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50 दिन का कर्फ्यू: कश्मीर की दिनचर्या में किस तरह से बीतता है एक दिन?

रियाज-उर-रहमान | Updated on: 28 August 2016, 8:19 IST

जब मुअज्जिन भोर की सलत-अल-फज्र पढ़ते हैं, श्रीनगर के कुछ हिस्सों से लोग सहमे-सहमे अपने घर से निकलते हैं, जरूरी नहीं कि वे मस्जिद ही जाएं, बल्कि पास के बाजार, खासकर मोहल्लों की दुकानों से दूध, ब्रेड, सब्जी जैसी रोजमर्रा की चीजें खरीदने के लिए वे निकलते हैं.

देखते ही देखते सड़कों पर चहल-पहल हो जाती है. कुछ देर के लिए गली में ऊंची आवाज़ में खुशगवार गुफ्तगू होने लगती है, लगता है जैसे सबकुछ सामान्य है.

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पर जैसे ही घड़ी भोर से आगे टिकटिक करती है, चिंता बढ़ने लगती है. खरीदार और दुकानदार दोनों अपना लेन-देन तुरंत निपटाने लगते हैं. जल्द ही शटर नीचे गिर जाते हैं, लोग फटाफट उन्हीं पैरों या वाहनों से घर लौटने लगते हैं.

हुर्रियत का विरोध रोस्टर लागू हो जाता है, जो अंतहीन शटडाउन और विरोध का प्रतीक बन गया है. सड़कें खाली हो जाती हैं, दुकानें बंद हो जाती हैं और पास का रिहायशी इलाका डर के मारे एकदम शांत हो जाता है. यह चुप्पी दिनभर कायम नहीं रहती.

पूरी घाटी में छोटे-बड़े विद्रोह होने के समाचार स्थानीय समाचारपत्रों में रोजाना आ रहे हैं

मौन शहर जल्द ही सुरक्षा बल और विरोधियों के बीच नियंत्रण के लिए चल रहे एक मंच में तब्दील हो जाता है. पुलिस और अर्धसैनिक कर्मचारी खाली सड़कों पर कब्जा कर लेते हैं. कई 'संवेदनशील' इलाकों में आने-जाने के रास्ते सील कर दिए जाते हैं, और मुख्य सड़क के चौराहों पर कंटीले तार तान दिए जाते हैं.

डलगेट, हजरतबल, हवाल, नवहट्टा, ईदगाह और हब्बा कदल जैसे आस-पास के इलाके पिछले 50 दिनों से बिलकुल लॉकडाउन हैं.

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लेकिन यह सारी सुरक्षा व्यवस्था युवाओं को समूह को सड़कों पर हुड़दंग करने, भारत-विरोधी नारे लगाने और सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंफने से बमुश्किल ही रोक पाती है. यह लड़ाई दिनभर चलती है. बदले में सुरक्षा बल के जवान अश्रु गैस से लेकर पैलेट बंदूकों तक का इस्तेमाल करते हैं. नतीजे में लोग घायल हो रहे हैं, अंधे हो रहे हैं.

अक्सर लोग मारे जाते हैं, जिसकी संख्या 68 है. और यह दृश्य पूरी घाटी में दोहराया जा रहा है, जो शहरी इलाकों से ज्यादा देहाती इलाकों में गंभीर है. ऐसा तो 2010 तक हुए तीन लगातार आंदोलन में भी नहीं हुआ था.

उफान पर विद्रोह

हाल का विद्रोह उस समय शुरू हुआ जब सुरक्षा बलों ने 8 जुलाई को दक्षिणी कश्मीर के बुंडूरा गांव में हिजबुल मुजाहिद्दीन कमांडर बुरहान वानी को मार दिया था. उनकी मौत की खबर फैलने के साथ ही हजारों की संख्या में लोग गांव के रास्तों को जाम करते हुए विरोध में सड़कों पर उतर आए.

बुरहान की मौत के 48 घंटे के भीतर, 35 लोगों ने अपनी जान गंवाई और सैकड़ों की आंखों पर पैलेट्स के घाव लगे, जिनमें से कइयों की आंख की रोशनी आंशिक या स्थाई रूप से चली गई.

घाटी में चल रहे विरोध प्रदर्शन पर सरकार का ढुलमुल रवैया

उसके बाद से दक्षिणी कश्मीर में अशांति तेजी से फैली और फिर वहां से मध्य और उत्तरी कश्मीर तक जा पहुंची. महबूबा मुफ्ती के इस दावे के विपरीत कि इस विरोध में केवल 5 फीसदी लोग शामिल हैं, लगता है कि किसी भी समय पूरी जनसंख्या सड़कों पर उतर सकती है. केवल जबरदस्त लॉकडाउन और संचार व्यवस्था पर रोक के जरिए ही इस नाराजगी को नियंत्रण में रखा गया है.

हाल में जारी एक आंकड़े के मुताबिक अब तक 10,000 के करीब लोग घायल हो चुके है

50 दिन से अशांत और लगातार कर्फ्यूग्रस्त कश्मीर में हालात अपेक्षाकृत बदले हैं, पर बहुत कम, हिंसा और अराजकता कभी भी फैलने की आशंका लगातार बनी रहती है.

