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'लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद जैसा गैर-भाजपावाद वक्त की जरूरत है'

आशुतोष | Updated on: 9 February 2016, 8:36 IST
QUICK PILL
आशुतोष आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता हैं. वो बता रहे हैं कि अरुणाचल प्रदेश \r\nका राजनीतिक संकट भाजपा की सभी गैर-भाजपा सरकारों को हाशिए पर भेजने की \r\nसाजिश का हिस्सा है.

अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया जाना दो कारणों से चिंताजनक है. एक, केंद्र सरकार ने जनता की चुनी हुई सरकार को जिस तरह भंग कर दिया वो भी तब जब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

दूसरा, राज्यपाल द्वारा सरकार को सदन में बहुमत साबित करने का मौका न दिया जाना. जबकि बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हुए हैं. इसके अलावा एक सीएम के दफ्तर और कैबिनेट से सभी फाइलें सीज करवा लेना.

इंदिरा की राह पर मोदी


ये अचरज भरी बात है क्योंकि भाजपा खुद केंद्र के अधिनायकवाद और राज्य सरकारों के प्रति उसके रवैए के खिलाफ लड़ाई लड़ चुकी है. भाजपा के नेता हमेशा मजबूर संघीय ढांचे और केंद्र-राज्य संबंधों की वकालत करते रहे हैं.

नरेंद्र मोदी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद संघीय सहभागिता की बात की थी. लेकिन वो राज्य सरकारों को 'अस्थिर' करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं. मोदी सरकार दिल्ली के लेफ्टिनेंट-गवर्नर और दिल्ली पुलिस की मदद से जिस तरह से आम आदमी सरकार को परेशान किया जा रहा है वो उसकी शिकायत करती रही है.

कई सीएम राज्य के राज्यपालों पर संवैधानिक पदाधिकारी के बजाय आरएसएस और केंद्र सरकार के एजेंट के रूप में काम करने का आरोप लगाते रहे हैं.

नरेंद्र मोदी खुद को इंदिरा गांधी के मॉडल पर विकसित कर रहे हैंः आशुतोष

इस माहौल में अगर कुछ और राज्य सरकारों का अरुणाचल वाला हाल हो तो हैरत नहीं होनी चाहिए. इन संकेतों से साफ है कि नरेंद्र मोदी खुद को इंदिरा गांधी के मॉडल पर विकसित कर रहे हैं.

इंदिरा गांधी का विपक्षी सरकारों के संग व्यवहार जगजाहिर है. 1980 के दशक में आंध्र प्रदेश की एनटी रामाराव सरकार के साथ उनका बरताव एक क्लासिक उदाहरण है.

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आंध्र सरकार को बर्खास्त करने के लिए इंदिरा ने रामलाल को हिमाचल प्रदेश से आंध्र प्रदेश राज्यपाल बनाकर भेजा लेकिन शंकर दयाल शर्मा ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया था.

उस समय एनटीआर एक शक्तिशाली राजनीतिक ताकत के रूप में उभर रहे थे. वो विपक्ष की एकता की धुरी बन रहे थे. इंदिरा एक उभरते हुए विरोधी की भ्रूणहत्या कर देना चाहती थीं. उस समय ही (बकौल रजनी कोठारी) 'कांग्रेस सिस्टम' में दरारें दिखनी लगी थीं. हालांकि 'केंद्र' फिर भी मजबूत बना रहा.

इस समय मोदी ऐसी सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं जिसे पिछले तीन दशकों की सबसे मजबूत सरकार माना जा रहा है. लेकिन वो उतना मजबूत नहीं है जितना कांग्रेस अपने अच्छे दिन में रही है. मोदी और आरएसएस जानते हैं कि वैसी ताकत पाने के लिए उन्हें विपक्ष पार्टियों को कमजोर और उनकी सरकारों को अस्थिर करना होगा. ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी ने किया.

लोहिया का रास्ता


मोदी की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं. आरएसएस का अपना राजनीतिक-सामाजिक एजेंडा है. लंबे दौर में देखें तो दोनों की 'मकसद' एक है- कांग्रेस जैसा एक सिस्टम तैयार करना जिसमें भाजपा हावी रहे और विपक्षी दल हाशिए पर चले जाएं.

