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अल्पसंख्यकों का हाथ कमोबेश कांग्रेस के साथ है, चाल-चलन बदलने की दरकार है

के शिवप्रसाद | Updated on: 27 June 2016, 8:14 IST
(पीटीआई)
QUICK PILL
  • पार्टी के कर्णधार बीते विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को अपना संदेश देने में पीछे छूट गए. वहीं इसके अलावा कांग्रेस बीफ और असहिष्णुता के मुद्दे पर भी मोदी सरकार के खिलाफ देशव्यापीअभियान नहीं चला सकी.
  • विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन को आम आदमी तो क्या खुद कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने बेहद निराशाजनक माना है और अब तो पार्टी में सर्जरी की बात भी उठ रही है

जनता से जुड़े कुछ बुद्धिजीवी आज इस बात पर बहस करना चाहते हैं कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस एक प्रासंगिक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में आगे भी विश्वसनीय बनी रहे क्योंकि यह भारत के उदारवादी, खुली सोच का प्रतिनिधित्व करती है.

यदि यह धारणा वाकई में सच है तो कांग्रेस नेतृत्व का मतदाताओं के साथ अपने रिश्ते को नए सिरे से समझना होगा जो कि बिल्कुल गलत दिशा में जा रहा है.

आज लोगों में यह धारणा बची ही नहीं है कि कांग्रेस पार्टी अपने पुराने मूल्यों और सिद्धान्तों पर खड़ी है जिसे बुद्धिजीवी लोग बता रहे हैं.

जनता से जुड़ाव में जड़ता

जरा, इस बात पर विचार कीजिए कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी का वोट प्रतिशत 20 फीसदी के मनोवैज्ञानिक स्तर तक गिर गया. उसे सिर्फ 44 सीटें मिली. इतनी कम सीटें उसे कभी नहीं मिलीं थीं.

दो प्रमुख क्षेत्रीय दल तृणमूल कांग्रेस और एआईएडीएमके के कब्जे वाले सूबों से (पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु) कांग्रेस की लोकसभा में एक-एक सीटें हैं.

लोकसभा में पार्टी की यह स्थिति आश्चर्यजनक ही कही जाएगी. लगता है कि कांग्रेस नेतृत्व जनता के मोर्चे पर अपनी साख खोता जा रहा है.

राजनीतिक वाक्चातुर्य और बहस की कला भी जनता का मूड भांपने में कांग्रेस असमर्थ सी होती जा रही है. पार्टी के कर्णधारों का मतदाताओं को संदेश देने और आह्वान करने का काम पीछे छूट गया है.

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2014 के चुनाव के बाद उसने नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ अभियान चलाए. यह एक अच्छा अवसर था. हालांकि बीफ और असहिष्णुता के मुद्दे पर चला यह अभियान शब्दों के आडंबर में सिमट गया.

सवाल यह है कि क्या इस अभियान से कांग्रेस को चुनावी लाभ मिला? यदि किसी को इसका लाभ मिला भी तो केवल भाजपा और कांग्रेस के विरोधियों को.

कांग्रेस के सहयोगी जाति और धर्म के आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण की बात करते हैं. इनमें से कोई नहीं बताता कि कांग्रेस को इस तरह के अभियानों से कितना लाभ होगा. वर्ष 1996 के संसदीय चुनावों में पराजय के तुरंत बाद तत्कालीन पार्टी प्रवक्ता वीएन गाडगिल एक पम्फलेट के साथ पार्टी की बैठक में आए थे.

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उन्होंने लिखा था कि कांग्रेस दो पायों पर खड़ी है. हिन्दू सोचते हैं कि पार्टी प्रो मुस्लिम है जबकि मुसलमान सोचते हैं कि पार्टी नरम हिन्दुत्व को बढ़ावा दे रही है. पार्टी की बिगड़ती छवि एक समस्या है जिसे सुधारने के प्रयास करने चाहिए.

लगता है कि देश के राजनीतिक और चुनावी परिदृश्य में भाजपा और उसके हिन्दुत्व मुद्दे का प्रतिकार करने में पार्टी असफल सिद्ध होती जा रही है. हाल के पांच राज्यों के आए चुनावी परिणाम इसका उदाहरण है.

आम आदमी ही नहीं, खुद कांग्रेस नेतृत्व का भी यह मानना है कि इन चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है.

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हालांकि असम और केरल में हार की वजह निश्चित रूप से एंटी-इनकम्बेन्सी फैक्टर और तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाना रही.

यहां कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं का उल्लेख किया जा रहा है जिसे पार्टी नेतृत्व को कोई भी चुनावी रणनीति तैयार करते समय ध्यान में रखना चाहिए. ये पार्टी के पुनर्जीवन के लिए बेहद उपयोगी हो सकते हैं.

पार्टी की सकारात्मकता

पहली बात तो यह कि पार्टी की विश्वसनीयता अल्पसंख्यक समुदाय विशेषकर मुसलमानों के साथ बनी रहे, इस दिशा में काम शुरू करना चाहिए. यह सिर्फ चुनावी संदर्भ में कांग्रेस बनाम भाजपा न हो, बल्कि कांग्रेस बनाम अन्य दलों के साथ भी हो.

असम चुनाव परिणामों को देखिए. पार्टी को 126 सदस्यीय राज्य विधानसभा की सीटों में केवल 26 सीटें मिली हैं. इसके पहले की विधानसभा में उसके पास 78 सीटें थीं. यह सीधे-सीधे गिरावट है.