पूरी घाटी में छोटे-बड़े विद्रोह होने के समाचार स्थानीय समाचारपत्रों में रोजाना आ रहे हैं. पुरुषों के प्रदर्शन, औरतों के जुलूस, बसों और ट्रकों पर विद्रोह, बाइक पर विरोध और कभी झेलम नदी में नावों पर विद्रोह. इन घटनाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर बाकायदा पोस्ट किए जा रहे हैं, पर ये वाइरल नहीं होते क्योंकि इंटरनेट पर लगातार रोक लगी हुई है.

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सड़कों पर सुरक्षा बलों की तैनाती के कारण इस तरह के कई प्रदर्शन अंदरूनी इलाकों में भी होते रहते हैं. फिर भी अक्सर टकराहट हो ही जाती है, और घायलों की संख्या में वृद्धि होती रहती है. हाल में जारी एक आंकड़े के मुताबिक अब तक 10,000 के करीब लोग घायल हो चुके है. उनमें कई सुरक्षा बल के कई जवान भी हैं.

इतनी ज्यादा संख्या में घायल, अधिकतर पैलेट्स से जले हुए युवाओं के लिए श्रीनगर में एसएमएचएस जैसे अस्पतालों में भारी चिकित्सा बंदोबस्त किए गए हैं. जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में सरकार द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट के मुताबिक अस्पताल ने 42 दिनों में हजारों अन्य घायलों के अलावा, पैलेट्स से घायल हुई आंखों के लिए 446 लोगों को भर्ती किया, जिनमें से नियमित अंतराल पर कोई न कोई दम तोड़ देता है. जिन लोगोंं की आंखों का ऑपरेशन किया गया है उनमें से करीब 200 लोगों की एक या दोनों आंखों की रोशनी चली गईं है, बाकी की स्थिति भी कोई ज्यादा बेहतर नहीं है.

एसएमएचएस के एक नेत्र-विशेषज्ञ ने बताया, 'आंख पानी का बुलबुला है. जब यह तेज गति से घूमती हुई पैलेट की मेटल आई बॉल को हिट करती है तो पहले जैसी नहीं रह जाती.' उन्होंने अपनी बात जारी रखी, 'नजर कितनी खराब होगी, यह इस पर निर्भर करता है कि कितनी चोट लगी है.'

आजादी का समवेत स्वर

जैसे-जैसे दिन अवसान की ओर बढ़ने लगता है, विद्रोह के सुर तेज होने लगते हैं. श्रीनगर में जो कोलाहल सुनाई देता है, वह आजादी के नारों का समवेत स्वर है. जैसे- हम क्या चाहते? आजादी! छीन के लेंगे आजादी! आई आई आजादी! पाकिस्तान जिंदाबाद! आदि...

हाल की लड़ाई किसी एक खास इलाके से नहीं है. रोजाना, कुछ नए इलाके इस संघर्ष में कूद पड़ते हैं और फिर कुछ और शामिल हो जाते हैं. इनमें से कुछ इलाके, जैसे श्रीनगर में रावलपाड़ा, पहले हुए आंदोलनों के दौरान काफी शांत रहा था इसलिए वहां आतंकवाद भी कम रहा.

हुर्रियत कलेंडर को ध्यान में रखते हुए शाम होते-होते कई इलाकों में विरोध कम हो जाता है, जिसके अनुसार शाम छह से सुबह छह बजे तक हड़ताल में विश्राम करना होता है.

पर कई इलाकों में, विरोधी इस कैलेंडर को भी नहीं मानते और विरोध जारी रखते हैं. यहां तक कि दुकानदारों के दुकान खोलने में भी बाधा डालते हैं. जैसे-जैसे शाम से रात होने लगती है, भारत का विरोध जताने के लिए मस्जिद के लाउडस्पीकर आजादी के नारों और रिकार्ड किए गए गानों से गूंजने लगते हैं. यह रात के दस बजे तक चलता रहता है, जब श्रीनगर और बाकी की घाटी में चुप्पी छाने लगती है. हालांकि कुछ हिस्से फिर भी अशांत रहते हैं.

लोग रात में विश्राम केवल इसलिए करते हैं ताकि अगले दिन अपने विरोध के लिए पिर से जरूरी ऊर्जा जुटा सकें. वहां की यही नई दिनचर्या है.

इसके साथ-साथ घायलों और मृतकों की संख्या बढ़ती रहती है. शुक्रवार के दिन, एक और युवा, शकील अहमद गनेजी की पुलवामा के हाल गांव में विरोध के दौरान जान चली गई. बीस अन्य घायल हो गए, उनमें से कई श्रीनगर के एसएमएचएस पहुंचे. मरने वालों की संख्या अब 69 है.

इन दिनों घाटी में मन बहलाव का सबसे आसान लेकिन सबसे घिनौना काम यही रह गया है कि लोग हर दिन मरने और घायल होने वालों की गिनती में लगे रहते हैं. किसी को नहीं मालूम कि यह कब खत्म होगा. आजादी का संघर्ष कभी खत्म न होने वाला इंतजार बन गया है. कोई नहीं मानता कि वह मिलेगी, पर सभी उम्मीद करते हैं कि शायद मिलेगी.

First published: 28 August 2016, 8:19 IST
 
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