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जम्मू कश्मीर: इस बार की गर्मियां बहुत खूनी हो सकती है, अब तक 30 मौतें

रियाज-उर-रहमान | Updated on: 12 July 2016, 7:45 IST
QUICK PILL
  • पिछली बार के मुकाबले इस बार स्थिति इस लिहाज से अलग है कि अब यह मामला केवल दक्षिणी और उत्तरी कश्मीर के कुछ शहरी इलाकों तक सीमित नहीं हैं.
  • इस बार राज्य के गांवों से भी युवा सड़कों पर उतर रहे हैं, उन्होंने भी कटे पेड़ और चट्टान की मदद से रास्तों को रोक रखा है.
  • नौगाम, हैदरपुरा, पीरबाग और हुमहामा आदि इलाकों में भी स्थिति अलग नहीं है. यह नए श्रीनगर का इलाका है जो पिछले दो दशकों में बसा है. अभी तक यह इलाके श्रीनगर घाटी में हो रहे उथल पुथल से अप्रभावित रहते थे. 

रावलपुरा की गलियों में चलना खतरनाक हैं. श्रीनगर से सटा यह नगर अतीत में शायद ही किसी घटना की वजह से अशांत रहा हो. सड़क पर कुछ लोग हैं और कुछ गाड़ियां भी चल रही हैं. कई जगहों पर लोगों ने सड़कों को सीमेंट की बड़ी पाइप से रोक रखा है या फिर कुछ जगहों पर उन्होंने पेड़ काट कर गिरा दिया है.  शाम होते ही मस्जिद से आजादी के नारे लगने लगते हैं और यह आवाज सेना के कैंपों तक पहुंचती हैं.

नौगाम, हैदरपुरा, पीरबाग और हुमहामा आदि इलाकों में भी स्थिति अलग नहीं है. यह नए श्रीनगर का इलाका है जो पिछले दो दशकों में बसा है. अभी तक यह इलाके श्रीनगर घाटी में हो रहे उथल पुथल से अप्रभावित रहते थे. 

पिछली बार के मुकाबले इस बार स्थिति इस लिहाज से अलग है कि अब यह मामला केवल दक्षिणी और उत्तरी कश्मीर के कुछ शहरी इलाकों तक सीमित नहीं हैं बल्कि राज्य के गांवों से भी युवा सड़कों पर उतर रहे हैं उन्होंने भी कटे पेड़ और चट्टान की मदद से रास्तों को रोक रखा है.

बारामूला के बाहर युवाओं के समूह ने सेना के शिविर की तरफ बढ़ने की कोशिश की लेकिन सेना की तरफ से हवा में गोली चलाए जाने के बाद उन्हें भागना पड़ा. ऐसा ही सोपोर के वोदुरा गांव में हुआ.

हालिया तनाव का केंद्र दक्षिणी कश्मीर का इलाका है. हिजबुल मुजाहिद्दीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर एक बार फिर से अशांत हो चुका है. सोमवार को पदगामपुरा और मलंगपुरा के युवाओं के समूह ने कर्फ्यू को धत्ता बताते हुए अवंतीपुरा के एयर बेस की तरफ मार्च किया और पत्थरबाजी की. 10 जुलाई को जम्मू-कश्मीर पुलिस की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति की भाषा से सब कुछ समझा जा सकता है.

विज्ञप्ति में लिखा था, 'पत्थरबाजी की घटनाएं नेवा, पुलवाामा, शोपियां, लासीपुरा, राजपुरा, हल पुलवामा, तहब पुलवामा, तांचीबाग, पंपोर, दमाल, संगम, जैनपुरा, किमोह, यारीपुरा, बेहीबाग कुलगाम, वाइलू, वारपुरा, सोपोर, तारजू, बटमालू, कामरिया, गंदेरबल, सोबग बड़गाम, मीरगुंड और शेखुपरा में हुईं.'

हालिया तनाव का केंद्र दक्षिणी कश्मीर का इलाका है. बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर फिर से अशांत हो चुका है.

यह इलाके कश्मीर घाटी में एक से दूसरे सिरे तक फैले हुए हैं. पुलिस ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की एक गाड़ी और लासीपुरा पुलवामा थाने में जब्त कर रखी गई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया. बिजबेहरा में भी भीड़ ने रेलवे पुलिस गार्ड रुम और रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स के बैरक को आग के हवाले कर दिया. दमाल कुशीपुरा में पुलिस की चौकी को भी भीड़ ने फूंक दिया.

