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अटल बिहारी वाजपेयी ने देश के लोगों से क्यों कहा था- 'आओ मर्दों नामर्द बनो'

कैच ब्यूरो | Updated on: 17 August 2018, 13:36 IST

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन गुरुवार को शाम 5 बजकर 5 मिनट पर एम्स में हो गया. आज उनका अंतिम संस्कार शाम चार बजे किया जाएगा. उनके निधन से देश ने एक महान नेता, एक महान कवि और एक महान इंसान खो दिया. अटल जी ने जब देश में आपातकाल लगा था तो एक कविता लिखी थी 'आओ मर्दों नामर्द बनो.' 

दरअसल, 25 जून 1975 की आधी रात को देश के तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली ने तब प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी की सिफारिश पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा कर दी थी. इस आपातकाल ने देश के राजनीतिक दलों से लेकर पूरी व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया था.

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आपातकाल में लोगों के अधिकार तो छीन ही लिए गए थे लेकिन उस वक्त लिए गए एक फैसले ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया था. इंदिरा गांधी सरकार ने नसबंदी जैसा दमनकारी फैसला लिया था जिसने घर-घर में दहशत फैलाने का काम किया था. उस दौरान गली-मोहल्लों में आपातकाल के सिर्फ एक ही फैसले की चर्चा सबसे ज्यादा थी और वह थी नसबंदी. नसबंदी का फैसला लागू कराने का जिम्मा इंदिरा के छोटे बेटे संजय गांधी को दिया गया.

इस दौरान घरों में घुसकर, बसों से उतारकर और लोभ-लालच देकर लोगों की नसबंदी की गई. जबरदस्ती का आलम यह था कि सिर्फ एक साल के भीतर देशभर में 60 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी कर दी गई. इनमें 16 साल के किशोर से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक शामिल थे. गलत ऑपरेशन और इलाज में लापरवाही की वजह से करीब दो हजार लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी थी. संजय गांधी का ये मिशन जर्मनी में हिटलर के नसंबदी अभियान से भी ज्यादा कड़ा था जिसमें करीब 4 लाख लोगों की नसबंदी कर दी गई थी.

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संजय गांधी के इसी दुर्दान्त के खिलाफ उस वक्त पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नसबंदी की आलोचना में एक कविता लिखी थी. कविता के बोल थे- आओ मर्दो, नामर्द बनो. उनकी यह कविता काफी चर्चा में रही थी. आप भी पढ़िए उनकी कविता-

आओ! मर्दों नामर्द बनो
मर्दों ने काम बिगाड़ा है,
मर्दों को गया पछाड़ा है 
झगड़े-फसाद की जड़ सारे 
जड़ से ही गया उखाड़ा है

मर्दों की तूती बन्द हुई
औरत का बजा नगाड़ा है
गर्मी छोड़ो अब सर्द बनो
आओ मर्दों, नामर्द बनो

गुलछरे खूब उड़ाए हैं,
रस्से भी खूब तुड़ाए हैं,
चूं चपड़ चलेगी तनिक नहीं,
सर सब के गए मुंड़ाए हैं,
उलटी गंगा की धारा है,
क्यों तिल का ताड़ बनाए है,
तुम दवा नहीं, हमदर्द बनो.
आयो मर्दों, नामर्द बनो.

औरत ने काम संभाला है,
सब कुछ देखा है, भाला है,
मुंह खोलो तो जय-जय बोलो,
वर्ना तिहाड़ का ताला है,
ताली फटकारो, झख मारो,
बाकी ठन-ठन गोपाला है,
गर्दिश में हो तो गर्द बनो.
आयो मर्दों, नामर्द बनो.

पौरुष पर फिरता पानी है,
पौरुष कोरी नादानी है,
पौरुष के गुण गाना छोड़ो,
पौरुष बस एक कहानी है,
पौरुषविहीन के पौ बारा,
पौरुष की मरती नानी है,
फाइल छोड़ो, अब फर्द बनो.
आओ मर्दों, नामर्द बनो.

चौकड़ी भूल, चौका देखो,
चूल्हा फूंको, मौका देखो,
चलती चक्की के पाटों में
पिसती जीवन नौका देखो,
घर में ही लुटिया डूबी है,
चुटिया में ही धोखा देखो,
तुम कलां नहीं बस खुर्द बनो.
आयो मर्दों, नामर्द बनो.

First published: 17 August 2018, 13:36 IST
 
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