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असमः पिता की 15 साल की राजनीति के वारिस गौरव गोगोई

कुणाल मजूमदार | Updated on: 3 April 2016, 0:17 IST
QUICK PILL
  •  34 वर्षीय सासंद गौरव गोगोई असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बेटे हैं. राज्य में कांग्रेस की प्रचार की कमान उन्हीं के हाथ में है. तरुण गोगोई की निजी लोकप्रियता के बावजूद पार्टी के लिए मुकाबला कड़ा साबित हो सकता है.
  •  तरुण गोगोई के पुराने साथी हेमंत बिस्व सर्मा के बीजेपी में चले जाने से गोगोई पिता-पुत्र पर अपना प्रभाव साबित करने का अतिरिक्त दबाव क्योंकि सर्मा के कांग्रेस छोड़ने की बड़ी वजह गौरव बताए जाते हैं.

कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई पत्रकारों से अपना परिचय उन 45 सांसदों में से एक के तौर पर देते हैं जो 2014 के आम चुनाव में बीजेपी की लहर में भी जीत कर आए. उन्हें भरोसा है कि कांग्रेस असम में चौथी बार सत्ता में वापस आएगी और उनके पिता तरुण गोगोई चौथी बार मुख्यमंत्री बनेंगे. हालांकि गौरव बातचीत में तरुण गोगोई को पिता के बजाय मुख्यमंत्रीजी कहकर ही संबोधित करना पंसद करते हैं.

गौरव जो भी कहें कांग्रेस के लिए ये चुनाव आसान नहीं होने जा रहा है. 34 वर्षीय गौरव को राजनीति में आए बस दो साल हुए हैं. अमेरिका में पढ़ायी करके वो 2011 में भारत आए. तीन साल बाद वो लोकसभा चुनाव में उतरे और जीते. आम चुनाव में गौरव को जीत भले मिली हो कांग्रेस का प्रदर्शन दयनीय रहा.

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इस चुनाव में उनके पिता के करीबी और चुनावी रणनीतिकार हेमंत बिस्व सर्मा बीजेपी में चले गए हैं. सर्मा ने कभी खुलकर नहीं कहा कि उन्होंने गौरव के राजनीति में आने के कारण कांग्रेस को छोड़ा लेकिन असम के राजनीतिक गलियारों में सब इस बात से मुतमईन हैं.

असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के 34 वर्षीय बेटे गौरव गोगोई राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं

सर्मा ने कैच से बातचीत में बताया कि गोगोई ने उनके 20 साल के राजनीतिक योगदान को नजरंदाज करते हुए करते हुए अपने बेटे को आगे बढ़ाया. सर्मा ने कहा, "मैं कैबिनेट मिनिस्टर था और वो चाहते थे कि मैं पहली बार सांसद बनने वाले व्यक्ति से आदेश लूं."

पहली बार सांसद बनने के बावजूद गौरव दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे हैं. दो सालों के राजनीतिक करियर में उन्हें राहुल गांधी के भरोसेमंद लोगों में गिना जाने लगा है. संसद में होने वाली बहसों में भाग लेते दिखते हैं. अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के प्रवक्ता के तौर पर वो टीवी डिबेटों में अक्सर दिख जाते हैं. लेकिन असम की ज़मीनी राजनीति में गौरव की पहली बार अग्निपरीक्षा होगी.

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हेमंत बिस्व सर्मा तरुण गोगोई के गढ़ तीताबार (1997 से ही तरुण यहां के विधायक हैं) में दो बड़ी चुनावी रैलियां कर चुके हैं. वहीं गौरव ज्यादा तामझाम किए बिना ज़मीनी संपर्क साध रहे हैं. बड़ी रैलियों के बजाय वो छोटी-छोटी बैठकें कर रहे हैं.

एक स्थानीय पत्रकार कहते हैं, "गोगोई की निजी लोकप्रियता बरक़रार है लेकिन 15 सालों के एंटी-इन्कमबेंसी का सामना करना आसान नहीं है."

गौरव गोगोई के संसदीय क्षेत्र कालियाबोर में कैच ने जिन लोगों से बात की उनमें अधिकतर उनकी तारीफ ही कर रहे थे. राजनीति में आने से पहले तीन साल तक उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों का प्रभाव लोगों में साफ दिख रहा था. लेकिन जब हमने मतदाताओं से कांग्रेस पार्टी के बारे में पूछा तो जवाब सकारात्मक नहीं थे.

काज़ीरंगा इलाके के एक कारोबारी नाम न देने की शर्त पर कहते हैं कि यहां से कांग्रेस हार जाएगी लेकिन इसके लिए गोगोई नहीं बल्कि पार्टी जिम्मेदार होगी.

बीजेपी अपने चुनाव प्रचार में तरुण गोगोई पर तीखा हमले करने से बचती नजर आती है

पिछले कुछ दिनों में बीजेपी ने अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करते हुए तरुण गोगोई को निशाना बनाने से बच रही है. बीजेपी असम के अवैध शरणार्थियों को निशाना बना रही है. हिंदुत्व की राजनीति के अलावा 'बाहरी' लोगों का भय बीजेपी का प्रमुख हथियार है.

एआईयूडीएफ के बदरुद्दीन अजमल ने बिहार की तर्ज पर बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस के साथ सेकुलर गठबंधन करने का प्रस्ताव दिया था जिसे गोगोई ने ठुकरा दिया.

गौरव प्रचार के दौरान अपने पिता की पिछले 15 सालों में हासिल उपलब्धियों की मतदाताओं को याद दिलाते हैं. खासकर राज्य को उग्रवादी हिंसा से मुक्ति दिलाने की उपलब्धि पर वो विशेष जोर देते हैं.

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गौरव शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में खामियों का बार-बार जिक्र करते हैं. वो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर भी हमला करते हैं. विजय माल्या के देश से भागने के बारे में भी वो जनता को याद दिलाते हैं.

तरुण गोगोई भी बार-बार कहते हैं कि असम विधान सभा की उनके और नरेंद्र मोदी के बीच सीधी लड़ायी है.

गौरव ने भी कैच से कहा, "ये चुनाव तरुण गोगोई के 15 साल के सुशासन और नरेंद्र मोदी के दो साल के शासन के बीच है."

प्रधानमंत्री के काम की किसी राज्य के मुख्यमंत्री के कामकाज से तुलना का तर्क आम जनता कैसे लेगी ये तो वक्त बताएगा. फिलहाल, हस्बे-मामूल हर दल का यही दावा है कि वही जीत रहा है.

First published: 3 April 2016, 0:17 IST
 
कुणाल मजूमदार @kunalmajumder

Editor for Speed News aka Catch Live and Operations at Catch, Kunal enjoys measuring his life in numbers. Of his 30 years of life, 12 have been spent working, 9 of them in journalism. The remaining 3 were spent in 2 call centres, talking to British and Australians about insurance and cellphones. In his journalistic capacity, Kunal has worked at 3 publications and headed 2 online teams. The '3' includes Images Multimedia, Tehelka and DNA. The '2' includes Tehelka and DNA. Catch is Kunal's 6th workplace, where he will head his 3rd team as speed news editor. As a reporter, he won 2 awards - Statesman Award for Rural Reporting and UNFPA-Laadli Award for Gender Sensitivity. That's his story in Prime Numbers (a section on this site from which he's taken inspiration).

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