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आजम के विवादित बोल को मुलायम सिंह की सरपरस्ती

अभिषेक पराशर | Updated on: 12 February 2016, 17:24 IST
QUICK PILL
  • आजम खान अक्सर ऐसे बयान देते हैं जिन पर सियासी बवंडर खड़ा हो जाता है. इसके बावजूद समाजवादी पार्टी ने कभी भी खुद को उनके बयानों से अलग नहीं करती.
  • खान के बयान फिर से सुर्खियों में हैं. उनका दावा है कि इस्लामाबाद की अचानक यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नवाज शरीफ के घर पर दाउद इब्राहिम से मिले थे औऱ उनके पास इस बात के सबूत हैं.
  • उनके विवादित बयानों के पीछे आखिर क्या रणनीति रहती है और पार्टी के अंदर उनको लेकर किस तरह की प्रतिक्रिया होती है?

पिछले साल समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन पर आयोजित समारोह में जब पत्रकारोंं ने आजम खान से पूछा कि इस शाही खर्च का बोझ कौन उठा रहा है, तब आजम खान ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा था, 'नेताजी के जन्मदिन के लिए कुछ पैसे दाउद इब्राहिम ने दिए हैं और कुछ पैसा अबू सालेम ने भिजवाया है.' 

करीब एक साल बाद आजम खान ने कथित ताैर पर 'बड़ा खुलासा' करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस्लामाबाद की अचानक यात्रा के दौरान नवाज शरीफ के घर पर दाउद इब्राहिम से मिले थे. 

पहला बयान आजम खान ने मजाकिया लहजे में मुलायम सिंह की मौजूदगी में दिया था जबकि दूसरा बयान उनकी सरपरस्ती में दिया. कांग्रेस ने आजम खान के इस दावे को बेतुका करार देेते हुए कहा, 'राजनीति में हमारा कई लोगों से मतभेद होता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई कुछ कहे और हम उसे मान लें.' 

कांग्रेस प्रवक्ता उल्टा आजम पर तंज कसते हुए यह बताना नहीं भूले कि खान वहीं शख्स हैं जिन्होंने 'उत्तर प्रदेश पुलिस के जवानों को अपनी भैंस खोजने के काम में लगाया था.'

चौतरफा आलोचनाओं के बावजूद समाजवादी पार्टी ने तो न तो इस बयान का खंडन किया और नहीं किसी तरह की सफाई दी. 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान भी आजम खान के एक बयान पर जबरदस्त विवाद हुआ था. उन्होंने कहा था, 'हिंदू भाई हमसे इसलिए मोहब्बत करो कि कारगिल की पहाड़ियों को फतेह करने वाला कोई हिंदू नहीं था, बल्कि कारगिल की पहाड़ियों को नारा-ए-तकबीर अल्ला-हु-अकबर कहकर फतेह करने वाले मुस्लिम फौजी थे.' उस वक्त भी पार्टी ने आजम के बयान से किनारा नहीं किया था. आजम खान ने हालांकि अभी तक प्रधानमंत्री मोदी और दाउद के बीच मुलाकात के सबूत सामने नहीं रखे हैं.

लखनऊ में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार एमएम हसन बताते हैं, 'सपा प्रमुख मुलायम सिंह के अलावा पार्टी का कोई भी नेता आजम खान के बयानों का खंडन करने की हिमाकत नहीं कर सकता. रही बात मुलायम सिंह की तो वह ऐसा कर आजम को नाराज करने का जोखिम उठाना नहीं चाहते.' 

क्या आजम खान मुलायम सिंह की मजबूरी हैं?

सपा के राजनीतिक समीकरण में अभी भी यादव और मुस्लिम सबसे मजबूत वोट बैंक है. यादव वोट बैंक पर मुलायम सिंह और उनके परिवार की सीधी दावेदारी है. लेकिन मुस्लिम वोट बैंक के मामले में उनकी निर्भरता हमेशा किसी मुसलिम चेहरे पर बनी रहती है. आजम खान उन शुरुआती लोगों में शामिल हैं जिनके साथ मिलकर मुलायम सिंह ने सपा की नींव रखी थी. तब से आजम खान सपा में एकछत्र मुस्लिम चेहरे के रूप में स्थापित रहे हैं. 

सेंटर फॉर ऑब्जेक्टिव रिसर्च एंड डिवेलपमेंट (सीओआरडी) के डायरेक्टर अतहर हुसैन बताते हैं, 'मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानोंं को अपने साथ जोड़े रखने के लिए आजम खान को सपा के भीतर अल्पसंख्यक समुदाय के एकमात्र बड़े नेता के तौर पर आगे बढ़ाया है.' 

