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कौन लेगा वीएचपी में अशोक सिंघल की जगह?

पाणिनि आनंद | Updated on: 20 November 2015, 22:33 IST
QUICK PILL
  • वीएचपी संरक्षक अशोक सिंघल के निधन के बाद उनकी जगह लेने वालों में प्रवीण तोगड़िया और चंपतराय का नाम सबसे आगे है.
  • सूत्रों के अनुसार संघ के सह सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी और संघ प्रचारक दिनेश चंद्र भी वीएचपी शीर्ष नेतृत्व की दौड़ में शामिल हैं.

विश्व हिंदू परिषद में अशोक सिंघल का कद उनके आधिकारिक पद से काफी बड़ा था. सिंघल 1981 से वीएचपी के प्रमुख चेहरों में से एक थे. सिंघल ने 90 के दशक की शुरुआत में राम जन्मभूमि आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी.

उनके निधन पर वीएचपी की ओर से जारी शोक संदेश में कहा गया, "अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठन को ख्याति दिलाने में सबसे ज्यादा योगदान सिंघल का रहा है."

लेकिन आगे क्या?


लंबी बीमारी के बाद 17 नवंबर को 89 वर्षीय सिंघल का निधन हो गया. वीएचपी अब तक राम मंदिर आंदोलन और रामसेतु कैंपेन के जरिए काफी लोगों को अपने साथ जोड़ चुकी है.

आज ये बहुत बड़ी संस्था बन चुकी है. भारत के कई शहरों में इसकी कई संपत्तियां हैं.

सिंघल के जाने के बाद से ही ये सवाल उठने लगा है कि वीएचपी का अगला चेहरा कौन होगा?

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और इसकी सहयोगी संस्थाओं के पास इस सवाल का जवाब नहीं है.

वर्तमान में वीएचपी के कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया और अंतरराष्‍ट्रीय महासचिव चंपतराय वीएचपी शीर्ष नेतृत्व की दौड़ में सबसे आगे माने जा रहे हैं.

वीएचपी के इन दोनों प्रमुख चेहरों का संगठन के अंदर अपना-अपना गुट है. इनके अलावा संघ के सह सर कार्यवाह भैय्याजी जोशी का भी नाम इस दौड़ में शामिल हो गया है.

कुछ राजनीतिक जानकारों के अनुसार विश्व हिंदू परिषद का नेतृत्व करने के लिए संघ भैय्याजी जोशी को आगे ला सकता है.

फायरब्रांड डॉक्टर

पेशे से डॉक्टर तोगड़िया को हिंदुत्व की सेवा के लिए संगठन में लाया गया था. वह कभी संघ के प्रचारक और कार्यकर्ता नहीं रहे हैं इसलिए माना जाता है कि वो संघ की कार्यशैली को बारीकी से नहीं समझते हैं.

राम मंदिर और रामसेतु कैंपेन के दौरान तोगड़िया जाना पहचाना नाम नहीं थे. त्रिशूल दीक्षा कार्यक्रम के बाद से उन्हें लोकप्रियता मिलनी शुरू हुई.  आज उनकी छवि कट्टरपंथी हिंदुत्वदी नेता के रूप में है.

दूसरे हिंदुत्ववादी नेता संघ और वीएचपी की लाइन पर चलते हैं लेकिन तोगड़िया अपने तरीके से काम करते हैं. उन्हें सुरेंद्र जैन और स्वामी विज्ञानानंद का समर्थन हासिल है.

जब केंद्र में बीजेपी की सरकार आयी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो तोगड़िया तेजी से उभरे. इस महत्वाकांक्षी डॉक्टर को उस दौर में खूब प्रचार मिला. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि तोगड़िया उस दौर में गुजरात का मुख्यमंत्री बनने का भी सपना भी देखते थे. हालांकि मोदी के साथ उनकी स्पर्धा में वे बहुत पीछे छूट गए.

