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राजखोवा की बर्खास्तगी ने संविधान में मौजूद खामी को उजागर किया है

कैच ब्यूरो | Updated on: 14 September 2016, 14:50 IST
QUICK PILL
  • संविधान में जाहिर तौर पर कुछ मामलों में अस्पष्टता है जिससे समय-समय पर ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं. राज्यपाल को नियुक्त किए जाने और फिर उन्हें बर्खास्त किए जाने के मामले में निश्चित प्रावधानों का नहीं होना ऐसा ही मामला है.
  • राष्ट्रपति का भरोसा बने रहना ही राज्यपाल की नियुक्ति का सिद्धांत है. हालांकि इसके साथ कुछ शर्तें भी हैं. इसमें सबसे अहम बात यह है कि राष्ट्रपति को खुली छूट नहीं होती. उन्हें मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करना होता है. और यह अधिकार केंद्र सरकार को अपनी पंसद और नापसंद के मुताबिक राज्यपालों की नियुक्ति करने का मौका दे देता है.

सोमवार 12 सितंबर को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा को उनके पद से बर्खास्त कर दिया. ऐसा लग भी रहा था. राजखोवा ने कुछ दिनों पहले ही कहा था कि वह चाहतेे हैं राष्ट्रपति उन्हें बर्खास्त करें. उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार उन्हें खराब सेहत की वजह से पद से हटाना चाहती हैं जबकि वह बेहतर स्थिति में हैं.

खबरों के मुताबिक  गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने राजखोवा से कहा था उन्हें हटाने का आदेश ऊपर से आया है. हालांकि खबर यह भी है कि खुद राजनाथ सिंह ने राष्ट्रपति से मुलाकात कर उन्हें पद से हटाने का आग्रह किया.

अब यह बात साफ हो चुकी है कि राजखोवा ने केंद्र की एनडीए सरकार के निर्देश पर अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया था. इसके बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट से फटकार मिली और फिर 13 जुलाई 2016 को कोर्ट ने अरुणाचल की चुनी हुई कांग्रेस की सरकार को बहाल कर दिया. इसके लिए राज्यपाल पर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को अस्थिर किए जाने का आरोप भी लगा.

लेकिन तब राजखोवा अपने मुताबिक काम नहीं कर रहे थे क्योंकि संविधान राज्यपाल और राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सलाह के मुताबिक काम करने की सलाह देता है. तो क्या केंद्र सरकार राजखोवा को बर्खास्त कर अपनी छवि साफ करने की कवायद में जुटा हुआ है?

यह समझने के लिए कुछ और अहम सवालों को समझने की जरूरत है?

नियुक्ति और बर्खास्तगी का आधार

संविधान में जाहिर तौर पर कुछ मामलों में अस्पष्टता है जिससे समय-समय पर ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं. राज्यपाल को नियुक्त किए जाने और फिर उन्हें बर्खास्त किए जाने के मामले में निश्चित प्रावधानों का नहीं होना ऐसा ही मामला है.

राष्ट्रपति की सलाह के तहत राज्यपालों की नियुक्ति ऐसा ही मामला है. राष्ट्र्रपति संविधान के अनुच्छेद 156 के तहत राज्यपाल की नियुक्ति करते हैं.

केंद्र की सरकारें अपनी पसंद के मुताबिक राज्यों में राज्यपाल की नियुक्ति करती रही हैं और यह बेहद आम है. इसकी शुरुआत इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान हुई और तब से यह एक सामान्य प्रक्रिया का रूप ले चुकी है. कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने भी यही किया था जब वह 2004 में सत्ता में आई थी.

2014 में जब बीजेपी की सरकार सत्ता में आई तो उसने भी राज्यपालों को हटाना शुरू किया और इसकी शुरुआत कमला बेनीवाल से हुई जो गुजरात की राज्यपाल थीं. तब इसे लेकर बेहद आलोचना हुई.

इसके बाद मिजोरम के राज्यपाल अजीज कुरैशी की बारी आई. वह इस फैसले के खिलाफ 2014 में सुप्रीम कोर्ट में चले गए. कोर्ट ने माना कि इस तरह से राज्यपाल जैसे संवैधानिक अधिकारी को हटाना ठीक नहीं है.

7 मई 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि राज्यपाल केंद्र सरकार का रबर स्टांप नहीं है और उसे केवल इस वजह से पद से नहीं हटाया जा सकता क्योंकि उसकी राजनैतिक विचारधारा केंद्र सरकार से मेल नहीं खाती है.

राष्ट्रपति का प्रसाद

तो फिर राष्ट्रपति के प्रसाद का क्या मतलब है? इसके क्या दायरा है?

इस सिद्धांत की शुरुआत 1979 में हुई थी जब सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के बेंच ने नियुक्ति के प्रावधानों पर विचार किया. तब राजस्थान के राज्यपाल रघुलाल तिलक की नियुक्ति को चलैंज किया गया था.

अदालत ने कहा कि चूंकि राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति की तरफ से की जाती है इसलिए वह एक संवैधानिक पद है. न कि वह केंद्र सरकार का कर्मचारी. इसलिए जब राज्यपाल से राष्ट्रपति का भरोसा उठ जाए तो उसे उसके पद से हटाया जा सकता है.

राष्ट्रपति का भरोसा बने रहना ही राज्यपाल की नियुक्ति का सिद्धांत है. हालांकि इसके साथ कुछ शर्तें भी हैं. इसमें सबसे अहम बात यह है कि राष्ट्रपति को खुली छूट नहीं होती. उन्हें मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करना होता है. और यह अधिकार केंद्र सरकार को अपनी पंसद और नापसंद के मुताबिक राज्यपालों की नियुक्ति करने का मौका दे देता है.

राजखोवा के बाद एक बार फिर से राष्ट्र्रपति के प्रसाद वाले प्रावधान को स्पष्ट किए जाने की जरूरत है. साथ ही सरकार की सनक और मर्जी को भी फिर से देखे जाने की जरूरत है. वरना राजनीति ईमानदारी की धारणा खतरे में पड़ जाएगी. 

First published: 14 September 2016, 14:50 IST
 
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