Home » इंडिया » Catch Hindi: Ashutosh piece on Rajdeep tweet on Savarkar birth anniversary
 

'राजदीप, हम सावरकर के मामले में बीच का रास्ता नहीं चुन सकते'

आशुतोष | Updated on: 30 May 2016, 13:34 IST
(कैच)

मेरे एक प्रिय मित्र राजदीप सरदेसाई ने ट्विटर पर लिखा है, ‘‘वीर सावरकरः एक विवादास्पद व्यक्तित्व लेकिन एक देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी. उनकी जयंती पर उन्हें नमन.’’

मैं राजदीप को किसी भी स्थिति में दक्षिणपंथी, या फिर सांप्रदायिक या फिर आरएसएस या बीजेपी का पिछलग्गू नहीं कह सकता. वे एक खुली सोच वाले ऐसे पत्रकार हैं जो शब्दों का हेरफेर नहीं करते हैं.

लेकिन मुझे पता है कि उनके ये शब्द युवाओं को दिग्भ्रमित करते हुए आरएसएस के स्वयंसेवकों के कानों में शहद घोलने का काम कर रहे होंगे. सावरकर न तो ‘‘वीर’’ थे जैसा उन्हें आरएसएस और हिंदू महासभा द्वारा प्रस्तुत किया जाता है और न ही वे शास्त्रीय मायनों में देशभक्त थे. और अगर उनकी तुलना भगत सिंह से की जाए तो वे उनके सामने कहीं नहीं ठहरते हैं.

मुझे यह बात अच्छी तरह से पता है कि बीजेपी और आरएसएस उन्हें वैचारिक संरक्षक के रूप में देखते हैं और वे उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े सितारों में से एक के रूप में प्रतिस्थापित करना चाहते हैं.

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि गिरफ्तारी से पहले उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था लेकिन एक बार गिरफ्तारी के बाद जब उन्हें कालापानी भेज दिया गया तो वे एक बदले हुए इंसान बन गए.

इतिहास की समग्र दृष्टि

मैं ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का आंकलन और विश्लेषण टुकड़ों में करना पसंद नहीं करता. हर किसी को समग्रता से देखा जाना चाहिये और उस संदर्भ में वे एक देशभक्त या राष्ट्रवादी के पैमाने पर कहीं से भी खरे नहीं उतरते.

वीडी सावरकर को 1911 में अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा गया था. चूंकि वे अंग्रेज सरकार की जेल के कठोर वातावरण को सहने में नाकाम रहे और उन्होंने वहां पहुंचते ही स्थितियों से हार मानते हुए क्षमादान मांगने वाला पत्र लिखा.

आजादी की लड़ाई में शामिल रहे शीर्ष नेताओं में वे शायद इकलौते ऐसे नेता थे जिसने अंग्रेजों  को माफी मांगने वाले लंबे पत्र लिखे और क्षमाप्रार्थना करते हुए वायदा किया कि अगर उन्हें जेल से रिहा किया जाता है तो वे भविष्य में कभी भी ब्रितानी राज-विरोधी गतिविधियों का हिस्सा नहीं बनेंगे.

1924 में जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने अपनी बात पूरी की और स्वयं को अलग रखते हुए स्वतंत्रता संग्राम से दूर ही रहे.

1913 के एक ऐसे ही पत्र में वे लिखते हैं, ‘‘आखिर में मैं आपका शुक्रगुजार हूं कि अपने 1911 में मेरे द्वारा भेजे गए क्षमायाचना के पत्र पर विचार किया....इसके फलस्वरूप अगर सरकार बड़ा हृदय और दया प्रदर्शित करते हुए मुझे रिहा कर देती है तो मैं हर हाल में अंग्रेज सरकार का विश्वासपात्र बनकर रहूंगा .... मैं सरकार की मर्जी के हिसाब से उसकी सेवा करने को तैयार हूं.’’ 

भगत सिंह से तुलना

जब भगत सिंह को मौत के घाट उतारा गया वे सिर्फ 23 वर्ष के थे और उन्होंने किसी भी तरह की क्षमादान की याचना नहीं की.