नरेंद्र मोदी का उभरना उनके हित में नहीं रहा. अन्य प्रतिद्वंद्वियों की तरह मोदी ने तोगड़िया को भी किनारे कर दिया

केंद्र में पीएम मोदी के आने के बाद तोगड़िया पहले की तरह नहीं दिख रहे हैं. तोगड़िया की स्टाइल और उनके विचार सिंघल गुट से अलग थे. जब पार्टी मोदी को दिल्ली में लाने के लिए इच्छुक नहीं थी तब सिंघल ने नरेंद्र मोदी का समर्थन किया और उनकी तारीफ की थी. सिंघल के विपरीत, मोदी की नज़र में तोगड़िया अब भी विरोधी धड़े के हैं.

मोदी से रिश्ते खराब होने के बावजूद तोगड़िया उनके साथ काम कर सकते हैं. संघ के कुछ संगठन मोदी का समर्थन नहीं करते हैं. पहले से ही बीजेपी अध्यक्ष के रुप में 'खराब प्रदर्शन' करने वाले अमित शाह को लेकर भी मोदी चिंतित हैं.

अगर संघ मोदी की पसंद को दरकिनार करता है तो वीएचपी का नेतृत्व करने के लिए तोगड़िया पहली पसंद हो सकते हैं.

संघ की पृष्ठभूमि से ना आना और महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व का होना ये दो बातें तोगड़िया के खिलाफ जाती हैं. हालांकि, संघ में उनके मित्र भी हैं. वीएचपी का चेहरा बनने पर तोगड़िया को अपनी महत्वाकांक्षा को दबाते हुए संघ के एजेंडे को आगे रखना होगा.

चंपतराय की दावेदारी

वीएचपी के दूसरे खेमे का नेतृत्व चंपतराय और संगठन के केंद्रीय सचिव राजेंद्र सिंह पंकज के हाथों में हैं. पंकज संगठन में संत समाज का काम देखते हैं. तोगड़िया के विपरीत चंपतराय संघ से आते हैं और सिंघल के करीबी रहे हैं. इस साल अगस्त-सितंबर में दिवंगत सिंघल के ब्रिटेन, नीदरलैंड और अमेरिका के दौरे में चंपतराय उनके साथ थे.

सिंघल के करीबी सहयोगी के रूप में चंपतराय संगठन में सक्रिय रहे है और उन्हें कुछ महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिली हुई थीं. वो विहिप संरक्षक सिंघल से सारे कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करते थे. साथ ही, सिंघल के विदेशी दौरों पर भी चंपतराय हमेशा उनके साथ रहते थे.

चंपतराय अभी संगठन में महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं और उन्हें अयोध्या स्थित कार्यालय की जिम्मेदारी मिली हुई है.

इसी कार्यालय से मंदिर आंदोलन से जुड़े सारे कामकाज होते हैं. संगठन के अंदर के कुछ लोगों का मानना है कि वास्तव में चंपतराय सिंघल कैंप की पहली पसंद हैं.

लो-प्रोफाइल रहने वाले चंपतराय मीडिया की सुर्खियों में कम ही रहते हैं. राम मंदिर आंदोलन के अलावा उनके पास वनवासी कल्याण (आदिवासियों के लिए काम करने वाली संस्था) और गोरक्षा की जिम्मेदारी भी है. माना जाता है कि  चंपतराय को संगठन की बेहतर समझ है.

छुपा रुस्तम

माना जाता है कि संघ विहिप समेत तमाम हिंदुत्ववादी संगठनों की गतिविधियों पर हमेशा नजर रखता है. बीमारी और बढ़ती उम्र की वजह से जब अशोक सिंघल की सक्रियता कम होने लगी तो उत्तर भारत के प्रचारक दिनेश चंद्र को कुछ साल पहले वीएचपी में भेजा गया. दिनेश चंद्र वीएचपी के महासचिव हैं. उन्हें भी इस पद की दौड़ में शामिल माना जा रहा है.

वीएचपी में नियंत्रण बनाए रखने के लिए और दोनों गुटों में तालमेल बनाने के लिए संघ किसी वरिष्ठ नेता का भी चयन कर सकता है. इसी कारण संघ के सर कार्यवाह भैय्याजी जोशी का नाम सामने आ रहा है. संघ में उनका कार्यकाल अगले मार्च को समाप्त हो रहा है.

हालांकि संघ के कुछ सूत्रों ने जोशी के इस दौड़ में होने से इनकार किया है.

First published: 20 November 2015, 22:33 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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