पुलिस ने कहा कि आतंकी कानून और व्यवस्था की खराब स्थिति का फायदा उठा रहे हैं और वह सुरक्षा बलों पर हमला कर रहे हैं.

पुलिस ने कहा, 'आतंकियों ने कानून और व्यवस्था की स्थिति को बनाए रखने के लिए मुरन चौक पर तैनात किए गए सीआरपीएफ के जवानों पर ग्रेनेड फेंका. इस हमले सीआरपीएफ के जवान घायल हो गए.' शोपियां में एसपी के गाड़ी को आग के हवाले कर दिया गया और उस पर ग्रेनेड भी फेंका गया. आतंकियों ने उतरेसू में पुलिस चौकी पर भी गोलीबारी की.

अनुमान के मुताबिक घायलों की संख्या बढ़कर 800 से अधिक हो चुकी है. इनमें से कुछ अति गंभीर हालत में हैं. करीब 150 से अधिक को अनंतनाग जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जिनमें से 100 से अधिक को गोलियों के  घाव हैं.

श्रीनगर अस्पताल में भर्ती किए गए लोगों की संख्या इससे तिगुनी है. श्रीनगर में मेडिकल एमरजेंसी घोषित किया गया है. अगले कुछ दिनों में इस संख्या के बढ़ने की संभावना ही है. सोमवार को 13 वर्षीय शाहिद गुलजार की मौत हो गई.

कश्मीर घाटी इससे पहले 2010 में अशांत हुई थी. पिछली बार के मुकाबले इस बार फर्क सिर्फ लोगों के गुस्से का है. युवा 90 के दशक में लगाए जाने वाले नारे लगा रहे हैं और यह स्थिति को और अधिक बिगाड़ने का काम कर रही है. नई पीढ़ी ज्यादा आक्रामक और विद्रोही है. वह हथियार उठाने को भी तैयार है.

श्रीनगर के एक बड़े पुलिस अधिकारी ने कहा, '90 की पीढ़ी बंदूक उठाने में देर नहीं करती थी. उसे यह पता नहीं होता था कि आगे क्या होगा.' लेकिन 'मौजूदा पीढ़ी परिणाम के बारे में जानती है.'

युवा 90 के दशक में लगाए जाने वाले नारे लगा रहे हैं और यह स्थिति को और अधिक बिगाड़ने का काम कर रही है.

युवाओं के लिए पुलिस चौकी जानी पहचानी जगह है और अब उन्हें इससे डर नहीं लगता है. विरोध प्रदर्शन के दौरान भीड़ पुलिस चौकी को फूंक देेती है. उन्हें अब तक के हुए नुकसान से डर नहीं लगता है.

तो फिर स्थिति किस तरफ जा रही है? 2010 की तरह प्रदर्शन के लंबा खिंचने की संभावना कम ही है. 2010 इस लिहाज से अहम है कि इस दौरान न केवल बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुआ बल्कि इससे बुरहान जैसे युवाओं को पैदा किया.

असाजीपुरा के स्थानीय निवासी मोहम्मद अशरफ बताते हैं, 'राज्य सरकार के लिए इसे रोकने का एकमात्र तरीका प्रदर्शनकारियों की हत्या को रोकना है.' उन्होंने कहा, 'लेकिन ऐसा लगता है कि इसससे सरकार पर बेहद कम असर होता है. वह या तो अपने फोर्स को नियंत्रित करना नहीं चाहती या फिर वह अब उनके नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं.'

सोमवार को दो लोग घायल हुए. इनमें से एक की हालत बेहद गंभीर है. राज्य सरकार का रवैया भी लोगों में गुस्से का बड़ा कारण है. सरकार ने सुरक्षा बालों को रोकने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया. किसी पुलिस अधिकारी को निलंबित नहीं किया गया है. सरकार की तरफ से ऐसा कोई संदेश नहीं दिया जा रहा है जिससे यह साफ हो सके कि वह बिना वजह मारे गए लोगों के मामले में चुप नहीं है.

रविवार को मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में राज्य मंत्रिमंडल की बैठक हुई और इसमें  निर्दोष लोगों की मौत पर गुस्सा और शोक जाहिर किया गया. बाद में शिक्षा मंत्री और राज्य सरकार के प्रवक्ता नईम अख्तर ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि आखिरी क्यों नहीं इस मामले में महबूबा मुफ्ती को इस्तीफा देना चाहिए, जबकि 2010 की अशांति के दौरान उन्होंने अब्दुल्ला से इस्तीफा मांगा था.

अख्तर ने कहा, 'मैं किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगा.'

First published: 12 July 2016, 7:45 IST
 
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