जब उनके पिता ने विशेष न्यायाधिकरण में क्षमादान की याचिका दाखिल की तो वे बहुत नाराज हुए. उन्होंने अपने पिता को एक बेहद कड़ा पत्र लिखा.

उन्होंने लिखा, ‘‘एक ऐसे समय में जब हर कोई किसी न किसी प्रकार के इम्तिहान से गुजर रहा है आप बहुत बुरी तरह से विफल रहे हैं..... मुझे आपके द्वारा उठाये गए कदम से नफरत है. मैं अब भी देश के कानून के समक्ष अपना बचाव नहीं करूंगा.’’

लाहौर जेल से पंजाब के गवर्नर को लिखी अपनी अंतिम याचिका में उन्होंने सावरकर के उलट लिखा, ‘‘हम यह सामने लाना चाहते हैं कि अदालत के फैसले के अनुसार हमने सत्ता के खिलाफ युद्ध छेड़ा और इस हिसाब से हम युद्धबंदी हुए. और हम मांग करते हैं कि हमारे साथ युद्धबंदियों जैसा सुलूक किया जाए और हमें फांसी देने के बजाय गोली मारी जाए.’’

एक सच्चे देशभक्त की तरह भगत सिंह ने अंग्रेजों से माफी मांगने से मना कर दिया. वास्तव में उनकी इच्छा थी कि एक फायरिंग दस्ता उन्हें और उनके दो दोस्तों की जान ले.

जबकि दूसरी तरफ सावरकर ने आजादी का सौदा किया और आखिर तक अंग्रेजों के एक सहयोगी बनकर रहे. अब इनमें से किसे देशभक्त कहा जाना चाहिये, हंसते हुए देश के लिये जान देने वाले भगत सिंह या फिर दुनियावी सुख के लिये अपने देशवासियों को धोखा देने वाले सावरकर?

सावरकर को देशभक्त कहकर पुकारना भगत सिंह की शहादत का अपमान है.

गांधी को सम्मान के साथ

गांधीजी और भगत सिंह के बीच वैचारिक मतभेद थे. गांधीजी हिंसा के विरोधी थे और उन्होंने अपने पूरे जीवन अहिंसा का पालन किया था जबकि भगत सिंह सशस्त्र क्रांति में भरोसा करते थे और वे भारतीय सरजमीन पर रूसी क्रांति को दोहराना चाहते थे.

वे लेनिन से प्रेरित थे. भगत सिंह की तरह सावरकर भी राजनीतिक औजार के रूप में हिंसा की वकालत करते थे. भगत सिंह कहते थे कि गांधी जी यह मानते हैं कि असहयोग आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर लोगों का मिला सहयोग अहिंसा का परिणाम था, जो बिल्कुल गलत है.

लोगों के बीच हुआ जनजागरण सीधी कार्रवाई का परिणाम था. लेकिन भगत सिंह हमेशा सावरकर के उलट गांधीजी का सम्मान करते थे. सावरकर का मानना था कि गांधीजी की अहिंसा ने हिंदू समाज को कमजोर किया है. गांधीजी की हत्या के बाद उन्हें बापू को मारने के षडयंत्र में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया था.

सावरकर के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में हिंदू महासभा के एक कट्टरपंथी धड़े ने यह साजिश (गांधी की हत्या) रचीः पटेल

तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल, जिन्हें आरएसएस एक हिंदू प्रतीक के रूप में देखती आई है, ने गांधीजी की हत्या के बाद 27 फरवरी 1948 को जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखा था (सरदार पटेल्स सिलेक्टिड काॅरसपोंडेस, 1045-50, खंड 2, पृष्ठ 283 में निर्दिष्ट).

पटेल ने लिखा, ‘‘सावरकर के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में हिंदू महासभा के एक कट्टरपंथी धड़े ने यह साजिश रची और उसे अंजाम दिया. इस षडयंत्र में कुल 10 लोग शामिल थे और यह भी सच है कि उनकी (गांधीजी) की हत्या का, उनके विचारों से विरोध रचाने वाली, हिंदू महासभा और आरएसएस ने स्वागत भी किया था.’’