इसलिए भाजपा के 'कांग्रेस-मुक्त' भारत के नारे पर हैरत नहीं होती. ये कहकर कि जवाहरलाल नेहरू ने पटेल, आंबेडकर और बोस के संग उचित बरताव नहीं किया था, जिस तरह उनका कद छोटा करने की कोशिश की जा रही है वो एक लंबी योजना का हिस्सा है. 

मोदी की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं. आरएसएस का अपना राजनीतिक-सामाजिक एजेंडा हैः आशुतोष

इस परिस्थिति में विपक्षी पार्टियों की ये जिम्मेदारी बनती है कि वो एक विकल्प तैयार करें. कुछ वैसे ही जैसे समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने 1960 के दशक में कांग्रेस का मजबूती से मुकाबला करने के लिए 'गैर-कांग्रेसवाद' की रणनीति प्रस्तुत की थी.

लोहिया को पता था कि विपक्ष कांग्रेस को चुनौती देने के लिए बहुत कमजोर है और जब तक पूरा विपक्ष एक छत के नीचे नहीं आ जाता तब तक कुछ नहीं किया जा सकेगा. उनकी रणनीति 1967 के चुनाव में कारगर रही और पहली बार कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी.

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उन्होंने कांग्रेस के दलित-मुस्लिम-अगड़ी जातियों वोटों के बरक्स एक नया सामाजिक वर्ग को भी चिह्नित किया. पिछड़ी जाति की राजनीति के लोहिया ही सूत्रधार थे. कर्पूरी ठाकुर, देवी लाल, लालू यादव, नीतीश कुमार और मुलायम यादव उनके ही प्रयोग के नतीजे हैं.

अब वक्त आ गया है कि 'गैर-भाजपावाद' को आधार बनाकर एक समग्र राजनीतिक रणनीति बनाई जाए ताकि आरएसएस का वैचारिक जवाब दिया सके. आरएसएस को एमएस गोलवरकर के विचारों पर यकीन है जो सोचते थे, "हिंदुुस्तान के गैर-हिंदुओं को या तो हिंदू संस्कृति को अपना लेना चाहिए.....या फिर हिंदू राष्ट्र में अधीन बनकर रहना चाहिए, कोई मांग नहीं करनी चाहिए, कोई अधिकार नहीं मांगना चाहिए, उन्हें नागरिक अधिकारों की भी मांग नहीं करनी चाहिए."

केंद्र और संघीय ढांचा


'गैर-भाजपावाद' को सफल अगर होना है तो इसके लिए धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीयता, संघवाद और सहिष्णुता पर खड़े वैचारिक आधार की जरूरत होगी. केवल धर्मनिरपेक्षता के आधार पर इस वैचारिक एकता की रक्षा नहीं हो सकेगी. यहां तक कि समाज में बढ़ती धार्मिकता को देखते हुए धर्मनिरपेक्षता को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है.

बदले हुए हालात में धर्मनिरपेक्षता को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत हैः आशुतोष

ऐसे वक्त में जब भाजपा विपक्ष को राष्ट्र-विरोधी घोषित किया जा रहा है उसे देखते हुए राष्ट्रवाद को नए संदर्भ में प्रस्तुत करने की जरूरत है. जनता को ये समझाना होगा कि आरएसएस ने आजादी की लड़ाई में कोई भूमिका नहीं निभायी थी.

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ये साफ करना होगा कि 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' से कोई समझौता नहीं किया जा सकता. हमें ये पुरजोर तरीके से कहना होगा कि संघीय ढांचा संविधान का मूल आत्मा है.

इस समय राजनीति ज्यादा विखंडित है, क्षेत्रीय नेता ज्यादा अहंकारी हो गए हैं और लोहिया, जेपी या वीपी सिंह जैसा कोई ऐसा नेता नहीं है जिसके ईर्दगिर्द ऐसा गठबंधन बन सके. वामपंथी बहुत ही कमजोर हो चुके हैं.

लेकिन हर विपत्ति से संभावनाओं के नए दरवाजे खुलते हैं और नए नेताओं का उदय होता है. हम जानते हैं कि अरुणाचल प्रदेश का मामला ऐसा ही निर्णायक मोड़ है.

First published: 9 February 2016, 8:36 IST
 
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