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जन्मदिन विशेष: आखिर क्यों हर राजनीतिक पार्टी आज करना चाहती है डॉ. आंबेडकर पर कब्जा?

आदित्य साहू | Updated on: 14 April 2018, 10:50 IST

14 अप्रैल 1891 के दिन एक ऐसे बालक ने जन्म लिया था, जिसने अपने कार्यों से इतिहास लिख दिया. यह वह दौर था जब देश में छुआ-छूत शीर्ष पर था और ऐसे में दलित समुदाय की महार जाति में पैदा हुए भीमराव आंबेडकर का आगे बढ़ना बेहद कठिन था लेकिन ‘कभी हार नहीं मानूगां’ के संकल्प के साथ उन्होंने सारे कांटे भरे रास्ते को सुगम बना लिया.

पूर्व राष्‍ट्रपति डॉं. शंकर दयाल शर्मा ने एक बार अपने भाषण में कहा था, "समाज के सबसे कमज़ोर व्‍यक्‍ति के लिए स्‍वाभाविक रूप से बाबासाहेब आंबेडकर एक महान उद्धारक, पीड़ा के मुक्‍ति-दाता और बोधि-सत्‍व के रूप में हैं. उनकी गिनती भारतीय समाज के महानतम सुधारकों में की जाएगी."

देश के सर्वोच्‍च सम्‍मान ‘भारत रत्‍न’ से सम्‍मानित, प्रसिद्ध भारतीय विधिवेत्‍ता, सामाजिक न्‍याय के प्रबल पक्षधर, ओजस्‍वी लेखक, यशस्‍वी वक्‍ता, देश के प्रथम विधि एवं न्‍याय मंत्री डॉक्‍टर भीमराव आंबेडकर का जन्‍म 14 अप्रैल, 1891 को मध्‍य प्रदेश के मऊ में हुआ था. रामजी और भीमाबाई की 14वीं संतान भीमराव ने अपने व्‍यक्‍तित्‍व और कर्मों से परिवार और समाज को तो गौरवान्‍वित किया ही, विश्‍व क्षितिज पर संपूर्ण राष्‍ट्र को नई गरिमा प्रदान की.

बाल्‍यकाल में असमानता का दंश झेलने वाले बाबा साहेब ने एक ऐसे समाज की परिकल्‍पना की थी, जहां सब समान हों, ऊंच-नीच का भेद न हो और सभी गरिमापूर्ण जीवन बिता सकें. बाबासाहेब ने अपना सारा जीवन समाज के निर्बल, दलित, उपेक्षित और शोषित वर्गों की खुशहाली और उनके स्‍वाभिमान की रक्षा में लगा दिया. उनका संदेश था- "शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो" बाबासाहेब का मानना था कि अगर ये तीन गुण किसी मनुष्‍य में हैं, तो कोई भी बाधा उसकी राह का रोड़ा नहीं बन सकती.

प्रगतिशील विचारक बड़ौदा के महाराज सयाजी गायकवाङ़ ने भीमराव अांबेडकर को उच्च शिक्षा हेतु तीन साल तक छात्रवृत्ति प्रदान की, किन्तु उनकी शर्त थी की अमेरिका से वापस आने पर दस वर्ष तक बड़ौदा राज्य की सेवा करनी होगी. बाबासाहेब ने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से पहले एमए तथा बाद में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की. ‘भारत का राष्ट्रीय लाभ’ विषय पर उनके इस शोध के कारण उनकी बहुत प्रशंसा हुई. उनकी छात्रवृत्ति एक वर्ष के लिये और बढ़ा दी गई.

चार वर्ष पूर्ण होने पर जब भारत वापस आये तो बड़ौदा में उन्हें उच्च पद दिया गया किन्तु कुछ सामाजिक विडंबना की वजह से उन्हें नौकरी छोड़कर बम्बई जाना पड़ा. बम्बई में वे सीडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए लेकिन वहां भी उन्हें कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ा. इन सबके बावजूद आत्मबल के धनी बाबासाहेब आगे बढ़ते रहे.

उनका दृढ़ विश्वास था कि मन के हारे, हार है, मन के जीते जीत. 1919 में वे पुन: लंदन चले गये. अपने अथक परिश्रम से एमएससी, डीएससी तथा बैरिस्ट्री की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे. 1923 में बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत शुरु की. अनेक कठनाईयों के बावजूद अपने कार्य में निरंतर आगे बढते रहे. एक मुकदमे में उन्होने अपने ठोस तर्कों से अभियुक्त को फांसी की सजा से मुक्त करा दिया था. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया. इसके बाद बाबासाहेब की प्रसिद्धि में चार चांद लग गया.

बाबासाहेब ने वंचित वर्ग को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार दिलाने की जो कालजयी भूमिका निभाई, उसकी अन्‍यत्र मिसाल नहीं मिलती. उन्‍होंने देश के सामाजिक ढांचे को बदलने के लिए संकल्‍पबद्ध प्रयास किए. बाबासाहेब राजनीतिक स्‍वतंत्रता के साथ सामाजिक स्‍वतंत्रता के भी प्रबल पक्षघर थे. उनका कहना था, "जब तक आप सामाजिक स्‍वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते, तब तक कानून चाहे जो भी स्‍वतंत्रता देता हो, वह आपके किसी काम की नहीं है.

