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चुनाव से पहले चावल की राजनीति

आशीष कुमार पाण्डेय | Updated on: 2 January 2016, 17:36 IST
QUICK PILL
  • असम में विधानसभा चुनाव में तकरीबन 4 महीने बचे हैं और कांग्रेस की तरुण गोगोई सरकार ने  2 रुपये किलो चावल देने घोषणा की.
  • मुख्यमंत्री गोगोई के मुताबिक इस योजना से राज्य के तकरीबन 2 करोड़ लोगों को सीधे फायदा पहुंचेगा.

असम के विधानसभा चुनाव में तकरीबन चार महीने बचे हैं. कांग्रेस की तरुण गोगोई सरकार ने चुनावों को ध्यान में रखते हुए जनता को राष्ट्रीय खाद्य मिशन के तहत दो रुपये किलो चावल देने का एलान किया है.

इसमें राज्य सरकार के खाते से दी जा रही एक रुपये की छूट भी शामिल है. मुख्यमंत्री गोगोई के मुताबिक इस योजना से राज्य के तकरीबन दो करोड़ लोगों को सीधे फायदा पहुंचेगा. इस योजना में राष्ट्रीय खाद्य मिशन के तहत तय मूल्य तीन रुपये थे, जिसमें असम सरकार ने एक रुपये अपने खाते से देने का फैसला किया है. आने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए गोगोई ने इस तरह की कुछ औऱ भी लोक लुभावन घोषणाएं की है.

इसके तहत असम चाय कॉरपोरेशन के श्रमिकों की दैनिक आय को 177 रुपये करना, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा कार्यकर्ताओं के साथ-साथ बीपीएल कोटे के तहत 60 साल से ऊपर आने वाले सभी वरिष्ठ नागरिकों को वृद्ध पेंशन देने की घोषणा भी की गई.

इसके अलावा बीपीएल कोटे से संबंधित परिवारों के 10वीं तक के बच्चों को मुफ्त यूनिफार्म, सभी जिला मुख्यालयों पर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोचिंग सेंटर खोलना, सभी कालेजों में मुफ्त वाई-फाई की सुविधा के साथ-साथ नये साल में रोजगार के लिए 75,000 नये पदों को सृजन भी शामिल है.

चुनाव के दिन जैसे-जैसे नजदीक आते हैं राज्य सरकारें इस तरह की लोक-लुभावने वादे करने शुरू कर देती हैं. इससे पहले भी कई अन्य राज्यों की सरकारों ने इस तरह की योजनाओं की घोषणा करके चुनावी वैतरिणी पार करने की कोशिश की है.

छत्तीसगढ़

इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ की तत्कालीन रमन सिंह सरकार ने जनवरी 2008 में खाद्य छूट योजना के तहत लगभग तीन करोड़ गरीब परिवारों को तीन रुपये किलो चावल बांटने की घोषणा की थी. जबकि राज्य में उसी साल नवंबर माह में चुनाव होने थे.

उस समय विपक्षी दल यानी कांग्रेस ने इस योजना की जमकर आलोचना की थी और इसे रमन सिंह सरकार का चुनावी हथकंडा बताया था.

तमिलनाडु

वर्ष 2006 में तमिलनाडु की डीएमके की करुणानिधि  सरकार ने अन्नादुरई और पेरियार के जन्मदिवस पर जनता को रंगीन टीवी बांटने और जनता को 2 रुपये किलो चावल मुहैया कराने की घोषणा की थी.

लेकिन बाद में एआईएडीएम की सरकार बनी तो जयललिता ने इस योजना को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि इससे करुणानिधि के रिश्तेदार कलानिघि मारन के केबल उद्योग को बढ़ावा देने के लिए शुरु किया गया था.

टीवी खरीद पर तत्काल रोकते हुए जयललिता ने खरीदे गये 1 लाख से अधिक टीवी सेटों को अस्पताल, अनाथालय और सरकारी प्रतिष्ठानों  में लगाये जाने के आदेश दिये.

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार ने चुनाव से पूर्व कन्या विद्या धन योजना, रोजगार भत्ता योजना और छात्रों को मुफ्त टैपटाप और टैबलेट बांटने की घोषणा की थी.

समाजवादी सरकार को इन योजनाओं को लागू करने में अच्छा खासा बजट खर्च करना पड़ा था. जिससे सरकार की कमर टूट गई और कई तरह की अनियमितताएं भी सामने आईं. सिर्फ लैपटाप योजना पर ही अखिलेश सरकार को तकरीबन 3,420 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े.

इस खर्च पर आई कैग की रिपोर्ट में उजागर हुई खामियों और भारी-भरकम बजट को देखते हुए अखिलेश सरकार ने इन योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया.

बिहार

बिहार में भी 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की सरकार ने 12वीं की परीक्षा में फर्स्ट डिविजन आने वाली छात्राओं को 25,000 रुपये के वजीफे की घोषणा की थी. इसके अलावा अनूसूचित जाति और जनजाति की छात्राओं के साथ-साथ दूसरी श्रेणी में 12वीं पास करने वाली छात्राओं को भी छात्रवृत्ति का लाभ मिलना था. मांझी की इन योजनाओं को भी राजनीति लाभ से जोड़ कर देखा गया और राजद और कांग्रेस ने इस योजना के लागू होने और वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचने में भारी अंदेशा जताया.

आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश की राजनीति में भी सस्ते दामों में अनाज बांटने की योजना आजमायी जा चुकी है. सबसे पहले एनटीआर ने इसे लागू किया था. उसके बाद चंद्रबाबू नायडू ने भी इस योजना को आगे बढ़ाया और फिर कांग्रेस के राजशेखर रेड्डी ने भी गरीब परिवारों को 20 किलो अनाज 2 रुपये किलो के दर से देने की घोषणा की.

कर्नाटक

वर्ष 2013 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्घरमैया ने राज्य में गरीब लोगों को एक रुपये प्रति किलो चावल देने की घोषणा की थी. राज्य सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत दी जाने वाली इस योजना पर 2,373 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा. इसे भी आने वाले लोकसभा चुनाव 2014 के मद्देनजर राजनीति से भी जोड़ कर देखा गया था.

चुनाव से पहले घोषित होने वाली इस तरह की योजनाओं को राजनैतिक दल जहां अपने नफे-नुकसान से जोड़ कर देखता हैं, वहीं जनता को इससे कुछ राहत मिलने की उम्मीद जरुर होती है.  लेकिन बढ़ते आर्थिक बोझ और घोटालों के बीच इस तरह की योजनाएं बीच में ही दम तोड़ देती हैं.

First published: 2 January 2016, 17:36 IST
 
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