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अशोक सिंघलः भाजपा को दिल्ली तक पहुंचने की राह तैयार करने वाला रणनीतिकार

अतुल चंद्रा | Updated on: 18 November 2015, 19:26 IST
QUICK PILL
  • राम जन्मभूमि आंदोलन और बाबरी विध्वंस की आधारशिला रखने वाले अशोक सिंघल आरएसएस के प्रचारक रहे. ताउम्र उनकी छवि मुस्लिम विरोधी नेता की रही.
  • काशी हिंदू विश्वविद्यालय से इंजीनियर सिंघल ने पंडित ओंकारनाथ ठाकुर से शास्त्रीय गायन की बारीकियां भी सीखी थीं. आगरा के धनाड्य परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद उन्होंने संघ प्रचारक का करियर चुना.

यूं तो अशोक सिंघल की कई पहचाने रहीं, लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तेजतर्रार प्रचारक के रूप में उन्हें सबसे ज्यादा प्रसिद्धि मिली. 17 नवंबर 2015, मंगलवार को 89 वर्ष की आयु में उन्होंने गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में आखिरी सांस ली. 

छह दिसंबर 1992 को हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सिंघल बीते 20 वर्षों से विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष थे. उन्होंने ही अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए हिंदुओं और कारसेवकों को एकजुट किया था. 

यह आजाद भारत के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था. इस घटना ने देश के सामाजिक ताने-बाने को गहरा घाव दिया.  संघ और उसके आनुषंगिक संगठन इसे देश में हिंदुत्व का 'पुनरुत्थान' की संज्ञा देते हैं.

एक इंजीनियर और गायक

ज्यादातर लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि सिंघल ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से मैटलर्जिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की थी. 

वो एक प्रशिक्षित शास्त्रीय गायक भी थे. उन्होंने प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर से संगीत की बारीकियां सीखीं थी. लेकिन वो जीवनभर एक ऐसी धुन बजाते रहे जो न तो धर्मनिरपेक्ष लोगों को पसंद आई और न ही अल्पसंख्यक समुदाय को भायी. 

15 सितंबर 1926 को आगरा में पैदा हुए सिंघल 1942 में आरएसएस के स्वयंसेवक बने. बीएचयू से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वो आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए. प्रचारक से वो प्रांत प्रचारक बने. उन्होंने उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में काम किया. 

उनके सांगठनिक कौशल और भाषण शैली से प्रभावित होकर आरएसएस ने उन्हें 1980 में विश्व हिंदू परिषद का संयुक्त महासचिव नियुक्त किया. इसके केवल चार साल बाद 1984 में वो इसके महासचिव बने और फिर बाद में कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए. 2011 तक वो इस पद पर बने रहे. इसके बाद ख़राब स्वास्थ्य के चलते उन्हें यह पद त्यागना पड़ा. 

राम जन्मभूमि आंदोलन

1984 में दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में आयोजित होने वाली पहली धर्म संसद के आयोजन में वो एक महत्वपूर्ण कड़ी थे. हिंदुत्व के उभार को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से आयोजित इस धर्मसंसद में ही अयोध्या स्थित राम जन्मस्थान को मुक्त कराने के लिए उन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन की नींव रखी.

आंदोलन के अगुवा के रूप में सिंघल का विचार था कि अयोध्या में मस्जिद से सटे स्थान पर मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास किया जाए. इस पर बड़ा विवाद हुआ. बहरहाल इसी आंदोलन ने भारतीय जनता पार्टी को पहले उत्तर प्रदेश और फिर केंद्र की सत्ता पाने में मदद की. 

सिंघल की सोच और उग्र भाषणों की वजह से ही देश के कोने-कोने से बड़ी तादाद में कारसेवक अयोध्या पहुंचने लगे. प्रस्तावित मंदिर बनाने के लिए निर्माण सामग्री भी देश के हर कोने से यहां पहुंचाई गई. अयोध्या का कारसेवकपुरम जहां मंदिर निर्माण के लिए जरूरी ईंटों और अन्य सामग्रियों का ढेर आज धूल खा रहा है, सिघंल की उस महात्वाकांक्षी योजना का प्रत्यक्ष प्रमाण है जो कभी फलीभूत न हो सकी. 

सिंघल के चलते जब वीएचपी ने राम मंदिर आंदोलन के लिए कुदाल उठाई तो फिर पूरे संगठन ने वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि को भी मुक्त कराने का नारा दिया. 

मोहभंग और मोदी "क्रांति"

रामजन्म भूमि पर मालिकाना हक और बाबरी विध्वंस का मुद्दा जैसे ही अदालत पहुंचा, मंदिर निर्माण की योजना धराशायी हो गई. इसके साथ ही वीएचपी की आम लोगों के बीच अपील भी कम हो गई.

जब भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में आई और राम मंदिर के बारे में किया गया वादा पूरा करती नहीं दिखी तो सिंघल का पार्टी से मोहभंग हो गया. 

इस बार भाजपा अप्रत्याशित बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दोबारा केंद्र में आयी तो उन्हें लगा कि अब मंदिर निर्माण कार्यक्रम को शायद कोई प्रोत्साहन मिले. 

सिंघल ने मोदी की जीत को "800 वर्षों की गुलामी का अंत" बताते हुए कहा कि 2020 तक भारत एक हिंदू राष्ट्र होगा. भाजपा की जीत को उन्होंने एक "क्रांति" की शुरुआत के रूप में देखा. हालांकि अपनी इच्छा फलीभूत होता देखने से पहले ही उनका देहांत हो गया.

जुलाई, 2015 में सिंघल ने कहा था, "यह कोई एक मामूली क्रांति नहीं है. यह केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहेगी बल्कि दुनिया के सामने एक नई विचारधारा लेकर आएगी."

वीएचपी में खालीपन

हिंदूत्वादी विचारक सिंघल को मुस्लिम विरोधी नेता के रूप में भी जाना जाता है, जिसने कभी विवादास्पद बयान जारी करने का कोई मौका नहीं खोया. 

मोदी की जीत को एक क्रांति बताने के कुछ माह पहले ही उन्होंने हिंदुओं से पांच बच्चे पैदा करने के लिए कहा, जिससे मुसलमानों की संख्या उनसे ज्यादा न हो सके. गाय के मुद्दे पर भी सिंघल एक कानून बनाकर इसके वध पर प्रतिबंध लगाना चाहते थे. 

बहुत सारे लोगों की राय में भाजपा के सत्ता में उभार का श्रेय लालकृष्ण आडवाणी को जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने बाबरी मस्जिद गिराए जाने से पहले रथयात्रा निकाली थी लेकिन किसी एक व्यक्ति को ये श्रेय दिया जा सकता है तो वो अशोक सिंघल ही होंगे.

सिंघल की मौत ने वीएचपी में एक खालीपन पैदा कर दिया है. सिंघल के उत्तराधिकारी प्रवीण तोगड़िया को इस खाली जगह को भरने में काफी मुश्किल होगी. ऐसा नहीं है कि तोगड़िया पर्याप्त उग्र नहीं हैं, लेकिन वो शायद सिंघल की तरह मौजूदा भाजपा पर भरोसा नहीं करते. 

(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं और जरूरी नहीं कि संस्थान इससे सहमत हो)

First published: 18 November 2015, 19:26 IST
 
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