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'मीडिया को अपने भीतर मौजूद दुश्मनों को पहचानना होगा'

आशुतोष | Updated on: 9 March 2016, 10:45 IST
QUICK PILL
(एक निजी टीवी चैनल के पूर्व संपादक रहे आशुतोष आम आदमी पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता हैं. इस आलेख में वे जेएनयू और कन्हैया कुमार के देशद्रोह प्रकरण और इससे जुड़ी टेलीविजन कवरेज पर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं)

दार्शनिक जाॅन स्टुअर्ट मिल ने एक बार कहा था, ‘‘किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को इतना सीमित किया जाना चाहिये कि वह स्वयं को दूसरे लोगों के लिये रुकावट न बनने दे.’’

मिल स्वयं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहुत बड़े हिमायती तो थे लेकिन साथ ही वे स्वतंत्रता से संबंधित खतरों से भी भली-भांति परिचित थे.

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बीते कुछ हफ्तों के दौरान हम एक देश के रूप में स्वतंत्रता के नाम पर न केवल ‘पागलपन’ बल्कि उससे भी कुछ अधिक के साक्षी बने हैं. इस दौरान हुए घटनाक्रम के बाद प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर बहुत गंभीर सवाल उठाने का वक्त आ गया है.

स्वतंत्रता का दुरुपयोग

जेएनयू मामले पर दिल्ली सरकार की रिपोर्ट अब सार्वजनिक हो चुकी है. यह रिपोर्ट इस बात को स्पष्ट तौर स्थापित करती है कि कैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया गया और अगर मैं अधिक खुलकर कहूं तो, किस प्रकार से कन्हैया कुमार के मामले को कुछ चुनिंदा टीवी एंकरों और संपादकों ने अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिये इस्तेमाल किया.

इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होनेे से पहले मुझे दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ लंबी बातचीत का मौका मिला. मैंने उनसे सीधे-सीधे सिर्फ एक ही बात पूछी, ‘‘क्या आपके पास कन्हैया के खिलाफ कोई ठोस सबूत है?’’ वे कुछ समय तक मेरा मुंह देखते रहे और फिर अपना सिर ना में हिलाया. मैंने उनसे पूछा, ‘‘फिर आपने बिना समय गंवाए क्यों उन्हें गिरफ्तार किया और अब जमानत का विरोध किस बिना पर कर रहे हैं?’’ उन्होंने जवाब दिया, ‘‘आप सबकुछ जानते हैं. क्या मुझे कुछ कहने की जरूरत है?’’

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सच कहूं तो उस अधिकारी की लाचारी देखकर मैं बहुत ही निराश हुआ. मैंने कई माध्यम से इस मुद्दे को उठाया लेकिन हर बार मेरी आवाज एक छदृम राष्ट्रवाद के शोर में दबकर रह गई. लेकिन अब जेएनयू पर दिल्ली सरकार की रिपोर्ट आने के बाद मेरा दावा और भी अधिक पुष्ट हो गया है.

यह रिपोर्ट साफ तौर पर साबित करती है कि कन्हैया के भारत-विरोधी नारे लगाने का कोई वीडियो सबूत मौजूद नहीं है. पुलिस के दावे की पुष्टि करने वाले किसी भी स्वतंत्र गवाह का न मिलना; नारेबाजी को लेकर जेएनयू समिति के सामने पेश होने वाले तीनों गार्डों का डीएम की पूछताछ के दौरान निरुत्तर हो जाना और यहां तक कि उमर खालिद को पहचानने में विफल रहना और और यह स्वीकार करना कि उन्होंने किसी भी मौके पर कन्हैया कुमार को देशविरोधी नारे लगाते नहीं देखा. जाहिर है कि उन्हें पहले से ही सिखाया-पढ़ाया गया था.

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इसके अलावा यह रिपोर्ट इस बात को भी साबित करती है कि कुछ टीवी चैनलों द्वारा दिखाई गई वीडियो फुटेज में कहीं भी ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे नहीं लगाए गए थे जिसका दावा बीजेपी और आरएसएस के कई नेताओं ने विभिन्न टीवी कार्यक्रमों में किया था.