गांधीजी की हत्या के बाद आठ लोगों पर हत्या, हत्या करने की साजिश और आर्म्स एंड एक्सप्लोसिव्स सब्सटैंस एक्ट में नामजद किया गया जिनमें से सावरकर भी थे.यह भी सत्य है कि वास्तव में 10 फरवरी 1949 को उन्हें निचली अदालत द्वारा बरी कर दिया गया लेकिन ऐसा सिर्फ तकनीकी आधार पर हुआ था - वह भी सिर्फ एक दूसरे स्वतंत्र सबूत और गवाह की कमी के चलते.

इस मामले के एक आरोपी और बाद में सरकारी गवाह बन गए दिगंबर बागडे ने उन्हें भी एक षड़यंत्रकारी के रूप में पहचाना था लेकिन इस आरोप की कानूनी पुष्टि के लिये एक अन्य स्वतंत्र गवाह की आवश्यकता थी. एक ऐसे स्वतंत्र गवाह की कमी का फायदा सावरकर को मिला.

आखिर, कौन है सच्चा देशभक्त?

अब मैं एक सवाल पूछना चाहता हूं. आखिर एक व्यक्ति जिसे गांधीजी की हत्या के मामले में आरोपी बनाया गया हो और इस षड़यंत्र में जिसकी भागीदारी को लेकर अभी भी व्यापक संदेह हो उसे कैसे एक सच्चा देशभक्त कहा जा सकता है?

आखिर कैसे एक ऐसा व्यक्ति जिसने अंग्रेजों से क्षमादान की याचना की हो और एक ऐसे समय में जब सारा देश मातृभूमि के लिये अपना सर्वस्व बलिदान कर रहे हों ऐसे में अंग्रेजों का सहयोगी बनने वाले व्यक्ति को कैसे देशभक्त कहा जा सकता है?

दुर्भाग्य से आरएसएस/बीजेपी उनमें कुछ और कारणों के चलते देशभक्ति के गुण देख रहे हैं. ऐसा सिर्फ इसलिये है क्योंकि आरएसएस सावरकर और 1923 में प्रकाशित हुई उनकी किताब हिंदुत्व- हू इज हिंदू? से वैचारिक रूप से प्रेरित है.

सावरकर और जिन्ना, दोनों ही दो-राष्ट्र के सिद्धांत में विश्वास करने वाले थे और दोनों का ही मानना था कि हिंदु और मुसलमान दोनों ही अलग-अलग देशों से आते हैं और इसलिये ये दोनों एक साथ नहीं रह सकते.

सावरकर और जिन्ना दोनों ही का मानना था कि हिंदूऔर मुसलमान साथ नहीं रह सकते

इसके अलावा आरएसएस इस एक और सिद्धांत का भी पालन करती है. उसके दूसरे प्रमुख गोलवलकर ने कहा था, ‘‘भारत में रहने वाले विदेशियों को या तो हिंदू संस्कृति और भाषा को अपना लेना चाहिये..... या फिर उन्हें एक विस्तृत हिंदु राष्ट्र में रहने के लिये स्वयं को तैयार कर लेना चाहिये, वह भी बिना कुछ मांगे और बिना किसी अपेक्षा के.’’ 

राजदीप और उनके जैसे उदारवादियों को यह समझना ही होगा कि इस समय इतिहास और सावरकर जैसे व्यक्तित्वों को बदलने का प्रयास किया जा रहा है और उग्र हिंदू समूह उदार वाम दलों के वैचारिक वर्चस्व को तोड़कर एक ऐसे समाज का निर्माण करने का प्रयास किया जा रहा है जहां सिर्फ एक ही प्रकार की विचारधारा को पनपने दिया जाए और विरोध करने वालों को कूड़े के डिब्बे में फेंक दिया जाए.

यह भारत की विविधता से परिपूर्ण संस्कृति को समाप्त कर देने का प्रयास है. यह एक बड़ी लड़ाई है जहां बीच का रास्ता लेने की कोई गुंजाइश नहीं है. मुझे उम्मीद है कि मेरे दोस्त इस सच को समझेंगे.

(लेखक आम आदमी पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता हैं. प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार हैं. संस्थान की इनसे सहमति आवश्यक नहीं है.)

First published: 30 May 2016, 13:34 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी