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अरूणाचल प्रदेश: भाजपा को तोहफा, एक को छोड़ सारे कांग्रेसी पीपीए के क्यों हुए?

आकाश बिष्ट | Updated on: 20 September 2016, 14:16 IST
QUICK PILL
  • पूर्व मुख्यमंत्री नबाम तुकी को छोड़ कर,कांग्रेस के 44 में से 43 विधायक भाजपा की सहयोगी पार्टी पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में (पीपीए) में शामिल हो गए. 
  • मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री पेमा खांडू की बातों से साफ जाहिर हो रहा था कि उनके और अन्य विधायकों के पास कोई चारा नहीं बचा था. 
  • लग रहा है कि घाटे से जूझते और केंद्र से मिलने वाले फंड में कमी के चलते खांडू और साथी विधायकों ने यह कदम उठाया है. उन्होंने बताया 3700 करोड़ रूपए के सकल घाटे को देखते हुए यह कदम उठाया गया. 

पूर्वोत्तर में कार्यरत भाजपा के रणनीतिकारों ने प्रधानमंत्री को उनके 67वें जन्म दिन से ठीक एक दिन पहले शानदार उपहार दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री नबाम तुकी को छोड़ कर,कांग्रेस के 44 में से 43 विधायक भाजपा की सहयोगी पार्टी पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में (पीपीए) में शामिल हो गए. 

मोदी संभवतः अपने रणनीतिकारों से बहुत खुश होंगे, जिन्होंने कांग्रेस विधायकों को दबाव में लाकर दल बदल करवा दिया.

मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री पेमा खांडू की बातों से साफ जाहिर हो रहा था कि उनके और अन्य विधायकों के पास कोई चारा नहीं बचा था. 

इस बदलाव को उचित ठहराते हुए उन्होंने कहा, 'अगर विकास के लिए फंड की जरूरत हुई तो अरुणाचल जैसा साधनों के अभाव वाला प्रदेश केंद्र के साथ राजनीतिक मतभेद नहीं रख सकता.'

लग रहा है कि घाटे से जूझते और केंद्र से मिलने वाले फंड में कमी के चलते खांडू और साथी विधायकों ने यह कदम उठाया है. उन्होंने बताया 3700 करोड़ रूपए के सकल घाटे को देखते हुए यह कदम उठाया गया. 

उन्होंने कहा, 'प्रदेश में विकास जरूरतों, क्षेत्रीय संवेदनशीलता और लोगों की उम्मीदों को देखते हुए हमने पीपीए में शामिल होना बेहतर समझा. वर्तमान परिस्थितियों में हमें विरासत में मिले आर्थिक बोझ से उबरने का कोई उपाय नहीं मिल रहा था, इसलिए यह निर्णय लेना जरूरी हो गया था.'

इस निर्णय को ‘आवश्यक और सर्वसम्मति’ से लिया गया निर्णय बताते हुए खांडू ने कहा, 'राज्य में जनता के हितों के साथ विश्वासघात हो रहा था. 

साथ ही उम्मीद जताई कि पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन का एक सहयोगी होने के नाते (भाजपा की एक पहल, पीपीए भी जिसका एक अंग है) अब अरुणाचल को फंड जल्दी मिलेगा, जो कि गंभीर वित्तीय संकट से गुजर रहा है.

कांग्रेस मुक्त भारत के प्रयास में केंद्र ने चुनी सरकारों को अस्थिर करने का बड़ा ही चतुराईपूर्ण तरीका निकाला है

खांडू के बयान से लग रहा है कि कांग्रेस मुक्त भारत के प्रयास में केंद्र ने चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारों को अस्थिर करने का बड़ा ही चतुराईपूर्ण तरीका निकाला है. 

गत जनवरी माह में असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने भी कुछ इसी तरह की चिंताएं जताई थीं. उन्होंने कहा था, ‘केंद्र ने केंद्रीय योजनाओं के लिए फंड एकदम से घटा दिया और फंडिंग का तरीका भी बदल कर 50:50 कर दिया. पूर्व में तुकी ने भी कहा था कि भाजपा के दखल के अलावा फंड की कमी भी एक कारण है.'

