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क्या आप जीका वायरस से इम्युन हैं?

कैच ब्यूरो | Updated on: 28 January 2016, 19:57 IST
QUICK PILL
  • जीका वायरस की वजह से पूरी दुनिया दहशत में है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो कनाडा और चिली को छोड़कर यह वायरस अमेरिकी द्वीप के सभी देशों को अपनी चपेट में ले सकता है.
  • हालांकि भारत के लिए राहत की सबसे बड़ी खबर यह है कि यहां के लोगों में जीका वायरस के प्रति पैसिव इम्युनिटी पहले से ही मौजूद है.

जीका वायरस तेजी से फैल रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस हफ्ते घोषणा करते हुए बताया कि कनाडा और चिली को छोड़कर जीका वायरस पूरे अमेरिकी द्वीप को अपनी चपेट में ले सकता है. जीका वायरस मच्छर से फैलने वाली बीमारी है और इसकी चपेट में आने से बच्चों को खासा नुकसान होता है. 

24 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक अमेरिकी द्वीप के 55 में से 21 देशों में यह वायरस पहले से ही मौजूद है. डब्ल्यूएचओ ने बताया कि जीका वायरस एडीज एजिप्टी मच्छर से फैलता है और यह वायरस कनाडा और चिली को छोड़कर अमेरिकी द्वीप के सभी देशों में मौजूद है और इससे डेंगू और चिकुनगुनिया जैसी बीमारी फैलती है.

जीका ब्राजील में सबसे पहले सामने आया और अमेरिकी द्वीप के लोग इसे लेकर इम्युन नहीं है. इस वजह से यह वायरस तेजी से फैल सकता है. इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में यह वायरस पहली बार 1952-53 में पाया गया था.

जीका वायरस के एंटीबॉडीज की खोज 'न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज अगेंस्ट सर्टेन वायरसेज इन द सेरा ऑफ रेजिडेंट्स ऑफ इंडिया' से जुड़ा अध्ययन द र्जनल ऑफ इम्युनोलॉजी में प्रकाशित किया था. भारत के छह राज्यों में 38 स्थानों पर यह अध्ययन किया गया था और इस दौरान 15 वेक्टर बॉर्न वायरस को टेस्ट किया गया था. स्टडी के मुताबिक सेरा की मदद से वायरस को न्यूट्रलाइज करने में मदद मिली.

पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. टी मौर्या ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि 'भारत में यह नहीं फैलेगा क्योंकि अतीत में भारतीय सैंपल में इसकी इम्युनिटी की पुष्टि की जा चुकी है.' भारत में 1952 के बाद इस वायरस की कोई खबर नहीं है.

क्या है पैसिव इम्युनिटी और भारतीयों ने इसके खिलाफ कैसे पैसिव इम्युनिटी विकसित की?

पैसिव इम्युनिटी एक वैसी प्रक्रिया जिसमें कोई व्यक्ति वायरस के संपर्क में आए बिना उसकी इम्युनिटी बना लेता है. एक्टिव इम्युनिटी के लिए बॉडी का वायरस के संपर्क में आना जरूरी होता है. वायरस इंडिया में मौजूद रहा है तो इस वजह से लोगों के शरीर में इसके खिलाफ पैसिव इम्युनिटी बन चुकी है.

डेंगू, जीका और चिकनगुनिया ऐडीज एजिप्टी मच्छर से फैलता है. जीका के मुकाबले डेंगू ज्यादा खतरनाक माना जाता है.

चूंकि भारत के लोग जिका के करीबी वायरस से परिचित हैं इसलिए उनके शरीर में इसकी एंटीबॉडी बन चुकी है.

चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक सभी वायरस के प्रोटीन समान होते हैं इसलिए उनका एंटीबॉडीज भी समान ही होता है.

जीका से क्यों फैल रही है दहशत?

जीका वायरस का नाम युगांडा के जीका जंगल के नाम पर पड़ा है जहां सबसे पहले इसे 1947 में इसे पाया गया था. अभी तक यह अफ्रीका के दायरे में ही रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक एशिया में यह वायरस बेहद छोटे दायरे में सिमटा हुआ है.

इससे पहले इस वायरस की चपेट में युवा आए थे और इससे प्रभावित होने के बाद बुखार, शरीर में दर्द, रैशेज, जोड़ों में दर्द और आंखे लाल हो जाती है.

जीका वायरस मच्छर से फैलता है. यह दो इंसानों के बीच संक्रमण से नहीं फैलता है. हालांकि गर्भवती महिलाओं में यह बच्चे को फैल सकता है.

बहुत अधिक गहरा संक्रमण होने की अवस्था में यह गुलियन-बेयर सिंड्रोम को ट्रिगर कर सकता है. यह नर्व से जुड़ी बीमारी है जिसकी वजह से मांसपेशियां कमजोर हो जाती है और लकवा तक मार सकता है.

ब्राजील में 4,000 बच्चे छोटे सिर के साथ पैदा हुए हैं. गर्भवती महिलाएं हम कीटों को भगाने वाले रेपलेंट का इस्तेमाल कर रही हैं. वह घरों से बाहर जाने से मना कर रही हैं. इसके अलावा वह गहरे रंग के कपड़े नहीं पहन रही हैं क्योंकि इससे मच्छर आकर्षित होते हैं. कुछ महिलाएं अपने अंडाणुओं को फ्रीज कर रही हैं ताकि वायरस का इलाज खोजे जाने के बाद वह गर्भवती हो सकें.

कोलंबिया में करीब 700,000 लोग संक्रमण से पीड़ित हैं और वहां महिलाओं को गर्भवती होने के लिए छह महीनों का इंतजार करने के निर्देश दिए गए हैं. ब्राजील, इक्वाडोर और जमैका में स्वास्थ्य अधिकारियों ने भी इसी तरह के निर्देश दे रखे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि जिका वायरस का तेजी से फैलना चिंता का विषय है क्योंकि बहुत कम आबादी ही इसे लेकर इम्युन है.

तेजी से बढ़ती शहर की आबादी, स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला कम खर्च, प्लास्टिक का भारी पैमाने पर होने वाला इस्तेमाल भी इस महामारी के लिए जिम्मेदार है.

First published: 28 January 2016, 19:57 IST
 
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