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क्योंं युवा अखिलेश यादव के राज में बीटेक करके झाड़ू लगाने को मजबूर हैं युवा?

महेंद्र प्रताप सिंह | Updated on: 24 January 2016, 9:21 IST
QUICK PILL
  • उप्र सरकार ने नगरीय निकायों में संविदा पर 35,774 सफाईकर्मियों की भर्ती संबंधी शासनादेश 21 दिसंबर को जारी किया था.
  • इस नौकरी के लिए योग्यता महज पांचवी पास थी लेकिन इसके लिए 255 पीएचडी, 2 लाख 22 हजार से ज्यादा बीटेक, बीएससी, बीकॉम, एमएससी, एमकॉम और एमए डिग्रीधारियों ने भी आवेदन दिया था.

प्रबल शुक्ला ने 2012 में आर्गेनिक कमेस्ट्री मेें पीएचडी की है. हफ्तेभर पहले देवरिया डाकघर में नगर निगम में सफाईकर्मी की नौकरी का आवेदन पत्र जमा हो रहा था.

शुक्ला भी फार्म जमा करने वालों की लाइन में थे. एकाएक युवक हंगामा करने लगे. पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया. शुक्ला इस अफरा-तफरी में फिसल कर अपना एक पैर तुड़वा बैठे. फिलहाल राजधानी लखनऊ के एक नर्सिंग होम में उनका इलाज चल रहा है.

अब इन्हें अपने पैर से ज्यादा घर खर्च की चिंता सता रही है. प्रबल पिछले चार सालों में दर्जनभर से ज्यादा प्रतियोगी परीक्षाएं दे चुके हैं. लेकिन, नौकरी अभी दूर है.

उप्र सरकार ने नगरीय निकायों में संविदा पर 35,774 सफाईकर्मियों की भर्ती संबंधी शासनादेश 21 दिसंबर को जारी किया था

यही हाल लखनऊ के अभिषेक यादव का भी है. कंप्यूटर साइंस में बीटेक अभिषेक अपने लिए 2011 से कोई ढंग की नौकरी नहीं खोज पाए हैं. इन्होंने बताया कि चपरासी बनने के लिए सचिवालय में आवेदन किया था. लेकिन, इंटरव्यू के लिए अब तक बुलावा नहीं आया.

नगर विकास विभाग में सफाईकर्मचारी की नौकरी के लिए भी फार्म भरा था. लेकिन इसकी भी भर्ती स्थगित हो गई है.

यह पूछने पर कि बीटेक के बाद सफाई कर्मी की नौकरी क्यों? अभिषेक बोले, 'नाली साफ करने और सड़क का कूड़ा उठाने में हमें कोई संकोच नहीं. यहां हर माह सैलरी मिलने की गारंटी तो होगी. दूसरे बेरोजगार होने का ताना तो नहीं सुनना पड़ेगा. यह एक-दो नहीं बल्कि हजारों युवाओं की कहानी है.'

सपनों को लगा ग्रहण

शहरों की सफाई व्यवस्था के लिए उप्र सरकार ने नगरीय निकायों में संविदा पर 35,774 सफाईकर्मियों की भर्ती संबंधी शासनादेश 21 दिसंबर को जारी किया था. अधिकतम 50 दिनों में भर्ती प्रक्रिया पूरी होनी थी.

इस छोटी सी नौकरी ने लाखों युवाओं को बड़े-बड़े सपने दिखाए. इस सपने को देखने वालों में पीएचडी, एमबीए, बीटेक, पोस्ट ग्रेजुएट और पॉलीटेक्निक डिप्लोमा वाले छात्र शामिल थे. लेकिन, एकाएक भर्ती रोक दी गई जिससे इनके सपनों पर तुषारापात हो गया.

वोट बैंक की राजनीति, सरकार ने रोकी भर्ती

विवादों के बीच राज्य सरकार ने नगरीय निकायों में 35,774 संविदा पर सफाईकर्मियों की भर्ती प्रक्रिया को स्थगित कर दिया है. हालांकि, भर्ती प्रक्रिया क्यों रोकी गई इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया.

लेकिन, माना जा रहा है कि बाल्मीकि समाज की बढ़ती नाराजगी के बाद सरकार को यह निर्णय लेना पड़ा. मेहतर समाज के प्रतिनिधियों की मांग है कि सफाई कर्मचारियों की भर्ती में मेहतर, जमादार व परंपरागत रूप से सफाई कार्यों में लगी अन्य दलित जातियों की ही भर्ती हो.

