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सातवें वेतन आयोग ने बढ़ाई सैन्यकर्मियों की निराशा

सुहास मुंशी | Updated on: 2 July 2016, 7:54 IST
(एजेंसी)

भारतीय सेना से जुड़ी खबरों पर नजर रखने वालों को याद होगा कि पिछले साल फरवरी में सियाचीन में हुए हिमस्खलन में 10 जवान शहीद हो गए थे. सैनिकों को किन कठिन हालात में काम करना पड़ता है इसे समझने के लिए उस हादसे को याद कर लेना काफी होना चाहिए.

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को कैबिनेट द्वारा स्वीकार किए जाने के बाद भले ही कुछ सेक्टरों में खुशी हो लेकिन सैन्यकर्मी इससे संतुष्ट नहीं है.

सियाचीन जैसी परिस्थितियों में काम करने वाले सैनिकों को बदले में अतिरिक्त भत्ता मिलता है, लेकिन उससे ज्यादा भत्ता नौकरशाहों को गुवाहाटी जैसी जगहों पर नियुक्ति होने पर मिलता है.

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सियाचीन में तैनात सैन्य अधिकारी को मुश्किल हालात के लिए मिलने वाले भत्ते के तौर पर 31,500 रुपये प्रति माह अतिरिक्त मिलते हैं. वहीं एक आईएएस अफसर को पूर्वोत्तर में तैनाती पर उसकी तनख्वाह का 30 प्रतिशत अतिरिक्त मिलता है. जाहिर है, ये राशि सैनिकों को मिलने वाली राशि से काफी अधिक होती है.

सैन्यकर्मी इस बात से नाराज हैं कि 29 जून को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकार करते समय उनकी मांगों को ध्यान में नहीं रखा गया. उनकी मांग थी कि उनका मानदेय और भत्ता भी नौकरशाहों के अनुरूप ही किया जाय.

सैन्यकर्मियों की सबसे प्रमुख मांग थी समान वेतनमान की. सेना में अलग-अलग स्तरों के कुल 24 वेतमान प्रभावी हैं, वहीं प्रशासनिक सेवा में 40 वेतमान स्तर हैं. यानी सैन्यकर्मियों को नौकरशाहों से कम पदोन्नती मिलती है.

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13 सालों की सेवा के बाद एक नौकरशाह को किसी सैन्य अधिकारी की तुलना में छह पदोन्नतियां ज्यादा मिलती हैं. सेवा समाप्त होने पर सैन्य अधिकारियों को नौकरशाहों की तुलना में प्रति माह 20 हजार रुपये कम पेंशन मिलती है.

एक अनुमान के मुताबिक 16 साल की नौकरी में आईएएस अफसरों को जितनी तनख्वाह मिलती है उतनी तनख्वाह सेना के एक प्रतिशत जवानों को 32 साल में मिलती है. तनख्वाह कम होने के अलावा 85 प्रतिशत सैन्यकर्मी 34 से 37 साल की उम्र में रिटायर हो जाते हैं.

अन्य मांगे जिनकी अनदेखी हुई

सैन्यकर्मियों को दो मांगे सरकार ने नहीं मानी है. एक, नौकरशाहों के समान भत्ते. दो, नॉन-फंक्शनल अपग्रेडेशन (एनएफयू) को लागू करना.

एनएफयू लागू होने के बाद सैन्यकर्मियों को पदोन्नती न मिलने के बावजूद ऊपर के ग्रेड की तनख्वाह देना संभव हो सकेगा. दूूसरी सरकारी नौकरियों में ये व्यवस्था पहले से लागू है.

मसलन, जब एक आईएस बैच के किसी भी सदस्य को पदोन्नती मिलती है और उसका वेतनमान बढ़ता है तो उस बैच के बाकी अफसरों का भी वेतन बढ़ जाता है. सेना में पदोन्नती और वेतनवृद्धि दोनों पर व्यक्तिगत रूप से स्वतंत्र विचार किया जाता है.

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रिटायर और सेवारत सैन्यकर्मी रक्षा मंत्रालय द्वारा एक रैंक, एक पेंशन (ओआरओपी) के लिए तय शर्तों से भी संतुष्ट नहीं हैं.

सातवें वेतन आयोग से उपजी निराशा को सैन्यकर्मी किस तरह व्यक्त करेंगे तो ये वक्त ही बता सकता है. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या रक्षा मंत्रालय उनकी बात सुनने की लिए तैयार होगा.

First published: 2 July 2016, 7:54 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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