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अर्नब गोस्वामी के करियर विकल्प: संकट की इस घड़ी में सारा देश उनके साथ है

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 February 2017, 5:46 IST
QUICK PILL
  • लंबे समय तक अंग्रेज़ी चैनल टाइम्स नाउ की अगुवाई करने वाले टीवी पत्रकार ने इस संस्थान से इस्तीफ़ा दे दिया है. 
  • इस ख़बर के बाद पूरे \'नेशन\' में यह बहस छिड़ गई है कि अर्बन का अगला कदम क्या होगा? उनके करियर से जुड़ी सभी संभावनाओं से जुड़े कुछ क़यास और कुछ सलाहें.

यह आपातकाल है! नेशन जो जानना चाहता है, वह जानना अब संभव नहीं रहा. भारत का पर्याय बन चुके टाइम्स नाउ के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी ने अपने संस्थान को टाटा-बाय बाय बोल दिया है. बीते कुछ सालों के दौरान जिस तरह से उन्होंने टेलीविजन के पर्दे का लोकतांत्रीकरण किया है, वह अपने आप में ऐतिहासिक है. एक स्क्रीन, एक एंकर (ओएसओए) के एकाधिकार को तोड़ते हुए अर्नब गोस्वामी ने बुद्धू बक्से के छोटे से परदे पर बीस-बीस लोगों को बिठाकर जो साम्यवाद स्थापित किया, उसे जानकार ऐतिहासिक घटना करार देते हैं. जितना योगदान उन्होंने टीवी के परदे पर दिया, उससे कई गुना ज्यादा योगदान उनका देश में राष्ट्रभक्ति का ज्वार पैदा करने में रहा.

एक अनधिकारिक सर्वे के मुताबिक पाकिस्तान का नाम जितनी बार अर्नब गोस्वामी ने लिया (गाली देने और कोसने के लिए) उतना अपने पूरे जीवनकाल में जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग मिलकर नहीं लिया था. उन्होंने अपने जुबानी प्रक्षेपास्त्रों से भारतीय कला, संस्कृति, सेना, सिनेमा, राजनीति सबको धराशायी किया और उन्हें उन तमाम भटके लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने का काम किया.

इतने ऐतिहासिक योगदान वाले अर्नब अब जब टाइम्स नाउ छोड़कर जा रहे हैं तब संपूर्ण देश में चिंता की लहर है. यह चिंता उठनी स्वाभाविक भी है कि उनकी अनुपस्थिती में देश की दिशा कौन तय करेगा, नेशन जो जानना चाहता है वह कैसे जानेगा, टाइम्स नाउ का क्या होगा और इन सबसे बढ़कर खुद अर्नब गोस्वामी का क्या होगा? क्या इतनी प्रखर मेघा यूं ही विलुप्त हो जाएगी?

उनके शुभचिंतकों ने उनके राष्ट्र रक्षा में दिए गए योगदान को ध्यान में रखते हुए उनके कद के मद्देनजर कुछ करियर विकल्पों की सलाह दी है. ऐसे कौन से काम हो सकते हैं जिन्हें अर्नब गोस्वामी मजबूती से अंजाम दे सकते हैं और एक बार फिर से देश के निर्माण में अपना योगदान उसी तन्मयता से दे सकते हैं जिस तरह से उन्होंने अब तक किया है.

पहला विकल्प: भारतीय सेना अध्यक्ष

भारतीय सेना का मनोबल बढ़ाने में अर्नब के योगदान को देखते हुए विशेषज्ञों की सलाह है कि भारतीय सेना के प्रमुख का पद उनके लिए सबसे मुफीद होगा. जानकार इस मामले में एकराय हैं कि 1971 में इंदिरा गांधी और 1965 में लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भी भारतीय सेना का मनोबल उस स्तर को छू नहीं सका था जहां अर्नब ने आज पहुंचाया है.

अर्नब की एक ललकार पर आज पूरा देश ही भारतीय सेना बनने को तैयार है. ऐसा योग्य व्यक्ति भारतीय सेना के प्रमुख पद के लिए विचारणीय होना ही चाहिए. अर्नब के पारस रूपी स्पर्श ने कैसे-कैसे पत्थरों को सोना बनाया है इसकी बनगी देखना हो तो जनरल जीडी बख्शी या मारूफ रज़ा को एक बार देख लीजिए. हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या.

दूसरा विकल्प: प्रधानमंत्री का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार

सत्ता के गलियारों में यह बात उतनी ही भरोसे से कही सुनी जाती है जितने भरोसे से लोग दिन और रात होने को लेकर आश्वस्त रहते हैं, कि उनकी सुरक्षा संबंधी सलाहों को प्रधानमंत्री अक्सर एनएसए अजित डोभाल से कहीं ज्यादा महत्व देते हैं. उनकी जुबान से निकली उक्तियां भारतीय सुरक्षा नीति का हिस्सा बन जाती हैं. दबी जुबान में लोग कहने लगे हैं कि अब सही समय आ गया है जब डोभाल को किसी थाने का थानेदार बनाकर अर्नब गोस्वामी को उनकी सही जगह मुहैया करवा दी जाय यानी प्रधानमंत्री का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बना दिया जाय.