पर्यटन उद्योग के बलबूते फल फूल रहे सिक्किम के अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों का कमोबेश यही हाल हैं. ये सब वित्तीय सहायता के लिए केंद्र पर निर्भर हैं. और अगर केेंद्र सरकार बेरहमी की राजनीति अपनाते हुए फंड में कटौती कर देती है तो ये राज्य दबाव में आ जाते हैं.

जब से भाजपा ने क्षेत्र में कांग्रेस शासित राज्यों को हथियाने का प्रयास करना शुरू किया है, तब से यहां कांग्रेस के अंदर बगावत के सुर मुखर हो रहे है, इससे कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व चिंतित है. नेडा के गठन से भी कांग्रेस की परेशानी बढ़ी ही है और कांग्रेस सरकारों में दरार पड़ी है. नेडा के संयोजक हिमान्ता बिस्वा सरमा के बयान भी कांग्रेस के लिए बराबर से परेशानी का सबब बने हुए हैं.

बगावत के बाद सरमा ने अपने बयान में कहा, 'भाजपा क्षेत्र के अन्य राज्यों में भी यही हथकंडा अपनाने वाली है और को-ऑपरेटिव फेडरलिज्म के साथ ही अरूणाचल और बाकी राज्यों में एनडीए की छत्रछाया मेें स्थिरता आने की उम्मीद है. उन्होंने दावा किया कि राज्य में हालात तेजी से बदल रहे हैं.

यह पहली बार नहीं है जब अरूणाचल में कांग्रेस को विधायकों की बगावत का सामना करना पड़ रहा है.

संबंधित राज्य सरकारों को चेतावनी देते हुए असम के स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री ने कहा, ‘मणिपुर में हर विधायक ईबोबी सिंह से दुखी है. मेघालय में कांग्रेस के खस्ता हाल हैं और नेडा बहुत मजबूत स्थिति में है. त्रिपुरा में राजनीतिक अस्थिरता और पुनर्गठबंधन के हालात हैं. वहां गहरा असंतोष व्याप्त है और आदिवासी वाम मोर्चा से नाखुश हैं.'

इस बीच, कांग्रेस ने पीपीए को भाजपा की नाजायज संतान कहा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को लोकतंत्र का खात्मा और संविधान की हत्या करने वाला बताया. 

एक बयान में पार्टी अध्यक्ष आरएस सुरजेवाला ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट से दो बार फटकार पड़ने के बाद अब उन्होंने सामूहिक विघटन, रिश्वत और धमकियां देनी शुुरू कर दी हैं. जनादेश को विफल करने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाना और माहौल को सांप्रदायिक रंग देना एक अलग चीज है.

कांग्रेस ने कहा ‘पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व राज्यपाल की बलि लेकर मोदी सरकार ने संवैधानिक सर्वाेच्चता की हत्या कर दी है.'

हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है कि कांग्रेस को ऐसी बगावत का सामना करना पड़ रहा है, जब भारी संख्या में बागी पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी में शामिल हो गए हों. 1996 में जब राज्य की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से टिम्बर पर टिकी थी और सुप्रीम कोर्ट ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया था तब आर्थिक संकट गहरा गया था.

तत्कालीन मुख्यमंत्री गेगांग अपांग ने प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के खिलाफ बगावत करके पार्टी के ही के 54 विधायकों के साथ एक नई पार्टी का गठन कर लिया था. अपांग नीत इस गुट ने एनडीए का समर्थन किया और आखिरकार 2003 में इसका भाजपा में विलय हो गया. एक साल बाद अपांग फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए.

परन्तु लगता है भाजपा पूर्वोत्तर जीतने की अपनी महत्वाकांक्षा छोड़ना नहीं चाहती. अगर वह गैर भाजपा शासित राज्यों में असंतोष को ऐसे ही हवा देती रही तो प्रधानमंत्री को निकट भविष्य में ऐसे और उपहार मिल सकते हैं, जिन्हें वे खुशी-खुशी स्वीकारेंगे.

First published: 20 September 2016, 14:16 IST
 
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