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मोदी को दूसरी सालगिरह पर अरुण शौरी के 10 उपहार

चारू कार्तिकेय | Updated on: 7 May 2016, 14:46 IST

आत्ममुग्ध, चतुर और निराश करने वाला- ये वे चुनिंदा उपमाएं हैं जो वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे जाने-माने अर्थशास्त्री और पत्रकार अरुण शौरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो साल के कार्यकाल के लिए प्रयोग की हैं.

हेडलाइंस टुडे टीवी चैनल से जुड़े परिष्ठ पत्रकार करण थापर को दिये गए एक विशेष साक्षात्कार में शौरी ने मोदी पर सीधा हमला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और उनके व्यक्तिगत गुणो-अवगुणों के अलावा उनके राजकाज पर भी उंगलियां उठाईं.

समय के साथ पार्टी से दूर हो गए बीजेपी के पूर्व राजनेता, शौरी ने बीते वर्ष मोदी सरकार के कार्यकाल का एक वर्ष पूरा होने की पूर्वसंध्या पर भी थापर को कुछ ऐसा ही एक साक्षात्कार देकर सुर्खियां बटोरी थीं. उस साक्षात्कार में शौरी ने कहा था एनडीए सरकार यूपीए प्लस गोमांस है, बस.

ताजा बातचीत में उन्होंने भ्रष्टाचार, अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और शासन सहित कई मुद्दों पर बेहद बेबाकी से अपनी राय रखी है. शौरी ने जो कहा उसके 10 मुख्य बिंदुओं पर एक नजर डालते हैं:

1- बांटो और राज करो: शौरी ने कहा कि बीते दो वर्षों में टकराव, केंद्रीयकरण और ध्रुवीकरण इस सरकार की पहचान बन गए हैं.

2- ऐसा लगता है कि शासन बिल्कुल गौण हो गया है और किसी भी तरह का रिफॉर्म देखने को नहीं मिल रहा है. मोदी वन-मैन सरकार चला रहे हैं जिसमें परामर्श की बेहद कमी है.

3- भ्रष्टाचार पर: हालांकि इस दौरान मोदी सरकार के किसी मंत्री पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है लेकिन इस समयावधि में व्यापम घोटाला, छत्तीसगढ़ का पीडीएस घोटाला, पश्चिम बंगाल का शारधा चिटफंड घोटाला, कॉमनवेल्थ खेल घोटाला और ललित मोदी के प्रकरण में किस तरह की प्रगति हुई यह सवाल बड़ा है. ज्यादातर मामलों में कार्रवाई करने या न करने का फैसला अपनी सुविधा के हिसाब से किया गया.

4- अगस्ता वेस्टलैंड मामले पर: पारिकर का भाषण ऐसा लगा जैसे वे एक अदृश्य चूहे को तलाशने के लिये पहाड़ की खुदाई कर रहे हों. उनका भाषण तथ्यों और सच्चाई से परे था और मोदी द्वारा उसकी प्रशंसा करना बेहद अजीब था. दूसरे, मोदी सरकार ने कंपनी के दो पूर्व प्रमुखों को इतालवी कोर्ट द्वारा बरी किये जाने के खिलाफ अपनी आपत्ति क्यों नहीं दर्ज की? तीसरे, इतालवी जज ने मोदी सरकार की तरफ इशारा करते हुए साफ शब्दों में कहा है कि भारत सरकार का रवैया मददगार नहीं था.

5- राष्ट्रपति शासन को लेकर: अनुच्छेद 356 से जुड़े प्रत्येक मानक का पूरी तरह से मखौल उड़ाया जा चुका है. इसके अलावा समय के साथ निष्ठा बदलने वाले किसी भी व्यक्ति को पार्टी में शामिल करना साफ दर्शाता है कि आप अपने मूल विचारों को बहुत पहले भूल चुके हैं.

6- विदेश नीति पर: अमरीका के बरक्श देखें तो पता नहीं हम क्या हासिल करने में कामयाब रहे हैं. द्विपक्षीय संबंध आपसी व्यक्तिगत संबंधों के मोहताज नहीं होते. ओबामा ने अफगानिस्तान शांति वार्ता से भारत के निष्कासन या फिर पाकिस्तान द्वारा जैश-ए-मोहम्मद पर कोई कार्रवाई न करने को लेकर उंगली तक नहीं उठाई है. पाकिस्तान के मुद्दे पर हम खुद को मूर्ख बना रहे हैं. कश्मीरी अलगाववादियों को पाकिस्तान के साथ वार्ता करने को लेकर रवैया लचर है.