तीसरा विकल्प: सन्नी देओल

इस एक विकल्प पर विद्वानों में शत-प्रतिशत सहमति है. भारतीय सिनेमा की राष्ट्रवादी धारा में सन्नी देओल के अवसान के बाद एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है. उनकी टक्कर का हिंदुस्तानी फिलहाल बीते एक दशक में सिनेमा के पर्दे पर देखने को नहीं मिला. अक्षय कुमार, अजय देवगन जैसे लड़कों ने कुछेक कोशिशें की लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा.

इसके उलट अर्नब ने जब तब टाइम्स नाउ के छोटे से परदे पर ही कई बार ऐसी हुंकार भरी जिससे उनकी फिल्मी प्रतिभा को लेकर फिल्म समीक्षकों में एक सकारात्मक राय बन गई थी. खुद सन्नी देओल ने कई बार निजी बातचीत में अपने उत्तराधिकारी के रूप में अर्नब के नाम पर सहमति जताई है. अब उन्हें इसे सार्वजनिक स्तर पर भी घोषित करना चाहिए.

चौथा विकल्प: प्रधानमंत्री का मीडिया सलाहकार

पत्रकारिता वो काम है जिसमें अर्नब गोस्वामी की छवि अर्नॉल्ड श्वार्जनेगर सरीखी है. उन्होंने सबसे ज्यादा नाम ही बतौर राष्ट्रवादी पत्रकार कमाया है और बिल्ली के भाग्य से क्या छीका टूटा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक अपना मीडिया सलाहकार नियुक्त नहीं किया है. सरकार बनने के ढाई साल बाद यानी आधा कार्यकाल बीत जाने के बाद भी. क्या पता उन्हें भी इसी स्वर्णिम मौके का इंतजार हो. राम की मिलाई यह जोड़ी निश्चित ही बड़े-बड़े गुल खिला सकती है. जानकारों का मानना है कि यह वह विकल्प है जो अर्नब से ज्यादा प्रधानमंत्री को रास आएगा.

पांचवा विकल्प: भारत माता के ब्रांड अंबेस्डर

पत्रकारिता के रौद्र रूप में अवतरित होने के बाद अर्नब गोस्वामी ने राष्ट्र के ऊपर छाए संकटों से जिस तरह से निपटना शुरू किया है वह अकल्पनीय है. "नेशन इज अर्नब और अर्नब इज नेशन" की अवधारणा को उन्होंने इन सालों के दौरान पूरी तल्लीनता और ईमानदारी से पुख्ता किया. संकट की लगभग हर घड़ी में राष्ट्र उनकी ओर ताकता पाया गया और उन्होंने राष्ट्र को निराश भी नहीं किया. उनकी इस प्रतिभा के मद्देनजर ही विद्वानों में यह राय बनी कि लंबे समय से संघ के अंखड भारत की कल्पना में जो भारत माता हैं उसका अगर मौजूदा समय में एक सुयोग्य चेहरा ढूंढ़ना हो तो अर्नब से बेहतर भला क्या होगा. शेर पर सवार, केसरिया झंडा उठाए काल्पनिक भारत माता की जगह अर्नब का चेहरा क्या खूब जंचेगा.

छठवां विकल्प: भाजपा प्रवक्ता

अर्नब के टाइम्स नाउ छोड़ने की खबर के साथ ही एक खबर 11 अशोका रोड से भी आई. खबर वहां फैले मातमी सन्नाटे की थी. खबरचियों के मुताबिक भाजपा मुख्यालय में तैनात ज्यादातर प्रवक्ताओं को अपनी नौकरी जाने का अंदेशा सताने लगा है. टीवी के पर्दे से लेकर निजी बहस मुबाहिसों में अर्नब ने जिस तरीके से भाजपा के पक्ष को मजबूत करने, उसे आगे बढ़ाने में योगदान दिया है वह किसी से छिपा नहीं है. उनके शो में भाजपा प्रवक्ताओं के चेहरे पर फैली मुस्कान और निश्चिंतता यह बताने के लिए काफी थी कि वे हों न हों भाजपा का पक्ष मजबूती से रखा जाएगा.

गांव में कहावत है खलिहान का सियार जब घर में पहुंच जाय तो समझ लीजिए खतरा सिर पर है. भाजपा प्रवक्ता भी कुछ इसी तरह के खतराबोध से आतंकित हैं.

सातवां विकल्प: ट्रंप प्रशासन में प्रमुख सलाहकार

अर्नब की न्यायप्रियता के बारे में मशहूर है कि वे कुछ चीजों को सिर्फ और सिर्फ एक आंख से देखते हैं. इस्लाम और आतंकवाद उनकी निगाह में एक हैं तो हैं. क्या मजाल की उन्होंने कभी इस मामले में दो बात कही हो. अब जिस घड़ी में उनके टाइम्स नाउ से बहिर्गमन की खबर आई है क्या शुभ घड़ी है कि अमेरिका चुनाव की दहलीज पर खड़ा है.

डोनल्ड ट्रंप और अर्नब की वैचारिक एकता को देखते हुए अटकलें है कि आगामी ट्रंप प्रशासन में भी उनके लिए बेहतर अवसर मुहैया हो सकते हैं. खुद ट्रंप अर्नब के बड़े वाले भक्तों में बताए जाते हैं.

हमारी तरफ से अर्नब के लिए ऑल दे बेस्ट- राष्ट्रसेवा में सतत समर्पित वीर योद्धा के उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं.

First published: 2 November 2016, 8:01 IST
 
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