वर्ष 2011 में 78 विधायकों में से 10 अल्पसंख्यक समुदाय के थे. जबकि इस समय 26 विधायकों में से 15 मुस्लिम हैं. वर्ष 2011 के 58 फीसदी की तुलना में 13 फीसदी सीटों तक आना स्तब्धकारी ही है.

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इस तथ्य पर भी विचार किया जाना चाहिए कि राजनीतिक दलों द्वारा आम तौर पर मुस्लिम प्रत्याशी मुस्लिम बहुल सीटों पर ही उतारे जाते हैं.

इससे यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि असम में कांग्रेस को मुस्लिम प्रत्याशी खड़ा करने से लाभ ही हुआ है. अल्पसंख्यक समुदाय को भी इससे लाभ हुआ है. नई विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ गया है.

पिछली विस में 27 विधायकों के मुकाबले वर्तमान विधानसभा में 28 मुस्लिम विधायक हैं. हालांकि भाजपा के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन का सिर्फ एक मुस्लिम विधायक ही जीत सका है.

पश्चिम बंगाल में भी कमोवेश यही रुझान रहा. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को 294 सदस्यीय विधानसभा में तीन-चौथाई सीटें मिली हैं. जबकि कांग्रेस जिसका वाम मोर्चे के साथ गठबंधन था, केवल 44 सीटें ही जीत सका था. 44 कांग्रेस विधायकों में से 18 मुस्लिम समुदाय के हैं.

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यह आंकड़ा बहुत ही प्रभावशाली है. इसके विपरीत तृणमूल के 211 विधायकों में से केवल 32 ही मुस्लिम समुदाय के हैं. इसका प्रतिशत केवल 15 है जबकि कांग्रेस का 41 है.

ऐसे में कांग्रेस निश्चित रूप से मुस्लिम बहुल इलाके में तीन गुना ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब हुई है. वर्ष 2011 की तुलना में पार्टी की सफलता में 33 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है.

यही रुझान केरल में भी रहा. कांग्रेस के नवनिर्वाचित 22 विधायकों में से पचास फीसदी अल्पसंख्यक ईसाई और मुस्लिम समुदाय के हैं. कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के 47 विधायकों में से 35 अल्पसंख्यक समुदाय के हैं जो लगभग 74 फीसदी हैं.

इसके विपरीत सीपीएम की अगुवाई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की तुलना कीजिए. इस फ्रंट के 27 विधायक इन्हीं दोनों अल्पसंख्यक समुदाय के हैं. यह प्रतिशत लगभग 30 है.

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2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को जीत मिली थी. 38 सीटों पर अल्पसंख्यक जीते थे. इसका प्रतिशत 40 था. विश्लेषण से यही झलकता है कि तीन राज्यों में पार्टी की निराशाजनक पराजय के बाद भी उसे अल्पसंख्यकों का बड़े पैमाने पर समर्थन मिला.

इसका असर यह हुआ कि इस बार अल्पसंख्यकों का सीटों का शेयर बढ़ गया. यह हालत तब रही जब कांग्रेस को राज्य में एंटी-इन्कम्बेन्सी का बहुत ज्यादा सामना करना पड़ा था.

छवि सुधारना जरूरी

अब कहानी का निराशाजनक पक्ष देखिए. पार्टी को असम, पश्चिम बंगाल, केरल और यहां तक कि तमिलनाडु में भी गैर-मुस्लिम और गैर अल्पसंख्यक बाहुल्य सीटों पर कई तरह के झटकों का सामना करना पड़ा.

असम में 75 सीटें ऐसी थीं जिसमें से वह केवल 11 पर ही जीत सकी. पश्चिम बंगाल में लगभग 200 गैर-अल्पसंख्यक बाहुल्य सीटों में से केवल 26 पर ही जीत हासिल कर सकी. इन राज्यों में कांग्रेस की गिरावट वाकई में उसी तरह रही जिस तरह दो साल पहले लोकसभा चुनाव में देखी गई थी.

पार्टी नेतृत्व के लिए सबसे बडी चिंता का सबब यह होना चाहिए कि हाल में जिन राज्यों में चुनाव हुए हैं, वहां हर राज्य की कुल आबादी में अल्पसंख्यकों की आबादी का अनुपात देश के हर राज्यों से सबसे ज्यादा है. यहां तक कि छोटे से अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह और जम्मू-कश्मीर से भी.

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जनगणना- 2011 के आंकड़ों के अनुसार असम की कुल आबादी में से 34.22 फीसदी, पश्चिम बंगाल की जनसंख्या में से 27.01फीसदी मुस्लिम हैं जबकि केरल की कुल आबादी में से 44.94फीसदी आबादी अल्पसंख्यकों की है. ये राज्य चुनावी दृष्टि से गुजरात, मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की तुलना में पार्टी के पक्ष वाले राज्य होने चाहिए. इन राज्यों की अल्पसंख्यक आबादी दस फीसदी से भी कम है.

संभवत: यही वजह है कि हाल के सालों में कांग्रेस को भाजपा के चलते चुनावी परेशानी उठानी पड़ी है. एक दुर्भाग्य यह भी है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्य जहां मुस्लिम आबादी17-20 फीसदी है, वहां समाजवादी पार्टी और राजद जैसे दल मुसलमानों के समर्थन का दावा करते हैं.

ऐसे में हाल के चुनावी नतीजों की रोशनी में यही कहा जा सकता है कि कांग्रेस को अपनी छवि सुधारने की तुरन्त जरूरत है. साथ ही कांग्रेस को अपनी उदारवादी और सुधारवादी छवि को फिर से पाने का प्रयत्न करना चाहिए.

First published: 27 June 2016, 8:14 IST
 
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