इसके अलावा यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि जेएनयू के दृश्यों को सबसे पहले प्रसारित करने वाले टीवी चैनल ने सहयोग न करते हुए जांच के लिये वीडियो फुटेज देने से इंकार कर दिया. यह वही चैनल है जिसे एबीवीपी ने बिना जेएनयू प्रशासन की अनुमति के चोरी-छिपे परिसर में प्रवेश करवाया था और जिसके एक प्रोड्यूसर ने विरोध स्वरूप यह कहते हुए नौकरी से इस्तीफा दे दिया कि चैनल ने जानबूझकर मूल वीडियो में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे डाले हैं.

चैनलों का अक्षम्य कृत्य

मैं संघ, भाजपा और एबीवीपी की प्रतिक्रिया के मायने अच्छी तरह से समझ सता हूं, क्योंकि उनके पास अपना एक एजेंडा और राजनीतिक मकसद है. लेकिन इस मामले को लेकर कुछ टीवी चैनलों की जो प्रतिक्रिया रही वह मेरी समझ से बिल्कुल परे है.

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मैं कथित रूप से इन नारों के लगाए जाते वक्त जेएनयू में टीवी चैनलों के कर्मचारियों की वहां मौजूदगी पर सवाल नहीं उठा रहा हूं. खबरों का पीछा करने वाले एक व्यक्ति के तौर पर यह एक संवाददाता का काम है कि वह हर उस स्थान पर मौजूद रहे जहां उसे संभावित खबर का अहसास हो. लेकिन एक संवाददाता या फिर एक संपादक से यह उम्मीद बिल्कुल भी नहीं की जा सकती कि वह वीडियो के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ करे, जैसा कि विरोध स्वरूप इस्तीफा देने वाले प्रोड्यूसर ने लगाया है.

अगर वास्तव में ऐसा किया गया है तो यह माफी के योग्य नहीं है और ऐसे चैनल के अलावा उसके संपादक और मालिक के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिये. क्योंकि ऐसा करना कानूनन गुनाह है.

इसके अलावा टीवी चैनलों ने बिना प्रमाणिकता की जांच किए ही कुछ वीडियो को प्रसारित किया. समाचार चैनलों की स्वनियामक संस्था, समाचार प्रसारण मानक प्राधिकरण के दिशानिर्देशों के अनुसार, ‘‘कोई भी चैनल बिना किसी वीडियो या आडियो की सत्यता को प्रमाणित किये उसका प्रसारण नहीं कर सकता.’’

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मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है कि 2014 के लोकसभा चुनावों से कुछ समय पहले दो बेहद ईमानदार पत्रकारों ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके ‘स्नूपगेट’ से संबंधित कुछ टेप रिलीज किये थे लेकिन टीवी चैनलों ने उन्हें प्रसारित करने से इंकार कर दिया. टीवी संपादकों का तर्क था कि उन टेपों की प्रमाणिकता को सिद्ध नहीं किया जा सका था.

यह जानते हुए कि इन टेपों की प्रमाणिकता की जांच सीबीआई कर चुकी है और ये कोर्ट प्राॅपर्टी हैं इसके बावजूद प्रमाणिकता को बहाना बनाया गया. चाहे किसी को मेरी बात बुरी लगे लेकिन मैं एक बात जरूर पूछना चाहूंगा कि क्या स्नूपगेट की टेप सिर्फ इसलिये प्रसारित नहीं की गईं क्योंकि वे नरेंद्र मोदी से संबंधित थी. ऐसी ही सावधानियों का पालन जेएनयू मामले में क्यों नहीं किया गया. क्या ऐसा जानबूझकर किया गया था या फिर यह सिर्फ एक गलती थी.

यह सिर्फ एक गलती नहीं है

मैंने आठ वर्षों तक एक टीवी चैनल का नेतृत्व किया. अपने अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि यह सिर्फ गलती नहीं है जिसके लिये न्यूजरूम के फिल्टरों को दोषी ठहराया जा सकता हो. ऐसा एक बार तो हो सकता है लेकिन सात बार नहीं.

कुल मिलाकर विभिन्न चैनलों पर सात टेपों का प्रसारण किया गया और इन टेपों को कभी सत्यापित करने का प्रयास भी नहीं किया गया. इन चैनलों ने इन टेपों को ठोस ‘सबूत’ के रूप में प्रस्तुत किया और इनके माध्यम से लगभग सबकी ‘देशभक्ति’ जांचने का प्रयास किया. फुटेज के लगभग हर हिस्से के माध्यम से कन्हैया को बदनाम करने का पूरा प्रयास किया गया. उसे खुलकर ‘गद्दार’ और ‘देशद्रोही’ तक कहा गया.