वे दलित और पीड़ित वर्ग को समाज और विकास की मुख्‍यधारा से जोड़ने के लिए निरंतर संघर्ष करते रहे. वास्‍तव में बाबासाहेब का चिंतन व्‍यापक था, जिसमें पूरे देश का हित समाहित था. भारत के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, कृषि और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में उनका चिंतन बहुत विस्‍तृत था.

डॉ. आंबेडकर का जन्‍म देहात में हुआ था और वे गांव-देहात के जनजीवन की सोंच और जीवन शैली से भलीभांति परिचित थे. विदेशों में शिक्षा प्राप्‍त करने और बड़ौदा के राजा के यहां उच्‍च पद पर आसीन होने के बावजूद वे गांव की मिट्टी की सोंधी महक भूल नहीं पाए. गांवों में छुआछूत, भेदभाव और आर्थिक पिछड़ेपन की स्‍थिति उन्‍हें हमेशा खलती रही. उनका मानना था कि गांव ही भारतीय जीवन की धुरी है, अत: सुधार की शुरूआत गांवों से ही होनी चाहिए.

डॉ. भीमराव आंबेडकर विधिवेत्‍ता, राजनेता, दार्शनिक और मानवतावादी चिंतक तो थे ही, वे प्रखर अर्थशास्‍त्री भी थे. उन्‍होंने न केवल मौद्रिक प्रबंधन पर, बल्‍कि कर संरचना से लेकर स्‍वदेशी अवधारणा और कृषि व उद्योग जैसे अनेक मुद्दों पर विस्‍तृत लेख लिखे. लंदन स्‍कूल ऑफ इकोनॉंमिक्‍स में अध्‍ययन के दौरान उनके द्वारा लिखित और 1923 में पुस्‍तक के रूप में प्रकाशित शोध-प्रबंध ‘’The Problem of Rupee” आज भी प्रासंगिक है. यह बाबासाहेब की आर्थिक विषयों पर अच्‍छी पकड़ और आर्थिक जगत की दूरदृष्‍टि के साथ मौलिक चिंतन को प्रतिबिम्‍बित करती है.

उनकी मान्‍यता थी कि आर्थिक सुधारों से भेदभाव मुक्‍त समाज का निर्माण संभव है. उनकी इस पुस्‍तक से भारतीय रिज़र्व बैंक की स्‍थापना और कार्यप्रणाली के लिए कई सुझाव लिए गए. विमुद्रीकरण से सम्‍बन्धित भारत सरकार का ऐतिहासिक निर्णय डॉक्‍टर आंबेडकर की आर्थिक अवधारणा के अनुरूप है. उन्‍होंने इस पुस्‍तक में लिखा था, "भ्रष्‍टाचार से बचने के लिए हर दस साल में नोटों को बदलने के जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए." यह उनके ज्ञान और दूरदर्शिता का प्रमाण है कि लगभग सौ साल पहले छात्र-जीवन के दौरान लिखा गया शोध-प्रबंध आज भी अर्थशास्‍त्र का एक महत्‍वपूर्ण दस्‍तावेज़ है.

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डॉ. आंबेडकर को भारतीय संविधान का जनक माना जाता है. उन्‍होंने हिन्‍दू कोड बिल बनाने में बहुत परिश्रम किया, लेकिन उसे काट-छांट कर पारित किया गया. इससे आहत होकर उन्‍होंने विरोध स्‍वरूप विधि मंत्री के पद से इस्‍तीफा दे दिया. उन्‍हीं की वजह से कारखानों में 12-14 घंटे काम करने का नियम बदलकर सिर्फ आठ घंटे कर दिया गया. डॉं. आंबेडकर व्‍यक्‍ति पूजा के विरोधी थे.

डॉं. आंबेडकर स्‍वतंत्रता, समानता और भाईचारे में विश्‍वास रखते थे. बाबासाहेब समाज और देश की प्रगति के लिए महिलाओं की प्रगति को अनिवार्य मानते थे. उन्‍होंने दलित और शोषित वर्गों के साथ महिलाओं की सामाजिक स्‍थिति सुदृढ़ करने पर हमेशा बल दिया.

आज की राजनीति में भीमराव अंबेडकर ही एक मात्र ऐसे नायक हैं, जिन्हें सभी राजनीतिक दलों में उन्हें ‘अपना’ बनाने की होड़ लगी है. यह बात सही है कि अंबेडकर को दलितों का मसीहा माना जाता है, मगर यह भी उतना ही सही है कि उन्होंने ताउम्र सिर्फ दलितों की ही नहीं, बल्कि समाज के सभी शोषित-वंचित वर्गों के अधिकारों की बात की. उनके विचार ऐसे रहे हैं जिसे न तो दलित राजनीति करने वाली पार्टियां खारिज कर पाई हैं और न ही धर्मों की राजनीति करने वाली पार्टियां.

First published: 14 April 2018, 10:37 IST
 
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