उत्तर प्रदेश सफाई मजदूर संयुक्त मोर्चा ने इस मांग को लेकर लखनऊ विधानसभा के समक्ष प्रदर्शन भी किया है. इस तरह का विरोध प्रदर्शन कई अन्य जिला मुख्यालयों में भी हुए.

लेकिन बढ़ते विवादों देखते हुए राज्य सरकार ने संविदा पर सफाईकर्मियों की भर्ती प्रक्रिया को स्थगित कर दिया है

प्रदेश में मेहतर समाज की बड़ी आबादी है. चुनाव के मद्देनजर सरकार इन्हें नाराज नहीं करना चाहती. इसलिए अब हेल्थ मैनुअल के अनुसार नियमित रूप से सफाईकर्मियों की भर्ती की योजना बनाई गई है.

इसकी पुष्टि उप्र सफाई मजदूर संयुक्त मोर्चा के महासचिव श्याम लाल वाल्मीकि और सह संयोजक संजय लाल वाल्मीकि भी करते हैं. ये कहते हैं कि सरकार ने आश्वस्त किया है, भविष्य में सफाई कर्मियों के रिक्त पदों पर स्वच्छकार समाज के ही लोगों की स्थायी भर्ती होगी.

पीएचडी धारक चपरासी बनने को तैयार

इन भर्तियों से पहले उप्र सचिवालय में 10 साल बाद चपरासी और फर्राश की नियुक्तियां शुरू हुई थी. 368 पदों के लिए विज्ञापन निकला. वेतनमान था 5,200-20,200 रुपए प्रतिमाह.

महज 33 दिनों में ही 23 लाख से ज्यादा आवेदन आ गए. इनमें 255 पीएचडी, 2 लाख 22 हजार से ज्यादा बीटेक, बीएससी, बीकॉम, एमएससी, एमकॉम और एमए डिग्रीधारी शामिल थे. जबकि योग्यता थी महज आठवीं पास.

इन पदों पर भर्ती इंटरव्यू से होनी थी. इतनी बड़ी संख्या में आवेदन मिलने के बाद सचिवालय प्रशासन ने साक्षात्कार लेने से ही हाथ खड़ा कर दिया. क्योंकि, 23 लाख से ज्यादा आवेदकों का इंटरव्यू लेने में ही कम से कम चार साल लग जाते.

इन पदों पर भर्ती इंटरव्यू से होनी थी. बड़ी संख्या में आवेदन मिलने के बाद सचिवालय ने साक्षात्कार लेने से ही हाथ खड़ा कर दिया

भर्ती प्रक्रिया स्थगित किए छह माह बीत गए हैं लेकिन अभी तक एक्सपर्ट्स नहीं बता पाए हैं कि आखिर भर्ती कैसे की जाएगी.

हर प्रदेश की यही कहानी

पढ़े-लिखे बेरोजगारों की फौज उप्र में ही चपरासी और सफाई कर्मचारी बनने को बेताब नहीं है. कमोबेश, यही हाल हर प्रदेश का है.

सालभर पहले मध्यप्रदेश में जब व्यापमं ने विभिन्न विभागों में चतुर्थ श्रेणी के 1333 पदों को भरने के लिए परीक्षा आयोजित की तो इसमें चार लाख युवा शामिल हुए. चपरासी बनने के लिए 15 हजार एमकॉम, एमएससी और एमए डिग्रीधारियों ने परीक्षा दी. परीक्षा देने वालों में 62 हजार से ज्यादा ग्रेजुएट थे. इसमें 1400 बीटेक इंजीनियर भी थे.

मध्यप्रदेश में व्यापमं ने विभिन्न विभागों में चतुर्थ श्रेणी के 1333 पदों के लिए चार लाख युवाओं ने आवेदन दिया था

जबकि, इन पदों के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता कक्षा आठ पास थी. उत्तर प्रदेश में लेखपाल के चौदह सौ पदों के लिए सत्ताईस लाख आवेदन आ गए. छत्तीसगढ़ में चपरासी के तीस पदों के लिए पचहत्तर हजार अर्जियां आर्इं. केरल में क्लर्क के साढ़े चार सौ पदों के लिए ढाई लाख लोग लाइन में थे. राजस्थान के कोटा में भी सफाईकर्मियों की भर्ती के लिए डिग्रीधारियों की फौज कतार में खड़ी हो गई थी.

