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सुलगते झारखंड पर झामुमो की चुप्पी, कहीं देर ना हो जाए

एन कुमार | Updated on: 30 October 2016, 9:06 IST
(सजाद मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • झारखंड में पिछले दो महीने में हुए तीन गोलीकांड में मारे गये सात लोग मारे जा चुके हैं. 
  • बावजूद इसके, राज्य में हालात सामान्य होने की बजाय बिगड़ते जा रहे हैं. यहां सियासी गर्मी बढ़ती जा रही है. 

22 को खूंटी के सायको बाजार गोलीकांड में एक आदिवासी अब्राहम मुंडा की मौत हो गई थी. उसके अगले दिन 23 अक्टूबर को खूंटी में आदिवासी का बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ और गोलीकांड को लेकर राज्य के दिग्गज नेताओं ने बयानों से एक-दूसरे पर हमला किया.

 24 अक्तूबर को फिर बड़कागांव गोलीकांड को लेकर झारखंड बंद हुआ. 25 को राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने संथाल के गढ़ दुमका में महाधरना किया. मंच से बाबूलाल समेत तमाम नेता सरकार को निशाने पर लेते रहे. 26 को मरांडी के इसी महाधरने में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी पहुंचे. उन्होंने भी झारखंड सरकार को निशाने पर लिया. 

इन सभी घटनाओं के बीच आईएएस अधिकारी वंदना डाडेल भी चर्चा में बनी रहीं. वंदना ने 20 अक्टूबर को फेसबुक पर लिखा था कि अचानक से राज्य में धर्मांतरण का मुद्दा सुर्ख़ियों में कैसे आ गया. उन्होंने सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाया था. इसके बाद उन्हें सरकार ने कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया था. वहीं वंदना अर्जी देकर छुट्टी पर चली गई थीं. 

मुद्दा

इस बीच झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास, मंत्री सीपी सिंह आदिवासियों के धर्मांतरण पर भड़काऊ बयान देते रहे. धर्मांतरण की बहस ने रफ़्तार 16 अक्तूबर को उस वक्त पकड़ा, जब संथाल परगना के भोगनाडीह गांव में सिदो कान्हू की प्रतिमा का शुद्धिकरण करवाने के बहाने आदिवासियों का भारी जुटान हुआ. यहां आदिवासियों नेताओं और प्रशासन के बीच तनातनी भी हुई. इसी दौरान जामताड़ा में गोमांस के कथित फोटो शेयर करने पर एक मुस्लिम नौजवान मिन्हाज अंसारी की पुलिस हिरासत में पिटाई से हुई मौत भी सुर्ख़ियां बटोरती रही. 

इन सभी मामलों पर कांग्रेस, बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा, भाकपा माले समेत कई वाम दल और तमाम संगठन मौक़े के तौर पर पकड़ते रहे, आक्रामक तरीके से राजनीति करने में लगे रहे लगे रहे और अभी भी सक्रिय हैं. सरकार में शामिल आजसू पार्टी के नेता भी, दिखावे के लिए ही सही, ऐसे आंदोलनों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे या कुछ बोलते रहे. 

झामूमो की चुप्पी

मगर सबसे ज़्यादा हैरानी राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी और आदिवासी राजनीति की पर्याय मानी जाने वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा की चुप्पी है. वह इन सभी मसलों पर या तो चुप है या फिर रस्मी बयान देकर किनारे बैठी हुई है. सवाल झामुमो के रवैये पर उठने लगे हैं क्योंकि रांची, खूंटी, बड़कागांव वगैरह को छोड़ भी दें तो संथाल का इलाका झामुमो का गढ़ है और वहां की हलचलों पर पार्टी की चुप्पी हैरान करने वाली है. 

झारखंड विकास मोर्चा के नेता और राज्य के पूर्व मंत्री बंधु तिर्की कहते हैं कि अगर चुप्पी यूं ही बनी रही तो लोग सवाल उठाना शुरू कर देंगे कि कहीं झामुमो की सरकार से मिलीभगत तो नहीं? झारखंड विकास मोर्चा के ही विधायक दल के नेता प्रदीप यादव कहते हैं कि झामुमो की राजनीति हर कोई देख रहा है. 

26 अक्टूबर को भी मरांडी के महाधरने में कई नेताओं ने भाजपा और राज्य सरकार पर जितना निशाना साधा, उतने ही निशाने पर झामुमो को भी रखा और साफ़ कहा कि झामुमो सरकार से समझौता कर चुकी है. हालांकि झामुमो को इन तमाम बयानों और सवालों से कोई फर्क़ नहीं पड़ता. 

पार्टी महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं कि सभी को पता है कि झारखंडियों और आदिवासियों का हिमायती कौन है? खूंटी की घटना के बाद भी पार्टी ने केंद्रिय गृह मंत्री को चिट्ठी लिखकर राज्य सरकार को बर्खास्त करने की मांग की थी.

झामुमो की तैयारी

सुप्रियो कहते हैं कि 15 नवंबर को राज्य के स्थापना दिवस के दिन पार्टी की ओर से जमशेदपुर में बड़ा जुटान है. उस दिन पार्टी अपने संघर्ष का रोडमैप बता सकती है. झामुमो नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमत्री हेमंत सोरेन कहते हैं कि हम बार-बार कह रहे हैं कि राज्य की सरकार तानाशाह हो गयी है.

हेमंत और सुप्रियो की बात से यह साफ है कि पार्टी राज्य सरकार से दो-दो हाथ करने के मूड में है. मगर सभी राजनीतिक दलों की ओर से चल रहे साझा विरोध अभियान का हिस्सा बनने से बचेगी. 

वजह बाबूलाल मरांडी हैं जो झामुमो के गढ़ संथाल में महाधरने के बाद एक नेता के तौर पर उभर रहे हैं. झामुमो अभी बाबूलाल मरांडी या किसी दूसरे दल के मुद्दों पर बोलकर उन्हें तवज्जो देना नहीं चाहती क्योंकि इससे उस आंदोलन का नेतृत्वकर्ता बनने का मौका उसके हाथ से निकल जाएगा और श्रेय दूसरे को मिल जाएगा. 

संभव है कि झामुमो के नेता रणनीतिक तौर पर सही सोच रहे हों और नफा-नुकसान के हिसाब से यह उचित हो लेकिन झामुमो के इस रवैये से फिलहाल भाजपा नेता खुश हैं. लगातार बाबूलाल मरांडी की सक्रियता और अभी तक झामुमो की शिथिलता ने भाजपा को मनमानी छुट तो दे ही दी है. 

First published: 30 October 2016, 9:06 IST
 
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