न उपनाम हैं. ये जाति आर्थिक रूप से मज़बूत रही है और ज़मीनों का मालिकाना होने के कारण इनकी निर्भरता अगड़ी जातियों पर कम रही है. जाति के कई लोग व्यवसाय आदि भी करते रहे हैं.

सूबे में इनके प्रभाव का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाबा रामचंदर के नेतृत्व में 1917-18 में जब अवध किसान सभा अस्तित्व में आई थी तब उसके एक साल बाद ही यानी 1919 में अखिल भारतीय कुर्मी महासभा का गठन उत्तर प्रदेश में हो गया था. यादव महासभा इसके कुछ वर्ष बाद 1923 में बनी.

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उत्तर प्रदेश में 4-6 प्रतिशत कुर्मी वोट है. यह वोट कई सीटों पर खासा निर्णायक है. बेनी प्रसाद वर्मा इसी जाति से आते हैं. उन्होंने जब कांग्रेस से हाथ मिलाया था तब राहुल गांधी ने सूबे से अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 22 सांसद 2009 में दिल्ली भेजे थे.

बेनी बाबू सपा से रूठे थे. समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव इसबार उन्हें मना लेने में सफल रहे हैं. बेनी सपा में वापस आ गए हैं. मुलायम अब बेनी के चश्मे से कुर्मी वोट की ओर देख रहे हैं. उधर नीतीश कुमार खुद कुर्मी नेता होने के नाते प्रदेश में मोदी विरोधी लहर बनाने की कोशिश कर रहे हैं. उनका अनुमान है कि वो कुर्मियों के वोट को भाजपा में जाने से रोककर मोदी को कमज़ोर करेंगे.

दो जुलाई को अनुप्रिया बनारस में एक बड़ी रैली का आयोजन कर रही हैं.

कुर्मी वोट की अहमियत इससे भी समझी जा सकती है कि बनारस में अच्छी तादाद में वोट होने के कारण जब अपना दल से भाजपा की दोस्ती हुई तो मोदी को 2014 के चुनाव में इसका खासा लाभ मिला. अनुप्रिया के समर्थन से मोदी को वोट भी मिले और उनके पक्ष में लहर भी बनी.

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इधर भाजपा का आकलन है कि जिस अनुप्रिया पटेल को उन्होंने समर्थन देकर सांसद बनवाया, अगर उसे मंत्री भी बना दें तो यह एक बड़ा संदेश बिरादरी में भेजेगा. और फिर इसका सीधा लाभ आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को होगा. यही कारण है कि अनुप्रिया पटेल के दिन बहुर रहे हैं. पहली बार सांसद बनी युवा नेता के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि होगी.

बिगड़ता गणित

अनुप्रिया मिर्जापुर से सांसद हैं. अपना दल की अग्रणी नेता हैं. लेकिन अब सांसद होते हुए भी अपना दल की सदस्य नहीं हैं. दो जुलाई को जब अनुप्रिया बनारस में रैली कर रही होंगी, उनकी मां कृष्णा पटेल इलाहाबाद में अपना दल की एक विशाल रैली आयोजित कर रही होंगी.

कृष्णा पटेल ने कैच को बताया, "अनुप्रिया अब पार्टी में नहीं हैं. उनकी रैली से हमें कोई मतलब भी नहीं है. हमारा 90 प्रतिशत से ज़्यादा कार्यकर्ता और समर्थक हमारे साथ है. वो उनके साथ नहीं जा रहा है. अनुप्रिया अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं के आगे पार्टी और अपने पिता के सिद्धांतों को भूल गई हैं."

तो क्या अपना दल अब भाजपा के साथ नहीं है. इसपर वो बताती हैं, "हमने भाजपा को समर्थन दिया है और वो जारी रहेगा. हमारा कोई इरादा नहीं है कि पार्टी का भाजपा में विलय हो. हम अपने समाज के हित की लड़ाई जारी रखेंगे."

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गुस्से से भरी कृष्णा पटेल कहती हैं कि अगर अनुप्रिया मंत्री बनती हैं तो उन्हें शुभकामनाएं. लेकिन इससे अधिक हमारा उनसे कोई सरोकार नहीं. वो अब पार्टी का हिस्सा नहीं हैं. कृष्णा पटेल ने बताया कि उनकी नीतीश कुमार से भी बातचीत और मुलाकात हुई है. लेकिन इसके राजनीतिक अर्थ न निकाले जाएं.

तो क्या कुर्मी वोट अनुप्रिया के साथ है. और क्या भाजपा एक डूब रहे नाम पर दांव लगा रही है. दो जुलाई की रैली इस बाबत खासी निर्णायक होगी. उधर अनुप्रिया के समर्थक उनसे किनारा कर रहे हैं. रैली के ठीक पहले 30 जून को अपना दल के बनारस महानगर के अध्यक्ष विकास चंद्र तिवारी ने अनुप्रिया पटेल का साथ छोड़ने की घोषणा कर दी है.

उन्होंने कैच को बताया, "अनुप्रिया जब से सांसद बनी हैं, हम लोगों का फोन तक नहीं उठा रही हैं. अगड़ों का लगातार अपमान कर रही हैं. पार्टी के कामकाज और कार्यकर्ताओं से उनका कोई लेना देना नहीं है. हम और अपमानित नहीं होना चाहते इसीलिए पार्टी से अलग हो रहे हैं."

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बनारस में ही रैली के ठीक पहले का यह घटनाक्रम अगड़ों के बीच अनुप्रिया के प्रति एक नकारात्मक संदेश भेजता है. यह भाजपा की आंख में भी किरकिरी की तरह लग सकता है.

अनुप्रिया के सहारे भाजपा जिस कुर्मी वोटबैंक को साधने के सपने देख रही है, उसके कई दावेदार सूबे में खड़े हो गए हैं. अनुप्रिया की खुद कमज़ोर होती ज़मीन उनके लिए और मुसीबतें खड़ी कर रही है. ऐसे में भाजपा का विश्वास उनमें बना रहे और बिरादरी का भी, यह एक कठिन चुनौती है जिससे अनुप्रिया को जूझना है.

भाजपा भी इस नए घटनाक्रम के मद्देनजर अपनी रणनीति को फिर से तय करने पर विचार कर रही होगी क्योंकि फिलहाल उसे यह दुविधा हो गई है कि जिस अनुप्रिया को वो आगे बढ़ा रहे हैं उसके साथ कुर्मी और अअपना दल है भी या नहीं.

First published: 1 July 2016, 14:43 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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