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इसका विरोध करने या कोई तार्किक सवाल उठाने वाले हर व्यक्ति को राष्ट्रवाद के रंग में रंगे एंकरों ने धकियाने का पूरा प्रयास किया. यह टीवी हिस्टीरिया का ही नतीजा था जिसके चलते मीडियाकर्मियों और अन्य लोगों पर पटियाला हाउस कोर्ट और उसके बाहर भी हमला किया गया.

आखिरकार दो चैनलों को इन टेपों की प्रमाणिकता जांचने का समय मिला. आखिरकार यह सामने आया कि इन टेपों के साथ छेड़छाड़ की गई है बाद में जिसकी पुष्टि हैदराबाद की फोरेंसिक लैब ने भी की. विशेषज्ञों का कहना था कि कुल सात टेपों में से दो के साथ छेड़छाड़ की गई थी और एक का संपादन किया गया था.

क्या अब मैं इन समाचार चैनलों के संपादकों और मालिकों को छेड़छाड़ किये हुए वीडियो का प्रसारण करने के लिये पूरी दुनिया से माफी मांगने के लिये कह सकता हूं?

खबरों के बाजार में अगर कोई अखबार कोई गलत खबर प्रकाशित करता है तो परंपरा के अनुसार उसे उसका शुद्धिपत्र या खंडन प्रकाशित करना पड़ता है. जिस दिन पहली बार एक चैनल ने दिखाया कि प्रसारित की जा रही वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई है मैंने ट्वीट करके इन चैनलों को खंडन प्रसारित करने का अनुरोध करते हुए दर्शकों से माफी मांगने का अनुरोध किया लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हुआ है.

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इसके बाद मैं इस निष्कर्ष पर क्यों न पहुंचूं कि कुछ टीवी एंकर और संपादक मौजूदा सत्ताधारी प्रतिष्ठान के साथ मिले हुए हैं और जो कुछ उन्होंने किया वह कोई गलती नहीं था बल्कि जानबूझकर किया गया था.

स्वनियमक सो रहे हैं

जिस दिन कन्हैया को दिल्ली हाई कोर्ट से जमानत मिली इनमें से एक चैनल ने तो इस खबर को दिखाने की जहमत ही नहीं उठाई जबकि दूसरे चैनल इस खबर को ‘‘सबसे बड़ी खबर’’ के रूप में प्रसारित कर रहे थे.

इससे भी अधिक मैं इस मुद्दे पर ब्राॅडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन और एनबीएसए की खामोशी को लेकर आश्चर्यचकित था.

बीते समय में जब मैं एनबीए का एक सदस्य था तब इसके द्वारा आंतरिक ईमेल भेजे जाते थे, गलती करने वाले संपादकों को किनारे रखा जाता था या फिर उनपर प्रतिबंध लगाए जाते थे लेकिन तब ऐसा कुछ भी नहीं होता था जो आज हो रहा है.

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इसके अलावा जब जस्टिस जेएस वर्मा एनबीएसए के अध्यक्ष थे तब यह संस्था बेहद सक्रिय होने के साथ सख्त कार्रवाई के लिये भी जानी जाती थी लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं दिखा.

जेएनयू प्रकरण ने प्रेस की स्वतंत्रता और इसकी सीमाओं पर बेहद गंभीर सवाल उठाए हैं. इस प्रकरण के चलते इस पूरे माध्यम की साख पर गहरी चोट लगी है. कुछ टीवी एंकरों और संपादकों ने अपने आॅन-एयर आचरण से समाचार चैनलों की छवि को पूरी तरह से धूमिल कर दिया है.

अब आत्मनिरीक्षण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है. अपने भीतर के दुश्मनों को पहचानना होगा और ऐसे व्यक्तियों और संस्थाओं को अलग करने का प्रयास करना होगा. खोई साख को बहाल करने और भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने के लिये और कोई रास्ता नहीं है.

First published: 9 March 2016, 10:45 IST
 
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