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अरुण जेटली: न्यायपालिका की बढ़ती दखलंदाजी लोकतंत्र पर हमला

कैच ब्यूरो | Updated on: 12 May 2016, 12:20 IST
मोदी सरकार के मंत्री इन दिनों न्यायपालिका के निर्देशों और फैसलों को लोकतंत्र के अतिक्रमण के तौर पर देख रहे हैं. हाल ही में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने तल्ख लहजे में कहा था कि जजों को इस्तीफ़ा देकर चुनाव लड़ना चाहिए.

वहीं अब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने न्यायपालिका को निशाने पर लिया है. कार्यपालिका और विधायिका के कार्यक्षेत्र में न्यायपालिका की बढ़ती दखलंदाजी पर गहरी चिंता जताते हुए जेटली ने कहा कि टैक्स और वित्तीय मामले अदालतों के हवाले नहीं किए जाने चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के दखल पर सवाल


इसके अलावा वित्त मंत्री जेटली ने सुप्रीम कोर्ट के सूखे के लिए राहत कोष पर दिए फैसले पर भी सवाल खड़े किए.  उन्होंने कहा कि इन फैसलों के जरिए लोकतंत्र की इमारत को धीरे धीरे गिराया जा रहा है.

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सूखे को लेकर उदासीन रवैया अपनाने पर राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाई थी और केंद्र सरकार को सूखे से निपटने के लिए एसटीएफ बनाने का भी आदेश दिया था.

केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को सरकार के अधिकारों में दखलंदाजी मान रही है. राज्यसभा में बजट पर चर्चा के समय वित्त मंत्री जेटली ने सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों के दूरगामी परिणाम के बारे में सदन को आगाह किया.

जीएसटी पर कांग्रेस की मांग का विरोध


बहस के दौरान कांग्रेस ने यह मांग की थी कि जीएसटी मामले में अगर केंद्र और राज्य के बीच कोई तालमेल नहीं बनता है, तो उस सूरत में सुप्रीम कोर्ट के जज ही इस मुद्दे पर फैसला सुनाएं.

विपक्ष की इस बात पर कड़ा विरोध दर्ज करते हुए अरुण जेटली ने कहा कि अगर ऐसे होता है, तो यह लोकतंत्र पर बड़ा हमला होगा.

बीते दिनों में तमाम ऐसे मुद्दे रहे हैं, जिन पर जनहित याचिकाओं (पीआईएल) के जरिए अदालतों का दखल बढ़ता जा रहा है.

मसलन दिल्ली के पर्यावरण का मुद्दा हो या कारों की बिक्री और टैक्सियां चलाने का सवाल हो, या फिर राज्यों में राष्ट्रपति शासन तक के मसले कोर्ट के जरिए ही सुलझ पा रहे हैं. उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के बाद बहुमत परीक्षण का निर्देश भी सुप्रीम कोर्ट ने दिया था.

First published: 12 May 2016, 12:20 IST
 
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