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अटल की सरकार से RSS के रिश्ते मोदी सरकार से क्यों थे अलग ?

कैच ब्यूरो | Updated on: 17 August 2018, 13:56 IST

वर्तमान मोदी सरकार को लेकर विपक्षी अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि सरकार में आरएसएस का हस्तक्षेप इस कदर बढ़ चुका है कि सरकार संघ की सहमति से कोई बड़ा फैसला नहीं लेती है. विपक्षियों का यह आरोप भी रहता है कि देश की तमाम सांवैधानिक संस्थाओं में संघ से जुड़े लोगों की नियुक्तियां की जा रही हैं. लेकिन विपक्ष इस तरह के आरोप अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए कभी नहीं लगा सका. साल 2000 के शुरुआत में अटल बिहारी वाजपेयी और आरएसएस को लेकर अंदरखाने में बेहद चर्चा थी. 2000 के दशक के प्रारंभ में वह प्रधान मंत्री थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वैचारिक सलाहकार भी थे.

नरसिंह राव आर्थिक सुधारों को जारी रखा

केएस सुदर्शन उस समय आरएसएस प्रमुख थे और इस तथ्य को छिपाने के लिए बहुत कम प्रयास किए कि उनके मतभेद थे. हालांकि संघ इस बात की उपलब्धि समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ता है कि अटल ने एक आदर्श स्वयंसेवक की भूमिका निभाई. अटल बिहारी वाजपेयी कभी आरएसएस के वैसे चहेते नहीं रहे जैसे लालकृष्ण आडवाणी हुआ करते थे. प्रधानमंत्री के रूप में उनके स्वतंत्र विचार और देशहित में फैसले संघ और सरकार के बीच घमासान का कारण भी बना. राष्ट्रीय किसान संघ व स्वदेशी जागरण मंच जैसे संघ के संगठनों के विरोध के बावजूद अटल ने नरसिंह राव सरकार के शुरू किये आर्थिक सुधारों को जारी रखा.

संघ को निर्णयों से रखा बाहर  

माना जाता है कि वाजपेयी ने अपनी विदेश नीति को जिस दृढ़ता से लागू किया उसमे उन्होंने संघ को राजनीतिक निर्णय लेने से बाहर रखा. अल्पसंख्यकों के लिए अटल की सोच आरएसएस की इन विचारधारा से बेहद दूर रही. संघ ने उनकी आर्थिक नीतियों की भी आलोचना की. 24 पार्टियों के गठबंधन की सरकार के नेता के रूप में वाजपेयी के पास सहयोगियों को जगह देने की एक अलग सोच थी. हालांकि उन्होंने अपनी राजनीति को आकार देने के लिए आरएसएस को श्रेय दिया.

1999 में लाहौर की अपनी यात्रा के दौरान मीनार-ए-पाकिस्तान से भाषण के दौरान वाजपेयी ने कहा कि भारत ने पाकिस्तान का जन्म स्वीकार कर लिया है, जो कि आरएसएस के स्टैंड के विपरीत था. जो कि संघ के अखण्ड भारत की अवधारणा के खिलाफ था. कारगिल युद्ध के बावजूद वह आगे बढ़े और जनरल परवेज मुशर्रफ से बातचीत की, वह शांति चाहते थे और पड़ोसी के साथ संबंधों को बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध थे.

आरएसएस के साथ वाजपेयी के संबंधों पर पूर्व राज्यसभा सांसद और पत्रकार एचके दुआ कहते है कि उन्होंने संगठन को सरकार से दूर रखा है. उन्होंने सरकार की नीतियों को निर्देशित करने या महत्वपूर्ण नियुक्तियों में संघ को हस्तक्षेप नहीं करने दिया. उन्होंने कभी संघ से अपनी मंजूरी या सलाह नहीं मांगी. वह महीनों संघ प्रमुख सुदर्शन से नहीं मिलें.
संघ और वाजपेयी के बीच रथ यात्रा जैसे मुद्दों पर मतभेद रहे.

आरएसएस के पूर्व कार्यकर्ता गोविंदाचार्य का कहना है कि राजनीतिक विरोधियों का दिल जीतने की अटल की क्षमता चमत्कारिक थी. दिल्ली में बोट क्लब में हिंदुत्व पर उनका 1991 का भाषण अद्वितीय है. उन्होंने कहा कि हम सभी शाखा जाने वाले नहीं हैं, इसलिए हमें दूसरे के दृष्टिकोण को देखना सीखना चाहिए.

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First published: 17 August 2018, 12:05 IST
 
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