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बांग्ला मुसलमान और अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर होगा असम चुनाव

भार्गब सर्मा | Updated on: 25 March 2016, 8:21 IST
QUICK PILL
  • असम विधाानसभा चुनाव में बांग्लादेश से आकर राज्य में रह रहे लोगों की बड़ी संख्या सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है.
  • पिछले साल सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बनाए गए उपामन्यु हजारिका आयोग ने अवैध रूप से राज्य में रह रहे लोगों की संख्या में हो रही बढ़ोतरी को लेकर केंद्र और राज्य सरकार दोनों की आलोचना की थी.
  • रिपोर्ट में इंद्रजीत बरुआ का जिक्र किया गया है जो असम आंदोलन के समय से अवैध घुसपैठ का अध्ययन कर रहे हैं. उनके हवाले से कहा गया है अगर इस घुसपैठ को नहीं रोका गया तो 2047 तक असम की मूल आबादी अल्पसंख्यक हो जाएगी.

ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोके्रटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के महासचिव अमीनुल इस्लाम ने इस महीने की शुरुआत में असम के गोलपारा जिले की एक रैली में कहा, 'हम सब जानते हैं कि रोहिंग्या मुसलमानों के साथ क्या हुआ. यह हमारे साथ भी हो सकता है. हम जैसे लाखों लोगों से मताधिकार छीनने की साजिश की जा रही है. अगर हम साथ नहीं आए तो हमारी नागरिकता चली जाएगी.'

इस्लाम का बयान असम में बांग्लादेश से होने वाले अवैध घुसपैठ के खिलाफ बीजेपी के आक्रामक अभियान के बाद आया है. पिछले महीने हेमंत बिस्वा शर्मा ने इंडियान एक्सप्रेस से बातचीत में कहा था, 'असम में लड़ाई उन 34 सीटों को लेकर है जहां बांग्लादेशी से आए लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है. हालांकि अब यह लोग भारत के नागरिक बन चुके हैं.'

शर्मा ने कहा, '126 सीटों में से हमें 92 सीटों पर कड़ी मेहनत करनी है ताकि हम अपनी पहचान बनाए रख सके. हमारे पास यह आखिरी मौका है. हम बांग्लादेशी लोगों को हमारी जमीन और राजनीतिक जगह में दखल बनाने नहीं देंगे. इस चुनाव में बांग्लादेश से आए लोग अपना मुख्यमंत्री चाहते हैं.'

अजमल पर साधा निशाना

शर्मा ने बदरुद्दीन अजमल पर भी बांग्लादेशी मुसलमान होने का आरोप लगाया. अजमल एआईयूडीएफ के प्रमुख है. बीजेपी ने हाल के महीनों में अवैध घुसपैठ को लेकर कांग्रेस और एआईयूडीएफ पर जबरदस्त तरीके से निशाना साधा है.

असम समझौते के मुताबिक 1971 के पहले जो लोग बांग्लादेश से भारत आ गए उन्हें भारतीय नागरिकाता का अधिकार है

असम में 4 और 11 अप्रैल को दो चरणों मे विधानसभा के चुनाव होने हैं. अवैध घुसपैठियों को लेकर विभिन्न दलों का अलग-अलग रुख रहा है. इससे आने वाले दिनों में इस मुद्दे को लेकर खतरनाक प्रभाव देखने को मिलेगा.

कौन हैं अवैध घुसपैठिए?

असम समझौते के मुताबिक 1971 के पहले जो लोग बांग्लादेश से भारत आ गए उन्हें भारतीय नागरिकाता का अधिकार है. हालांकि कई नस्ली समूह और राजनीतिक दल इस प्रावधान को विवादित बताते रहे हैं. इसमें बीजेपी और एजीपी शामिल हैं. उनका कहना है कि नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस को 1952 के मतदाता सूची के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए.

बीजेपी ने कहा है कि अगर वह सत्ता में आती है तो वह अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने के साथ-साथ एनसीआर को भी अपडेट करेंगे. हालांकि आलोचकों का कहना है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजना असंभव है.  पार्टी को हालांकि बांग्लादेश से आए हिंदू लोगों को लेकर समस्या नहीं है जबकि इनमें से अधिकांश  1971 के बाद भारत आए थे.

