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ब्रसेल्स हमला: आतंकवाद को लेकर वैश्विक सहयोग तैयार करने का बड़ा मौका

विवेक काटजू | Updated on: 25 March 2016, 17:19 IST
QUICK PILL
  • ब्रसेल्स में हुए हमलों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रसेल्स में भारत और यूरोपीय संघ के बीच होने वाली बातचीत में आतंकवाद पर गंभीरता से बात होने की उम्मीद जगी है.
  • भारत और यूरोपीय संघ के बीच बड़े पैमाने पर आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा मसलों को लेकर भागीदारी है. पिछले कुछ दशकों के दौरान सुरक्षा खासकर आतंकवाद से निपटने की दिशा में दोनों के बीच सहयोग में बढ़ोतरी हुई है.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रसेल्स यात्रा से 10 दिनों पहले ही आतंकी संगठन आईएसआईएस ने वहां हमला किया है. मोदी 10 दिनों बाद भारत और यूरोपीय संघ सम्मेलन में भाग लेने के लिए ब्रसेल्स जाने वाले हैं और जहां दोनों देशों के नेताओं के बीच द्विपक्षीय बातचीत होनी है.

बातचीत के लिहाज से यह वार्ता बेहद रणनीतिक है. भारत और यूरोपीय संघ के बीच बड़े पैमाने पर आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा मसलों को लेकर भागीदारी है. पिछले कुछ दशकों के दौरान सुरक्षा खासकर आतंकवाद से निपटने की दिशा में दोनों के बीच सहयोग में बढ़ोतरी हुई है. 

मोदी की इस यात्रा से दोनों देशों के बीच इस भागीदारी कोे नई ऊंचाई पर ले जाने का मौका मिलेगा. आतंकी हमलों के बाद सुरक्षा को लेकर होने वाली बातचीत को लेकर माहौल बन चुका है.

ब्रसेल्स में हुए आतंकी हमले में 34 लोग मारे गए जबकि 200 से ज्यादा घायल हुए हैं

ब्रसेल्स के बाद मोदी परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में भाग लेने के लिए वाशिंगटन जाएंगे. परमाणु सुरक्षा के लिए आतंकवाद सबसे बड़ा खतरा है. यही वजह है कि अमेरिकी सरकार परमाणु सुरक्षा को लेकर ज्यादा जोर दे रही है. 

ब्रसेल्स हमले ने एक बार फिर से साबित कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद मसलन आईएसआईएस जैसा आतंकी समूह एक बार फिर से तेजी से दुनिया में दखल बढ़ा रहा है.

ऐसे में मोदी सरकार की कोशिश एक बार फिर से सभी देशों को एक मंच पर लाने की होगी ताकि राज्य की नीति के तौर पर आतंकवाद के इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सके. उन्होंने इस मामले में अंतरराष्ट्र्रीय सहयोग की बात करनी चाहिए. आतंकवाद से वैश्विक सहयोग के बिना नहीं निपटा जा सकता.

9/11 के बाद बदला रुख

हमारे समय की सबसे बड़ी समस्या आतंकवाद है. ऐसा इसलिए क्योंकि  अब यह जिंदगी और मुक्त समाज के लिए खतरा बन चुका है. ऐसे में आतंकवाद से निपटने के लिए एक वास्तविक और सच्चे मायने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है.

हालांकि अभी तक इस तरह की कोशिशों का अभाव रहा है. अब वैश्विक खासकर पश्चिमी देशों के रुख में बलाव देखने को मिल रहा है.

1990 के पहले तक पश्चिमी ताकतें आतंकवाद को तीसरी दुनिया की समस्या के तौर पर देखा करती थीं. उन्हें लगता है कि आतंकवाद से अमेरिकी भूमि और यूरोप पूरी तरह से मुक्त है. उन्हें लगता था कि अगर तीसरी दुनिया में उनके हितों को नुकसान भी पहुंचता है तब भी वह अपनी भूमि पर आतंकवाद से महफूज रहेंेगे.

इसलिए जब भी भारतीय राजनयिकों और अधिकारियों ने पाकिस्तान की तरफ से होने वाले आतंकवाद का मुद्दा उठाया तो पश्चिमी ताकतों ने इसे भारत की समस्या करार देकर अपना पल्ला झाड़ लिया. उन्होंने साफ संकेत दिया कि यह भारत की समस्या है तो इसे भारत को सुलझाना चाहिए.

पश्चिम राजनयिक इस बात को सीधे खारिज कर देते थे कि आतंकवाद वैश्विक समस्या है और इसका समाधान भी वैश्विक तरीके से ही किया जाना चाहिए.

प्रधानमंत्री मोदी 30 मार्च को भारत और यूरोपीय संघ की बैठक में शामिल होने ब्रसेल्स जा रहे हैं और इसके बाद वह वाशिंगटन जाएंगे

9/11 के पहले अफगान जिहाद के बड़े नेता और तालिबान से लोहा ले रहे अहमद शाह मसूद ने अमेरिका और यूरोप को अल कायदा के खतरों से चेताया था. लेकिन उन्होंने उनकी चेतावनी को अनसुना कर दिया.बाद में अल कायदा, तालिबान और पाकिस्तानी एजेंसियों ने हमले के दो दिन पहले ही मसूद की हत्या कर दी.

हमले के बाद बदली प्राथमिकता

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले ने आतंकवाद को लेकर पश्चिमी दुनिया के रुख में बड़ा बदलाव किया. हालांकि वैश्विक आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में उनकी कोशिशों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया.

अमेरिका और यूरोप की प्राथमिकता अब आतंकी हमलों से खुद को सुरक्षित रखने की है. इस मामले में वह सभी देशों से सहयोग की मांग कर सकते हैं. स्थानीय कानून और न्यायिक क्षेत्राधिकार में बदलाव कर यह काम आसानी से किया जा सकता है.

सीसीआईटी को लेकर बना दबाव

मोदी ने यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली में वैश्विक आतंकवाद पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग की बात आगे बढ़ाई थी. उन्होंने यह भी कहा था कि कॉम्प्रिहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म (सीसीआईटी) के भारतयी प्रस्ताव को अब स्वीकार किया जाना चाहिए जिसे 1996 में पेश किया गया था.

उन्होंने सीसीआईटी को तत्काल लागू किए जाने की मांग की थी. इसे आगे बढ़ाने के लिए उन्हें दोनों देशों के बीच होनेन वाली द्विपक्षीय बातचीत में मुद्दे को मजबूती से आगे बढ़ाना होगा. 

मोदी संयुक्त राष्ट्र में भारत के कॉम्प्रिहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म के प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने की बात आगे बढ़ा रहे हैं

ब्रसेल्स और वाशिंगटन की यात्रा सीसीआईटी के एजेंडे को आगे बढ़ाने का बड़ा मौका है. आईएसआईएस समेत वैश्विक आतंकवाद से निपटने की दिशा यह बेहदर कारगर टूल साबित होगा.

वाशिंगटन के बाद मोदी सउदी अरब की यात्रा पर जाएंगे और वहां वह सीसीआईटी को आगे बढ़ाने का काम कर सकते हैं. अगर वह सउदी को समझाने में सफल रहते हैं तो वह ऐसा कर पाएंगे जो उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री नहीं कर पाए. उन्हें सउदी को यह समझाना होगा कि सीसीआईटी न तो फिलीस्तीन की लड़ाई को नुकसान पहुंचाएगा और नहीं इसके निशाने पर मुस्लिम होंगे. उन्होंने सीसीआईटी को आगे बढ़ाने का रास्ता बनाया है और यह एक बड़ी रणनीतिक जीत है.

अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं आया है जिससे यह साबित हो कि पाकिस्तान की सुरक्षा नीति में कोई बदलाव आया है

वाशिंगटन और ब्रसेल्स में मोदी के पास पाकिस्तान की तरफ से सीमा पार से होने वाले आतंकवाद को उठाने का मौका है. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच हुई बातचीत और पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान के रुख में आए बदलाव के बावजूद मोदी को द्विपक्षीय और सार्वजनिक मंच पर यह मुद्दा उठाते रहना चाहिए.

अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं आया है जिससे यह बात साबित हो कि पाकिस्तान की सुरक्षा नीति में कोई बदलाव आया हो. पाकिस्तान अभी भी भारत के खिलाफ आतंक की नीति से बाज नहीं आ रहा है. हालांकि पाकिस्तान ने कुछ सदिच्छा दिखाई है लेकिन इसके बावजूद उसकी नीति में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया है.

पाकिस्तान ने पठानकोट हमले में जो कुछ भी सकारात्मक किया है उससे मोदी को कतई संतुष्ट नहीं होना चाहिए.

First published: 25 March 2016, 17:19 IST
 
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