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असम: सत्ता विरोधी लहर और अजमल के बीच फंसी कांग्रेस

राजीव भट्टाचार्य | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • असम में अगले साल होने वाले चुनाव से पहले कांग्रेस बीजेपी विरोधी पार्टियों से महागठबंधन कर सकती है. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इसका संकेत दे दिया है.
  • कांग्रेस के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई सत्ता विरोधी लहर को कम करने और बीजेपी की बढ़ती ताकत से निपटने के लिए एआईयूडीएफ से हाथ मिला सकते हैं.

अगले साल असम में विधानसभा चुनाव होने वाला है. सत्ताधारी कांग्रेस 'सेक्युलर दलों' के साथ 'व्यापक समझदारी' के आधार पर बीजेपी को हराने के लिए गठबंधन करना चाहती है. इसके लिए उसे ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के साथ हाथ मिलाने से भी गुरेज नहीं है.

बिहार चुनाव के बाद असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने गठबंधन की संभावना से इंकार किया था, लेकिन उन्होंने बीजेपी के खिलाफ गठबंधन बनाने की ओर इशारा जरूर किया. गोगोई ने असम गण परिषद (एजीपी) और आरटीआई एक्टिविस्ट अखिल गोगोई की कृषक मुक्ति संग्राम समिति जैसी बीजेपी विरोधी पार्टियों से हाथ मिलाने से इंकार नहीं किया.

इन पार्टियों में एआईयूडीएफ सबसे ज्यादा सीटें जीतने का अनुमान लगा रही है. पिछले चुनाव में उसे 18 सीटें मिली है. जानकारों का मानना है कि अगले चुनाव में पार्टी आराम से ''किंगमेकर'' की भूमिका में होगी.

कांग्रेस में मतभेद

एआईयूडीएफ से गठबंधन को लेकर कांग्रेस में दो राय है. कुछ लोगों की सोच है कि चुनाव से पहले ही एआईयूडीएफ से समझौता कर लिया जाए जबकि दूसरे पक्ष का मानना है कि कुछ ही विधानसभा सीटों पर समझौता किया जाए. दिल्ली में कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता ने चुनाव से पहले से ही समझौता चाहते हैं.

सीएम गोगोई और ज्यादातर विधायक चुनाव से पहले समझौते के खिलाफ हैं. उनका मानना है कि चुनाव में यह पार्टी के प्रदर्शन पर असर डाल सकता है

इत्र का कारोबार करने वाले बदरूद्दीन अजमल ने कांग्रेस विरोध का नारा देकर 2006 में एआईयूडीएफ का गठन किया था. इसी साल हुए चुनाव में उनकी पार्टी ने दस सीटों पर जीत हासिल की जबकि पिछले चुनाव में 18 सीटें मिली. अजमल की पार्टी को ज्यादा समर्थन मध्य और निचले आसाम से मिला है. यहां बांग्लादेशी शरणार्थियों की बहुलता है.

पिछले कुछ महीनों में विपक्षी नेताओं की रैलियों में भारी भीड़ उमड़ी है. इसे सत्ता विरोधी लहर का संकेत माना जा रहा है. कांग्रेस के पास ऊपरी आसाम में हिंदू, चाय की खेती करने वाली जनजाति और ईसाई समुदायों के समर्थन से बेहतर करने का मौका है.

एआईयूडीएफ से साथ समझौता करने पर कांग्रेस को इन इलाकों में नुकसान झेलने की संभावना है. माना जाता कि ऊपरी आसाम के लोगों के बीच बांग्लादेश शरणार्थियों को लेकर गुस्सा है. इसके अलावा बीजेपी पहले ही इस इलाके में पैठ बना चुकी है. पिछले साल हुए आम चुनाव में उसने ऊपरी आसाम की सभी सीटों पर जीत हासिल की है.