2014 के आम चुनाव के दौरान बीजेपी ने बांग्लादेश से आए हिंदुओं को शरण देने का वादा किया था. पार्टी के इस फैसले से असम गण परिषद और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन बिदक गई थी.

वहीं कांग्रेस दूसरी तरफ एनआरसी को 1971 के मतदाता सूची के आधार पर अपडेट करना चाहती है. मुख्यमंत्री तरुण गगोई ने हाल ही 1985 से 2004 की मतदाता सूची को अतिरिक्त दस्तावेज के तौर पर शामिल किए जाने की अपील की थी.

1971 के बाद बांग्लादेश से अवैध तरीके से आए लोगों की संख्या के बारे में ठीक-ठाक अनुमान नहीं लगाया जा सकता लेकिन एक अनुमान के मुताबिक इनकी संख्या 3 से 20 लाख के बीच है.

उपामन्यु हजारिका आयोग

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बनाए गए उपामन्यु हजारिका आयोग ने अवैध रूप से राज्य में रह रहे लोगों की संख्या में हो रही बढ़ोतरी को लेकर केंद्र और राज्य सरकार दोनों की आलोचना की थी.

रिपोर्ट में इंद्रजीत बरुआ का जिक्र किया गया है जो असम आंदोलन के समय से अवैध घुसपैठ का अध्ययन कर रहे हैं. उनके हवाले से कहा गया है अगर इस घुसपैठ को नहीं रोका गया तो 2047 तक असम की मूल आबादी अल्पसंख्यक हो जाएगी.

असम में बंगाली मुस्लिमों की खराब स्थिति

बंगाली मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और भेदभाव की शिकार है. 1983 में मध्य असम के नेली इलाके में 2,000 से अधिक बंगाली मुसलमानों को मार दिया गया था. यह हत्या असम आंदोलन के दौरान हुई थी.

बीजेपी और एजीपी दोनों ही कांग्रेस पर भारत में अवैध रूप से आकर बसे लोगों को भारत में बसाने का आरोप लगाते रहे हैं

इसके अलावा कुछ सालों से बोडोलैंड क्षेत्र में भी मुसलमानों पर हमले हुए हैं. 2012 में कई जिलों में हुए दंगों के दौरान 4,00,000 से अधिक मुसलमानों को विस्थापित होना पड़ा.

प्रतिबंधित संगठन एनडीएफबी (सांगबिजित) ने हाल के वर्षों में बोडोलैंड में बंगाली मुसलमानों को निशाना बनाया है. 2014 में विद्रोहियों ने कथित तौर पर एनडीएफबी के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान नहीं किए जाने के कारण 33 मुसलमानों को गोली मार दी थी.

बीजेपी और एजीपी दोनों ही कांग्रेस पर भारत में अवैध रूप से आकर बसे लोगों को भारत में बसाने का आरोप लगाते रहे हैं वहीं कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी मूल निवासियों में डर पैदा कर रही है.

क्या अजमल को फायदा होगा?

एआईयूडीएफ पिछले एक दशक के दौरान स्थानीय मतदाताओं में बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. पार्टी के पास विधानसभा की 18 जबकि लोकसभा की 3 सीटें हैं. आने वाले चुनावों में इस पार्टी के विधायकों की संख्या में बढ़ोतरी होने की संभावना है.

पार्टी के उभार से कांग्रेस को नुकसान हुआ है. अधिकांश बंगाली मुसलमान जो कभी कांग्रेस को वोट देते थे वह अब एआईयूडीएफ के पाले में जा चुके हैं. कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि चुनाव बाद कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच गठबंधन हो सकता है. 

हालांकि अजमल ने 17 मार्च को बयान जारी कर दोनों दलों के साथ चुनाव लड़ने की पुष्टि कर दी. अजमल ने इससे पहले कहा था कि चुनाव में उनकी पार्टी को करीब 30-35 सीटें मिलेंगी. अगर ऐसा हो जाता है तो एआईयूडीएफ  को असम में किंगमेकर बनने से कोई रोक नहीं पाएगा.

First published: 25 March 2016, 8:21 IST
 
भार्गब सर्मा @bhargabsarmah

संवाददाता, कैच न्यूज़. फ़ुटबॉल और दूसरे खेलों पर लिखते हैं.

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