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इश्क़ में डूबी अमृता प्रीतम, इमरोज की पीठ पर लिखती रहती थीं 'साहिर'

आकांक्षा अवस्थी | Updated on: 31 August 2018, 14:34 IST

अमृता प्रीतम एक ऐसा नाम जो किसी परिचय का मोहताज़ नहीं. 31 अगस्त को पंजाब में जन्मी अमृता ने साहित्य के क्षेत्र में एक अलग ही मकाम हासिल किया. 100 से ज्यादा किताबें लिखने वाली अमृता आज खुद जाने कितनी ही किताबों, कविताओं और शायरियों का मुख्य विषय है. एक लेखक के तौर पर इससे बड़ी सफलता क्या होगी जब आप दूसरे लेखकों के लिए एक प्रेरणा बन जाएं.

अमृता प्रीतम ने बचपन से ही लिखना शुरू कर दिया था. वो खुद कहती हैं "मेरा सोलहवां साल आज भी मेरे हर वर्ष में शामिल हैं.'' अमृता ने अपने जीवन में जिस तरह से प्रेम को जिया वो उनकी किताबों में बखूबी झलकता है. अमृता अपने जमाने में बहुत अलग सोच रखने वाली महिला थी. उनकी कलम से उनकी ये आजाद सोच आज भी उनकी किताबों में दर्ज है.

 

अमृता का नाम आये और साहिर का जिक्र न हो ये मुमकिन नहीं. साहिर अमृता की पहली मुहब्बत थे जो कभी मुकम्मल न हो सकी. अमृता की साहिर से पहली मुलाक़ात एक मुशायरे के दौरान हुई. अपनी इस मुलाक़ात के बारे में अमृता ने लिखा है, " मुझे नहीं मालूम के साहिर के लफ्जो की जादूगरी थी या उनकी खामोश नजर का कमाल था लेकिन कुछ तो था जिसने मुझे अपनी तरफ खींच लिया. आज जब उस रात को मुड़कर देखती हूं तो ऐसा समझ आता है कि तकदीर ने मेरे दिल में इश्क की बीज डाला जिसे बारिश खी फुहारों ने बढ़ा दिया."

 

साहिर की याद में पड़ी सिगरेट की लत

अमृता ने अपनी जीवनी 'रसीदी टिकट' में लिखा है कि उन्हें सिगरेट की लत साहिर की पी हुई सिगरेट के बट बटोरते बटोरते पड़ गयी. उन्होंने उस दौर का जिक्र करते हुए लिखा है जब साहिर रोजाना उनसे मिलने आया करते थे. साहिर लगातार सिगरेट पीते रहते थे. और उनके जाने के बाद अमृता उनके पिए हुए सिगरेट के बट को उठा कर उनमें से साहिर को महसूस किया करती थी. इसी आदत ने बाद में उन्हें सिगरेट का आदी बना दिया.
सिगरेट को लेकर उनकी लिखी एक कविता...

यह आग की बात है, तूने यह बात सुनाई है
यह जिंदगी की वही सिगरेट है,जो तूने कभी सुलगाई थी
चिंगारी तूने दी थी, यह दिल सदा जलता रहा
वक्त कलम पकड़ कर, कोई हिसाब लिखता रहा
जिंदगी का अब गम नहीं, इस आग को संभाल ले
तेरे हाथ की खेर मांगती हूं, अब और सिगरेट जला ले

 

इमरोज़ ने संभाली अमृता की मोहब्बत
अमृता और साहिर की दास्तान इमरोज़ के बिना कभी पूरी नहीं हो सकती. साहिर के इश्क़ में बुरी तरह डूबी अमृता जीवन के ढलते दिनों में सेहत से भी परेशान रहीं. ऐसे में उन्हें और उनकी साहिर से मोहब्बत को इमरोज़ ने सम्भाला. शायद ये कहना ज्यादा सही होगा कि इमरोज़ ही थे जो उस हाल में अमृता को समझ सके, उन्हें संभाल सके. साहिल से आई दूरियों के बाद अमृता ग़मों में ही डूब गयी और इमरोज अपनी पेंटिंग्स में अमृता के दर्द को रंगते रहे.

 

इमरोज ने एक बार एक वाकया सुनाया कि अमृता जब भी कभी इमरोज के साथ उनके स्कूटर पर बैठ कर कहीं जातीं तो वो उनकी पीठ पर अपनी उंगलियों से एक नाम लिखा करती थी. और वो नाम था साहिर'

First published: 31 August 2018, 9:14 IST
 
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