पाकिस्तानी जांचकर्ताओं को पठानकोट एयरबेस का निरीक्षण करने की अनुमति देना मूर्खतापूर्ण फैसला था. चीन के मुद्दे पर ध्यान और गंभीरता की कमी साफ देखी जा सकती है. मोदी को लगता है कि वे चीन को खुश कर सकते हैं लेकिन वर्तमान में चीन पुराने कश्मीर राज्य के 20 प्रतिशत हिस्से पर काबिज है और हो सकता है कि एक दिन ऐसा आए जब वह कहे कि कश्मीर का मसला द्विपक्षीय नहीं बल्कि त्रिपक्षीय है.

7- अर्थव्यवस्था पर: चूंकि पुनरुद्धार के सिर्फ छोटे-मोटे संकेत ही प्रभावी होते दिखाई दे रहे हैं और ऐसे में सरकार के दावों की जांच होनी चाहिये. इस बात को लेकर निश्चित नहीं हूं कि यह समय का कोई चक्र है या यह किसी प्रयास का नतीजा है. भूमि अधिग्रहण का मुद्दा लापरवाही से संभाला गया और यहां तक कि संभवतः प्रधानमंत्री को भी अंधेरे में रखा गया. सिर्फ सुर्खियों का प्रबंध करने पर सारा जोर है.

निवेश को पुनर्जीवित करने की मुख्य चुनौती पर कोई प्रगति नहीं है. टैक्स सुधार और बैंकिंग सुधार नहीं हो पाए हैं. मुख्यमंत्री रहते समय ही मोदी को बैंकिंग संकट की जानकारी थी लेकिन या ता उन्होंने इस ओर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी या फिर उन्होंने यह काम किसी ऐसे व्यक्ति के जिम्मे छोड़ दिया जिसे इस बारे में अधिक जानकारी नहीं थी, या फिर वह कुछ कर ही नहीं पाया.

8- प्रधानमंत्री के नेतृत्व कौशल पर: वे बेहद निराशाजनक रहे हैं और उन्होंने एक बेहतरीन अवसर गंवा दिया है. उन्होंने आत्ममुग्धता और चालाकी का प्रदर्शन किया है. ऐसे लोगों के पास मौकापरस्त लोगों की भीड़ एकत्र रहती है और इनके संबंध कभी चिरस्थाई नहीं होते हैं.

वे हर चीज को इस्तेमाल करो और फेंक दो के नजरिये से देखते हैं. यह बात उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर की बाढ़ और केरल के मंदिर में लगी आग की घटना पर भी लागू होती है. इसके अलावा वे बहुत ही बेरहम हैं. वैश्विक स्तर पर एनआरआई समुदाय की आयोजित होने वाली रैलियां खुद को इस बात की तसल्ली देने का साधन भर हैं कि वे महत्वपूर्ण है और लोग उनसे प्रेम करते हैं. उनके आसपास मौजूद चापलूसों को लगता है कि उन्हें ईश्वर की देन या फिर अवतार कहने जैसे बयान उन्हें पसंद आएंगे.

9- उत्तर प्रदेश के चुनावों से ठीक पहले ध्रुवीकरण करने के लिये राम मंदिर का मुद्दा दोबारा उठाया जा सकता है. इसके अलावा नागरिक स्वतंत्रता पर लगाम लगाने के क्रम में और अधिक व्यवस्थित प्रयास भी किये जाएंगे.

10- मुझे इस बात का डर है कि उनके नेतृत्व में सरकार जिस दिशा में कदम बढ़ा रही है वह भारत के लिये अच्छा नहीं है. इशारों में धमकियां देने का दौर चल रहा है.

इसके अलावा शौरी ने अपने आलोचकों को यह कहते हुए जवाब देने का प्रयास किया कि जो लोग ऐसा सोचते हैं कि वे व्यवस्था की नजरों में गिरने की हताशा के चलते ऐसा कह रहे हैं, वे उनके बारे में बहुत नीचा सोच रहे हैं. अंत में उन्होंने कहा कि किसी भी हालात में वे खुद को इस परिस्थिति में नहीं ला सकते.

First published: 7 May 2016, 14:46 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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