वहीं अल्पसंख्यकों वोटरों के बीच एआईयूडीएफ लगातार लोकप्रिय हो रही है और यही वजह कांग्रेस को समझौता करने के लिए मजबूर कर रही है

2011 के जनगणना के अनुसार कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेशी मुस्लिम शरणार्थी इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. उनके अनुसार असम के 126 विधानसभा सीटों में से 49 पर ये हार-जीत का फैसला कर सकते हैं.

पिछले दो विधानसभा चुनावों के नतीजों से पता चलता है कि कांग्रेस इस इलाके में जमीन खो चुकी है. इसलिए, मौजूदा परिस्थितियों में कांग्रेस के लिए चुनाव पूर्व समझौता बेहतर स्थिति होगी. हालांकि, गठबंधन के लिए एआईयूडीएफ ने अभी तक कोई उत्साह नहीं दिखाया है.

एआईयूडीएफ के कड़े रूख के कारण कई कांग्रेसी विधायक हताश हैं. इसका यह भी संदेश जा रहा है कि अजमल की पार्टी बीजेपी के हाथों खेल रही है. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार एआईयूडीएफ के साथ समझौता होने से हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है.

40 से ज्यादा सीटों पर बंगाली हिंदू वोटर प्रभावी भूमिका में हैं. पिछले चुनाव में उन्होंने अपनी नागरिकता के मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी के अनुकूल रूख को देखकर सीएम गोगोई को वोट किया था

इस समुदाय के अधिकतर शरणार्थी पर 'डी वोटर्स' का ठप्पा लगा है. इन्हें संदिग्ध मतदाता माना जाता है और ये मतदान के लिए अयोग्य हैं. बीजेपी लगातार इस समुदाय को लुभाने की कोशिश कर रही है. दो महीने पहले ही केंद्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी किया है. इसके अनुसार बिना वैध दस्तावेज के भी पड़ोसी देशों से आने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भारत में रह सकते हैं.

आदिवासी स्वायत्त परिषदों द्वारा प्रशासित जिलों को कांग्रेस का अभेध गढ़ माना जाता है, लेकिन पार्टी यहां के घटनाक्रम से चिंतित है. अक्टूबर में दीमा हसाओ स्वायत्त परिषद के कई कांग्रेसी सदस्यों ने बीजेपी का साथ दिया. इस कारण दीमा हसाओ स्वायत्त परिषद की कमान बीजेपी के हाथों में आ गई.

इससे पहले टीवा स्वायत्त परिषद में सबसे ज्यादा सीटें लाने के बावजूद कांग्रेस को सत्ता हासिल करने से बीजेपी और एजीपी ने रोक दिया

इस बीच, बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र जिलों में सत्तारूढ़ बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) ने चुनाव में बीजेपी के साथ जाने का पर्याप्त संकेत दे दिया है. बीपीएफ के मुखिया एच मोहलरे ने हाल में ही गठबंधन की संभावनाओं को लेकर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात की है.

एच मोहलरे ने नौ जनजातियों के समूह को यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट (यूपीएफ) के बैनर तले जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. यूपीएफ ने 30 सीटों पर लड़ने का इशारा किया है. इसका किसी प्रकार से कांग्रेस के साथ गठबंधन होने की संभावना नहीं है.

पिछले चुनावों के समय भी सीएम गोगोई ने एआईयूडीएफ के प्रभाव को मानने से इंकार कर दिया था. कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने गोगोई को गठबंधन करने की सलाह दी थी जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था.

चुनावी अभियान के दौरान वह अक्सर व्यंग्य में कहते थे, '' बदरूद्दीन अजमल कौन है? अब राजनीतिक समीकरण इतने बदल चुके हैं कि कांग्रेस के पास एआईयूडीएफ से गठबंधन के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है.

First published: 5 December 2015, 8:13 IST
 
राजीव भट्टाचार्य @catchhindi

गुवाहाटी स्थित वरिष्ठ पत्रकार. 'रांदेवू विथ रिबेल्सः जर्नी टू मीट इंडियाज़ मोस्ट वांटेड मेन' किताब के लेखक.

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