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औरंगजेब के बाद अकबर और महाराणा प्रताप पर 'रोड राजनीति'

कैच ब्यूरो | Updated on: 18 May 2016, 15:39 IST

हाल ही में दिल्ली के औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड रख दिया गया था. इस फैसले पर काफी विवाद हुआ था. अब अकबर रोड का नाम बदलने पर सियासत गरमाती जा रही है.

महत्वपूर्ण जगहों के नाम पर छिड़े विवाद में अब अकबर रोड को लेकर नया अध्याय जुड़ा है. पूर्व थल सेनाध्यक्ष और केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने दिल्ली के अकबर रोड या लुटियंस जोन में मौजूद किसी सड़क का नाम बदलकर राजपूत शासक महाराणा प्रताप के नाम पर रखने की मांग की है. 

अकबर रोड पर कांग्रेस मुख्यालय

दिलचस्प बात ये है कि इसी अकबर रोड इलाके में कांग्रेस पार्टी का मुख्यालय 24-अकबर रोड पर स्थित है. वीके सिंह ने कहा है कि मुगल शासक अकबर से लोहा लेने वाले महाराणा प्रताप के नाम पर दिल्ली की सड़क का नाम होना चाहिए.

वीके सिंह ने इस सिलसिले में केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू को पत्र लिखा है. हालांकि उनके इस कदम की आलोचना भी तेज हो गई है. इससे पहले औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड करने के प्रस्ताव को पिछले साल अगस्त में नई दिल्ली नगर पालिका परिषद ने मंजूरी दी थी.     

अब वीके सिंह ने की मांग


वीके सिंह ने पत्र में लिखा है, "आप इससे अवगत होंगे कि महाराणा प्रताप ने मुगल शासक अकबर की सेना का सामना किया. प्रताप साथ ही धार्मिक समानता की भी मिसाल थे. वह पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष शासक थे."

वीके सिंह ने अपने पत्र में ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए लिखा है कि प्रताप की सेना में पठान सिपाही थे. साथ ही आदिवासियों और भीलों का भी उन्हें समर्थन हासिल था.

विदेश राज्यमंत्री ने अपनी बात के पक्ष में दलील देते हुए कहा,"अकबर रोड का नाम बदलकर राजपूत शासक को उचित सम्मान मिलेगा. मेरा व्यक्तिगत मत है कि महानतम शख्सियत महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी को वो सम्मान अब तक नहीं मिल सका, जो मिलना चाहिए था."

'महाराणा प्रताप के नाम पर हो रोड'

इस बीच कांग्रेस ने वीके सिंह की मांग पर निशाना साधा है. पार्टी के नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा, "अकबर रोड का ही नाम क्यों बदला जाए. प्रधानमंत्री का आवास रेस कोर्स रोड पर है. रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर महाराणा प्रताप किया जा सकता है."

अकबर रोड का नाम बदलकर महाराणा प्रताप करने की मांग पहले भी कई बीजेपी नेता उठा चुके हैं. हाल ही में राज्यसभा सांसद बने सुब्रमण्मय स्वामी ने कहा था कि महाराणा प्रताप एक महान योद्धा थे, लिहाजा उनके त्याग और बलिदान को देखते हुए नाम बदलना चाहिए.

स्वामी-खट्टर ने की थी मांग


स्वामी ने कहा था कि लुटियंस जोन में करीब एक तिहाई सड़कें मुस्लिम शासकों के नाम पर हैं. नाम बदलने के लिए तर्क देते हुए स्वामी ने कहा था कि अकबर के सामने महाराणा प्रताप ने घुटने नहीं टेके थे और कहा था कि घास की बनी रोटी भी खा लेंगे.

इससे पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने अकबर रोड का नाम बदलने की मांग की थी. खट्टर ने विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह से मुलाकात के दौरान ये मांग की थी.

राजस्थान में हटा था अकबर से महान

इससे पहले राजस्थान में स्कूल की किताब से अकबर के पाठ में से महान हटाने को लेकर काफी विवाद हुआ था. 2016-17 के पाठ्यक्रम के लिए बीजेपी की वसुंधरा राजे सरकार ने बदलाव किया था. सातवीं क्लास में हिंदी के नए सिलेबस में ये संशोधन हुआ था.

सातवीं की सामाजिक विज्ञान के हल्दीघाटी युद्ध के पाठ में मुगल बादशाह अकबर को महान नहीं सिर्फ बादशाह बताया गया है. इससे पहले अकबर को इतिहास में अकबर महान लिखा जाता था. 

इसके अलावा हिंदी के नए सिलेबस में महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी और संत कंवरराम समेत स्थानीय संतों को प्रमुखता से शामिल किया गया है. हालांकि अंग्रेजी माध्यम की किताब में अकबर को ग्रेट ही संबोधित किया गया है.

महाराणा प्रताप को महान का दर्जा


महाराणा प्रताप राजस्थान के मेवाड़ इलाके के शासक थे. 1576 में महाराणा प्रताप और मुगल शासक अकबर के बीच हल्दीघाटी का युद्ध हुआ था. हल्दीघाटी की जंग केवल एक दिन चली थी, जिसमें दोनों पक्षों के करीब 17 हजार सैनिक मारे गए थे.

नया पाठ्यक्रम राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान उदयपुर ने तैयार किया है. इस फैसले को लेकर राजस्थान में काफी सियासी घमासान मचा था. शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी ने फैसले को सही करार देते हुए कहा था कि एक युग में दो लोगों को महान नहीं बताया जा सकता. केवल महाराणा प्रताप ही इस खिताब के हकदार हैं.
 

देवनानी ने कहा था कि छात्रों को किताबों में अकबर के बारे में पूरी जानकारी दी जाएगी, लेकिन उन्हें महान का दर्जा नहीं दिया जाएगा. कांग्रेस ने राज्य सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाए थे.

राजस्थान सरकार ने आरटीआई एक्ट (सूचना का अधिकार कानून) का पाठ भी हाल ही में हटा दिया था. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक यह पाठ आठवीं की सामाजिक विज्ञान की किताब में पेज नंबर 105 पर था.

First published: 18 May 2016, 15:39 IST
 
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