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18 फ़ीसदी मुसलमानों का वोट खींचने के सफर पर उत्तर प्रदेश निकले असदुद्दीन ओवैसी

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 21 September 2016, 9:11 IST

उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी कुनबे में मची उठा-पटक से अभी तक त्रस्त है. सोमवार को हुई बर्ख़ास्तगी और इस्तीफ़ों के बाद यह साफ़ हो गया है कि पारिवारिक गुटबाज़ी थमी नहीं है. दूसरी तरफ ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएम) के मुखिया और सांसद असदुद्दीन ओवैसी हैं जिन्होंने 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश पर अपनी निगाहें टिका दी हैं.

रविवार को वह पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बाहुल्य कैसरगंज लोकसभा क्षेत्र में अपने दल-बल के साथ पहुंचे थे. यहां उन्होंने वज़ीरगंज बाज़ार में रैली करके ठीक-ठाक भीड़ जुटाई. मुद्दा था मुसलमानों के साथ होने वाली नाइंसाफ़ी और निशाने पर वही सपा सरकार और समाजवादी पार्टी जिसे सूबे का 18 फ़ीसदी मुसलमान पिछले 24 सालों से वोट देता आ रहा है.

ओवैसी का अगला दौरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज़िला बिजनौर का पेदा गांव था जहां 16 सितंबर को तीन मुसलमानों की हत्या हो गई थी। मगर धारा 144 लगी होने के नाते उन्होंने ऐन वक़्त पर अपना प्रोग्राम उस वक़्त रद्द कर दिया जब बिजनौर प्रशासन ने उन्हें ज़िले में घुसने या कार्यक्रम करने की इजाज़त से मना कर दिया.

उत्तर प्रदेश में मुसलमान निर्णायक मतदाता हैं और अभी तक समाजवादी सरकार का सबसे अहम वोटबैंक भी. सपा गलती से भी ऐसा कोई मौका ओवैसी को नहीं देना चाहती जहां से उनकी राजनीति को ऑक्सीजन मिल सके. इसकी ताज़ा बानगी बिजनौर गोलीकांड के बाद दिखी अखिलेश सरकार की फुर्ती है.

बिजनौर प्रशासन ने ओवैसी को ज़िले में घुसने या कार्यक्रम करने की इजाज़त से मना कर दिया

बीते शुक्रवार की सुबह आठ बजे जाटों ने एक मुस्लिम परिवार पर हमला करके तीन लोगों की हत्या कर दी थी. चूंकि शुरुआत से ही यह सांप्रदायिक घृणा मामला लग रहा था तो यूपी सरकार हरकत में आ गई. मुख्यमंत्री अखिलेश ने गृह सचिव मणि प्रसाद मिश्रा और कानून व्यवस्था के एडीजी दलतीज चौधरी को फौरन हेलीक़ॉप्टर से मौके पर रवाना कर दिया. सरकार ने एक सब इंस्पेक्टर समेत दो पुलिसकर्मियों का निलंबन किया जो वारदात के वक्त मौके पर मौजूद थे. शाम होने तक पीड़ितों को 20-20 लाख रुपए बतौर मुआवज़े का ऐलान भी हो गया.

अपने तर्कों और हाज़िर जवाबी के लिए मशहूर ओवैसी ने इसके बावजूद बिजनौर जाने और सपा सरकार पर हमलावर होने की कोशिश की. पार्टी की उत्तर प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य हशमत ने कहा कि हम क़ानून में यक़ीन रखने वाले लोग हैं. हम धारा 144 तोड़कर मौके तक नहीं जाना चाहते थे. बिजनौर से लौटने के बाद हमारे सदर की एक जनसभा शामली (कैराना) में होनी थी लेकिन एसडीएम कैराना ने उसकी इजाज़त भी नहीं दी. यह हमारी समझ से परे है. अब 25 सितंबर को पूर्वी उत्तर प्रदेश के संतकबीर नगर में औवैसी की जनसभा प्रस्तावित है.

शामली ज़िले का कैराना वही कस्बा है जिसकी तुलना बीते दिनों कश्मीर से की जा रही थी. वहां से बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने एक लिस्ट जारी कर आरोप लगाया था कि मुसलमानों के डर से यहां के 346 हिंदू परिवार पलायन कर चुके हैं. लेकिन बाद में उस लिस्ट की प्रमाणिकता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे.

इस विवाद के बाद स्थानीय मुसलमानों में डर पैद हुआ था. ओवैसी काफी समय से सपा को बीजेपी के साथ अंदरुनी गठजोड़ और मुसलमानों को बीजेपी का डर दिखाकर वोट लेने वाली पार्टी कहते रहे हैं. लिहाजा मौक़ा मिलने पर कैराना में भी यह हथियार आजमाया जा सकता था.