केंद्र सरकार की नौकरियों में भी कमोबेश यही स्थिति है. कर्मचारी चयन आयोग की प्रमुख छह परीक्षाओं में पूरे देश से कम से कम एक करोड़ से ज्यादा युवा हर साल बैठते हैं.

आखिर कैसे लेगें काम

पढ़े-लिखे युवाओं से चपरासी और स्वीपर का काम लेना सबसे बड़ी समस्या है. समाजशास्त्री शिवमूर्ति कहते हैं पीएचडी होल्डर और इंजीनियरिंग ग्रेजुएट चपरासी और सफाई कर्मी बनने के बाद क्या नाली और सड़क साफ करने के लिए झाड़ू उठा सकेगा.

मजबूरी में वह ऐसा करता भी है तो जल्द ही कुंठा का शिकार हो जाएगा. इतने पढ़े-लिखे चपरासी से काम लेने में अफसरों को भी हिचकिचाहट होगी. यही नहीं उच्च शिक्षा प्राप्त लोग जिस तरह कम पढ़े लिखे लोगों के प्रतिस्पर्धी बन रहे हैं, उससे इनका हक भी मारा जाएगा. इसलिए इस खाई को पाटने के लिए भर्ती नियमावली बदलने की जरूरत है.

क्या होगा मोदी के स्टार्ट-अप का

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने का सपना दिखा रहे हैं. वे अमरीका में भारतीयों की कामयाबी पर आत्ममुग्ध हैं.

वहां एक तिहाई स्टार्ट-अप भारतीयों ने ही शुरू किए हैं. इससे प्रेरित होकर वे अपने हर भाषण में भारत में स्टार्ट-अप, स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया की बात करते हैं.

लेकिन, आत्ममुग्धता में जीने वालों को लिए उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में खड़ी शिक्षित बेरोजगारों की फौज ने आईना दिखा दिया है.

स्किल इंडिया के दौर में उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में खड़ी शिक्षित बेरोजगारों की फौज चिंता का विषय है

बात लखनऊ की हो या फिर अमरोहा, देवरिया की. सफाईकर्मी और चपरासी बनने के लिए हर जगह टेक्निकल और नॉन टेक्निकल युवा लाइन लगाए हैं.

लखनऊ में प्लेसमेंट एजेंसी चलाने वाले जीतपाल कहते हैं युवाओं के लिए स्वरोजगार योजनाओं की बात तो खूब होती है लेकिन एक युवा जब स्वरोजगार की सोचता है तो उसे दर्जनों बाधाओं का सामना करना पड़ता है.

स्थिति यह है कि जिस मुद्रा बैंक की सरकार सालभर से माला जप रही है उसका अभी कई जिलों में खाता ही नहीं खुल सका है.

युवाओं को स्वरोजगार के लिए न लोन मिल रहा है न मार्गदर्शन. यही नहीं स्किल इंडिया स्कीम के तहत केंद्रीय लघु एंव सूक्ष्म उद्योग मंत्री कलराज मिश्र हर जिले में रोजगार मेला लगवा रहे हैं. लेकिन, नतीजा ढाक के तीन पात है.

युवाओं को स्वरोजगार के लिए न लोन मिल रहा है न मार्गदर्शन

एनएसएसओ की रिपोर्ट बताती है अकेले उत्तर प्रदेश में ही एक करोड़ बत्तीस लाख बेरोजगार हैं.जाहिर है न चाहते हुए भी बेरोजगारों को सफाई कर्मी बनना ही एक विकल्प और बेबसी है.

जब हमारे अर्थशास्त्री सपना दिखा रहे हैं कि अगले पांच सालों में भारत में 50 करोड़ से ज्यादा की आबादी स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने लगेगी तब युवाओं के बेरोजगारी के ये आंकड़े एक बदनुमा तस्वीर सामने रखते हैं.

जरा कल्पना कीजिए कि एक कंप्यूटर इंजीनियर या पीएचडी जिसके की बोर्ड और माउस होना या जिसे किसी शोध संस्थान में होना चाहिए वह 17 हजार रुपए प्रतिमाह की नौकरी के लिए सड़कों पर झाड़ू लगाता फिरेगा. यह मेकइन इंडिया और डिजिटल इंडिया का एक और चेहरा है.

First published: 24 January 2016, 9:21 IST
 
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