सपा ने अधिकांश मौकों पर आजम खान के विवादित बयानों का न तो खंडन किया और नहीं सफाई देने की जरूरत समझी

हुसैन कहते हैं, 'आजम खान का चेहरा सामने रखकर मुलायम सिंह और सपा पूरे मुस्लिम समुदाय की बजाय मुसलमानों के सिर्फ एक नेता से डील करते हैं. जबकि हकीकत में आजम खान सूबे के मुसलमानों का वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं.' 

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प्रधानमंत्री पर सीधे निशाना साधने के पीछे दो अहम कारण नजर आते हैं. पहला तो वह अल्पसंख्यक समुदाय के बीच अपनी छवि एक ऐसे नेता के तौर पर गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं जो सीधे नरेंद्र मोदी को चुनौती देने का साहस रखता है. दूसरी तरफ वह पार्टी के भीतर खुद को अहम और प्रासंगिक नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश करते नजर आते हैं. 

हुसैन कहते हैं, 'प्रधानमंत्री मोदी से विभिन्न मसलों पर मतभेद और असहमति के बावजूद कोई भी आजम खान के दावे पर भरोसा नहीं कर सकता कि उन्होंने इस्लामाबाद में एक भगोड़े और वांटेड अपराधी से मुलाकात की होगी.'

दावे पर सवाल

समाजवादी पार्टी के भीतर और बाहर आजम खान अपने को वैसे नेता के तौर पर पेश करते रहे हैं जिसकी पूरे मुस्लिम समुदाय में स्वीकार्यता है. वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल बताते हैं, 'मुसलमानों के एकछत्र बड़े नेता के दावे की सच्चाई को ऐसे भी समझा जा सकता है प्रदेश में शियाओं की एक बड़ी आबादी रहती हैं और उनके बीच खान का प्रभाव न के बराबर है.' 

उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 18.49 फीसदी है और सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी रामपुर जिले में हैं. रामपुर की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी करीब 53 फीसदी है. इसके अलावा मुरादाबाद, बिजनौर समेत कुल 20 ऐसे जिले हैं जहां मुसलमानों की आबादी 20 फीसदी से अधिक है.

हुसैन बताते हैं, 'उत्तर प्रदेश तो दूर की बात है. आजम खान रामपुर के अलावा इन 20 जिलों की राजनीति को भी प्रभावित करने की क्षमता नहीं रखते हैं.' 

उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 18.49 फीसदी है और सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी रामपुर जिले में हैं

आजम खान के बयान पर समाजवादी पार्टी कुछ भी नहीं बोलकर यह संदेश देने की कोशिश करती हैं कि उनके बीच का एक बड़ा मुस्लिम नेता है. यह एक तरह से आजम के मुस्लिम समुदाय के एकछत्र नेता होने के तौर पर मुहर होती है. हुसैन बताते हैं, 'खान की हैसियत रामपुर के नेता के तौर पर है लेकिन मुलायम सिंह की सरपरस्ती की वजह से उन्होंने अपनी छवि मुस्लिमों के एकमात्र नेता की बना ली है.' 

कुछ जानकार आजम खान के विवादित बयानों को सपा के भीतर बन-बिगड़ रहे नए समीकरणों से जोड़कर दखते हैं. सपा के माैजूदा हालात आजम खान के माकूल नहीं है. मुलायम सिंह और अमर सिंह के बीच बढ़ती नजदीकियों से आजम की परेशान छिपी नहीं हैं. कुछ दिन पहले ही उन्होंने बयान दिया था कि अमर सिंह की सपा मेें वापसी नहीं होगी. 

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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से भी आजम खान के रिश्ते सहज नहीं हैं. आज की तारीख में अखिलेश यादव के मंत्रिमंडल में कमाल अख्तर, शाहिद मंजूर, इकबाल महबूब, महबूब अली और अहमद हसन जैसे तमाम नेता शामिल हैं. समय समय पर अखिलेश इन नेताओं को आजम खान के विकल्प के तौर पर आगे बढ़ाते रहते हैं.

आजम खान की छवि कभी एक समावेशी नेता की नहीं रही. सबको साथ लेकर चलना उनकी फितरत नहीं है. एकला चलो उन्हें हमेशा पसंद रहा है. उन्होंने हमेशा से खुद को मुस्लिम कौम का नेता बताया और समय-समय पर इसे साबित भी करने की कोशिश की. 

वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल बताते हैं, 'प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधकर खान उनकी विश्वसनीयता को खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं.' उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय में मोदी को लेकर एक अजीब तरह की दुविधा है. प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने नीतियों के स्तर पर ऐसा कुछ नहीं किया जिससे मुसलमानों को नुकसान हो लेकिन उन्होंने ऐसा भी कुछ नहीं किया जिससे उन्हें मुस्लिम समुदाय का भरोसा हासिल करने में मदद मिले. 

लाल बताते हैं, 'आजम खान इसी दुविधा का फायदा उठा रहे हैं. साथ ही वह दाउद से मिलने की बात का दावा कर मोदी के समर्थकों को उनके खिलाफ खड़ा करना चाहते हैं.' 

जुमलेबाज हैं आजम

हुसैन के मुताबिक भारतीय राजनीति में अगर किसी को सबसे पहले जुमलेबाज का खिताब मिलेगा तो वो आजम खान होंगे. हालांकि अब इस 'विशेषण' का इस्तेमाल किसी और नेता के लिए होने लगा है. वह खुद को बयानों और दिखावे के स्तर पर तो मुसलमानों के रहनुमा के तौर पर पेश करते हैं लेकिन उन्होंने मुसलमानों की बेहतरी के लिए कोई भी उल्लेखनीय काम नहीं किया.   

खान भड़काऊ बयान देकर बीजेपी समर्थकों को उकसाने की कोशिश करते हैं. कमलेश तिवारी प्रकरण इसकी मिसाल है

उत्तर प्रदेश सरकार ने वित्त वर्ष 2015-16 में अल्पसंख्यकों के कल्याण और विकास कार्यों के लिए 2,276 करोड़ रुपये का आवंटन किया था. यह मंत्रालय आजम खान के हाथ में है. अभी तक हुए खर्च के बारे में पूछे जाने पर अल्पसंख्यक कल्याण निदेशालय के निदेशक फैजुर्रहमान टाल-मटोल करते रहे. बाद में उन्होंने गोलमोल शब्दोंं में कहा, 'अभी तक जो रकम हमें दी गई है, हमने उसका करीब 80 फीसदी रिलीज कर दिया है.' हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि कुल कितनी रकम जारी की गई.

मुलायम सिंह यादव ने अपने चुनावी भाषणों में सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को आरक्षण देने का वादा किया था. अगर आजम वास्तव में मुस्लिम हितों के पैरोकार होते तो इस मामले में अपनी पार्टी के ऊपर दबाव बना सकते थे, लेकिन सरकार के चार साल पूरे होने को हैं और आजम खान लगातार इस मसले पर चुप हैं.

बीजेपी से बढ़ती करीबी से परेशान

विधानसभा चुनाव करीब आने के साथ ही प्रदेश में सियासत तेजी से बदलने लगी है. आम जुबान में मायावती के शासनकाल का जिक्र होने लगा है. समाजवादी पार्टी विधानसभा चुनाव में बसपा से दो-दो हाथ करने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं है. हसन बताते हैं, 'सपा किसी भी हालत में बसपा को सरकार में आते देखने को तैयार नहीं है. बीजेपी के साथ सीधी टक्कर उसके लिए ज्यादा माकूल स्थिति होगी.' 

उन्होंने कहा, 'मुलायम सिंह यादव  केंद्र के साथ बेहतर संबंधों के पक्षधर हैं ताकि सपा सरकार के बचे हुए कार्यकाल में किसी तरह की प्रशासनिक दिक्कत का सामना नहीं करना पड़े. इस वजह से वह बीजेपी के साथ संबंधों को खराब नहीं करना चाहते जबकि आजम ऐसा होते हुए नहीं देखना चाहते.'

सपा और बीजेपी के बीच बढ़ रही नजदीकी आजम के लिए परेशानी का सबब है. तो क्या खान की इस तरह की बयानबाजी से सपा को मदद मिलती है? एक हद तक हां. आजम खान के तीखे भाजपा विरोधी बयान ध्रुवीकरण की जमीन तैयार करते हैं. इससे भाजपा को विमर्श की दिशा मोड़ने का मौका मिलता है. यह स्थिति सपा औऱ भाजपा दोनों के लिए फायदेमंद है. विशेषकर चुनावी साल में. कमलेश तिवारी प्रकरण इसकी मिसाल है. जब आजम खान के बायन पर पर देश के कई हिस्सों में जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ.

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First published: 12 February 2016, 17:24 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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