ओवैसी उत्तर प्रदेश के हर उन जगहों पर जाने की कोशिश करते हैं जहां मुसलमान किसी ना किसी रूप में पीड़ित हैं. जाहिर है यह उनकी चुनावी रणनीति का हिस्सा है और उन्हें यह भी पता है कि अगर उन्हें उत्तर प्रदेश में पांव जमाना है तो मुस्लिम मतदाता के मन में जगह बनानी होगी.

कोई आश्चर्य नहीं कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव तक वह ऐसी जगहें तलाशकर वहां जाते रहें. पिछले साल बकरीद के मौके पर वे बिसहड़ा भी गए थे जहां गोहत्या की अफ़वाह उड़ाकर एक बुज़ुर्ग अखलाक अहमद की हत्या कर दी गई थी. इसके बाद उन्होंने आज़मगढ़ में भी रैली की कोशिश की और वहां एक गांव गोद लेने का ऐलान किया था जिसे बटला हाऊस एनकाउंटर के बाद आतंक का गढ़ कहकर बदनाम कर दिया गया है. सारी क़वायद इसलिए है ताकि यूपी में अपनी राजनीतिक ज़मीन तैयार की जा सके.

मुसलमान और दलित गठजोड़ का जो फॉर्मूला अब लोकप्रिय हो रहा है, ओवैसी इसका प्रयोग यूपी में करना चाहते हैं

इसमें कोई शक़ नहीं कि मुसलमानों का बड़ा हिस्सा अभी भी सपा के पीछे खड़ा है. इस पार्टी से नाराज़ होने वाले मुसलमानों की दूसरी पसंद बसपा है. लेकिन ओवैसी इन वोटरों में सेंध लगाने का दम जरूर रखते हैं. ओवैसी की उम्मीदों को परवाज़ उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति से भी मिल रही है. सत्ताधारी सपा के अपने शीर्ष परिवार के भीतर मची उठापटक से उसके कोर मतदाता में एक दुविधा की स्थिति पैदा हो गई है. चुनावों के ठीक पहले इस तरह की खींचतान से उसके मतदाताओं में निराशा फैली है. जाहिर है ओवैसी इस स्थिति का फायदा उठा सकते हैं.

वे जब भी उत्तर प्रदेश के दौरे पर होते हैं तो सपा के अलावा बहुजन समाज पार्टी पर हमला करने से नहीं चूकते. वह बसपा में रुझान रखने वाले मुस्लिम मतदाताओं में भी अपना आकर्षण जगाना चाहते हैं. हालांकि मायावती जैसी कुशल नेता की अपने वोटबैंक पर हमेशा पकड़ मज़बूत रही है. ओवैसी और सपा की उम्मीदों पर पानी फेरने के लिए उन्होंने पहली बार 100 से ज्यादा मुसलमानों को विधानसभा का टिकट देने का ऐलान कर दिया है. मायावती को घेरने के लिए अब इन पार्टियों को नए मुद्दे तलाशने होंगे.

इन सबके बावजूद असदुद्दीन ओवैसी हर उस पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश में खतरे की घंटी हैं जिन्हें मुसलमानों के वोट मिलते रहे हैं. वजह मुसलमान नौजवानों में उनकी बढ़ रही लोकप्रियता है. संसद में लगातार मुसलमानों के मुद्दे इसलिए उठाते हैं ताकि उनके बीच नाम और ऊंचा हो सके. एक दूसरा तथ्य असदुद्दीन ओवैसी की अपनी शख्सियत भी है. अभी तक सूबे में जिन भी नेताओं ने मुसलिम हितों की राजनीति की है, ओवैसी उनमें सबसे कुशल, पढ़े-लिखे, सधे और तार्किक मालूम पड़ते हैं. अपनी इस कला से वे बड़ी संख्या में मुस्लिम मानस को अपने पक्ष में कर सकते हैं. हालांकि इसके अपने खतरे हैं. उनके भाई पहचान की इस उग्र राजनीति के चक्कर में जेल जा चुके हैं.

मुसलमान और दलित गठजोड़ का जो फॉर्मूला अब लोकप्रिय हो रहा है, ओवैसी इसका प्रयोग महाराष्ट्र और यूपी के उपचुनाव में पहले ही कर चुके हैं. उन्होंने यूपी में बीकापुर से एक दलित को अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनाकर 11 हजार वोट हासिल किया था.

ओवैसी की राजनीति का सबसे बड़ा ख़तरा समाज का ध्रुवीकरण है क्योंकि अगर बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण का ट्रेंड दिखने लगे तो हर लिहाज़ से यह राजनीति सभी के लिए एक घाटे का सौदा होगी.

First published: 21 September 2016, 9:11 IST
 
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