Home » इंडिया » Arms dealer Sanjay Bhandari booked under Secrets Act. A peek into his murky world
 

हथियारों के सौदागर संजय भंडारी की ताक़त और उनकी काली दुनिया

सादिक़ नक़वी | Updated on: 20 October 2016, 7:46 IST
QUICK PILL
  • होम्योपैथ के मशहूर डॉक्टर राजेंद्र भंडारी के बेटे और हथियारों के डीलर संजय भंडारी फ़िलहाल दिल्ली पुलिस की गिरफ़्त में हैं. 
  • बड़ी-बड़ी रक्षा डील में अहम भूमिका निभाने वाले भंडारी ने अपने इस काले कारोबार का मुख्यालय लंदन में बना रखा है. 
  • भंडारी की कॉल डीटेल रिकॉर्ड बताती है कि उनके रिश्ते देश के सबसे ताक़तवर राजनीतिक परिवार से लेकर सत्ता के गलियारों में मौजूद मंत्रियों तक से हैं. 

विवादित आर्म्स डीलर और ऑफसेट इंडिया सल्यूशंस के मालिक संजय भंडारी के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है. उनके ख़िलाफ़ शिकायत रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कर्नल पुनीत आहूजा ने दर्ज कराई थी. आहूजा ने अपनी तहरीर में लिखा था कि आयकर विभाग को उनके यहां छापे के दौरान रक्षा खरीद प्रक्रिया से जुड़े गोपनीय दस्तावेज मिले हैं. 

भंडारी प्रवर्तन निदेशालय के राडार पर हैं जो अलग से उनके खिलाफ जांच कर रहा है. आयकर विभाग को जो कागज़ात मिले हैं, वह रक्षा खरीद के लिए पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी की अध्यक्षता मे हुई बैठक के मिनट्स से जुड़े हुए हैं. उनमें से कुछ का संबंध वायु सेना के लिए खरीदे जाने वाले छह मिड-एयर रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट की खरीद से है. बताया जाता है कि ये दस्तावेज निहायत गोपनीय हैं और इन्हें बिना किसी हॉयर अथॉरिटी के मदद के बिना हासिल कर पाना मुमकिन नहीं है.

इससे पहले गृह मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय से यह पता करने के लिए कहा था कि क्या बरामद दस्तावेज़ ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के उल्लंघन के तहत आते हैं. शुरुआती जांच में इसकी पुष्टी होने के बाद उनपर यह कार्रवाई हुई है. एफआईआर में भंडारी के सहयोगी और कई कम्पनियों के निदेशक अशोक शंकर का भी नाम है. अशोक शंकर का लिंक आर्म्स कारोबारी से रहा है.

कौन हैं संजय भंडारी

होम्योपैथ के मशहूर डॉक्टर राजेंद्र भंडारी के बेटे संजय भंडारी का नाम पहली बार मई में तब सुर्खियों में आया, जब यह अटकलें तेज़ थीं कि उन्होंने हाल फिलहाल में रक्षा खरीद की बड़ी डील में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

अगर उनके टेलीफोन कॉल रिकॉडर्स पर यक़ीन किया जाए तो संजय कोई छोटे-मोटे हथियार कारोबारी नहीं हैं. उनके रिश्ते पार्टी लाइन से हटकर भारत के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार के राबर्ट वाड्रा से लेकर नागरिक उडड्डयन मंत्री अशोक गजपति राजू तक से हैं. बड़े पत्रकारों, बड़ी रक्षा कंपनियों के प्रतिनिधियों से भी उनके नज़दीकी रिश्ते रहे हैं. 

फ्रांस की एक वेबसाइट के मुताबिक भंडारी ने 1990 के दशक के आखिर में हथियारों की ख़रीद-फरोख़्त के बाज़ार में कदम रखा था. वेबसाइट ने दावा किया है कि वह खुद को गांधी परिवार का करीबी बताते हैं. उन्होंने 1997 के सुखोई डील में भूमिका निभाई थी. आर्म्स खरीद की अंधेरी दुनिया में कदम रखने से पहले 1994 के एक जालसाजी मामले में भी उनका नाम आया था. तब उनके ख़िलाफ़ विजया बैंक के उप महाप्रबंधक ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उन्होंने साल 1987 से 1990 के बीच लगभग 47 लाख रुपए की बैंक से हेराफेरी कर ली थी. 

लंदन में मुख्यालय

भंडारी की कंपनी का मुख्यालय लंदन में है. इसी साल जून में जब वह ब्रिटिश एयरवेज की फ्लाइट से ब्रिटेन जा रहे थे, तभी उन्हें बोर्डिंग करने से रोक लिया गया था. प्रवर्तन निदेशालय इस आरोप की भी जांच कर रहा है कि क्या उन्होंने रॉबर्ट वाड्रा को लंदन के पॉश इलाके में कोई बंगला दिया है. वहीं वाड्रा और राजू दोनों ने ही भंडारी से अपने किसी भी तरह का रिश्ता होने से इनकार किया है.

आयकर अधिकारियों ने भंडारी की 'अभूतपूर्व वृद्धि' पर पिछले सात सालों में उनके 18 ठिकानों पर छापे डाले हैं. 2006 की नई रक्षा खरीद नीति, जिसमें हर सौदे में 35 फीसदी निवेश करना अनिवार्य बनाया गया था, के लागू होने के बाद साल 2008 में भंडारी ने एक ऑफसैट कम्पनी बनाई थी. 

खुफिया एजेंसियों के कथित इनपुट में यह भी पता चला था कि भंडारी की कंपनी 4 हज़ार करोड़ के ट्रेनर एयर-क्राफ्ट डील में मदद के लिए स्विस रक्षा निर्माण की कंपनी पिलाटस के साथ भी शामिल थी. कहा जाता है कि उनकी इस सेवाओं के लिए भंडारी को 2009 से 2014 के बीच 35 कंपनियों से 69.38 करोड़ रुपए बनाए थे.

उनकी कंपनी को दो साल बाद, जब ट्रेनर एयरक्राफ्ट का सौदा हो गया, तब भी पिलाटस से लाखों स्विस फ्रैंक्स हासिल हुए थे. भाजपा सरकार ने संकेत दिए हैं कि इस सौदे की जांच की जाएगी.

इनका नाम रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट डील में भी आ रहा है. यूपीए-2 के शासनकाल में एयरबस ने छह A-330 एयरक्राफ्ट की भारत को आपूर्ति करने की निविदा हासिल कर ली थी. 'एविएशन वीक' के मुताबिक ज्यादा कीमतों के चलते नरेन्द्र मोदी सरकार ने हालांकि इस टेंडर को स्क्रैप कर दिया है. इस सौदे के अलावा एयरबेस एक सीबीआई मामले का भी सामना कर रही है. एक भाजपा सांसद ने कथित रूप से कम्पनी के साथ इस सौदे पर आपत्ति कर दी है.

अब सरकार A-330 एमआरटीटी की जगह रशियन इल्यूशिन-78 खरीदने पर विचार कर रही है. हालिया खबरों के अनुसार बोइंग ने भी अपने केसी-46 पेगासस खरीदने का प्रस्ताव किया हुआ है.

First published: 20 October 2016, 7:46 IST
 
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