Home » इंडिया » Babri Mosque case: Why Indian Muslims are so silent over SC's recent judgment on Advani
 

बाबरी मस्जिद केस: आडवाणी पर कार्रवाई की मुहिम चलाने वाले मुसलमान अब इतने चुप क्यों हैं?

शाहनवाज़ आलम | Updated on: 23 April 2017, 11:28 IST


गुजरात 2002 जनसंहार के बाद जिस तरह नरेंद्र मोदी मुसलमानों के लिए आंख की किरकिरी बन कर उभरे, उससे पहले मुसलमानों की नजर में यह रूतबा बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए आंदोलन चलाने वाले लालकृष्ण आडवाणी को हासिल था. सियासी तौर पर बहुत कम जागरूक मुस्लिम समाज के साथ यह एक त्रासदी रही है कि वह हर दौर में अपने किसी विरोधी छवि वाले नेता के कारण ही राजनीति की समझ बनाता है.

इसलिए जिस तरह आज एक मुसलमान मोदी केंद्रित नजरिए से राजनीति में दोस्तों और दुश्मनों की खानाबंदी करता है ठीक उसी तरह 2002 से पहले वह बाबरी मस्जिद आंदोलन के अगुवा आडवाणी के दोस्तों और विरोधियों के पैमाने पर कम्यूनल और सेक्यूलर का खेमा तय करता था. यही वह वजह है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस की हर बरसी पर होने वाले धरनों और इस मसले पर होने वाले सम्मेलनों में आडवाणी को सजा देने की मांग के ज्ञापन हमेशा से जिसे भी आयोजक जरूरी समझते थे भेजा करते थे.

सत्ता की राजनीति में उसकी यह समझदारी नजरअंदाज नहीं की जा सकती थी. इसीलिए जब पहली बार 1996 में गठबंधन सरकार में भाजपा के किसी नेता के प्रधानमंत्री बनने का अवसर आया तो उसके उभार के लगभग अकेले नायक होने के बावजूद, आडवाणी उस ओहदे के लिए अयोग्य माने गए.

बीते दिनों जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के ढाई दशक बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में आडवाणी, मुरली मनोहर जोषी, उमा भारती समेत 13 नेताओं पर इस अपराध के आरोप में सुनवाई चलाने का निर्देश देते हुए दो साल के अंदर इसपर निर्णय सुनाने का आदेश दिया तब मुस्लिम समाज में इसको लेकर किसी तरह के उत्साह का न दिखना उसके अंदर चल रहे उथल-पुथल पर तवज्जो मांगता है. मसलन, आखिर क्या वजह है कि जिस आडवाणी को मुसलमानों की एक पूरी पीढ़ी जेल जाते हुए देखना चाहती थी उसने इसे बहुत तवज्जो नहीं दिया?


क्या मुसलमानों ने आडवाणी को माफ कर दिया है या उसने मान लिया है कि वो बीती बात थी और गड़े मुर्दे उखड़ने से फिर उसे ही नुकसान होगा? या कहीं ऐसा तो नहीं कि मुसलमान इसे अपने साथ किया जाने वाला न्यायिक मज़ाक मानकर इसे नजरअंदाज कर रहा है कि अगर इंसाफ ही होना होता तो कभी का हो गया होता? या फिर यह ठंडी प्रतिक्रिया उसकी इस रणनीतिक समझदारी से निकली है कि उसे अपनी भावनाओं को बहुत डिप्लोमेटिक तरीके से रखना चाहिए ताकि उसके विरोधी गोलबंद न हों?

 

न्यायिक शिथिलता ज़िम्मेदार?

 

6 दिसम्बर 1992, जिस दिन लाखों की तादाद में अयोध्या पहुंचे कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को तोड़ा था, उस दिन को याद करते हुए फैजाबाद निवासी बुजुर्ग अनीस अहमद कहते हैं कि जिस घटना के लिए पूरा देश जिस आदमी को दोषी मानता हो, जिसके हज़ारों प्रत्यक्ष गवाह रहे हों और जो अपने समय की सबसे बड़ी सच्चाई रही हो उस पर कोई अदालत अगर इतने लम्बे समय बाद यह तय कर पाए कि उन पर आरोपी के तहत मुकदमा चलना चाहिए, तो इससे क्या विपक्षी पार्टी का मनोबल बढ़ेगा? वो कहते हैं कि जिस आदमी को इस अपराध की सजा काटे 20 साल हो जाना चाहिए था उसपर अभी सुनवाई भी शुरू नहीं होना किसी को भी उसे भूल जाने के लिए मजबूर कर दे तो इसमें हैरत क्या है.

तो क्या न्यायिक शिथिलता के कारण खुद मुसलमान इस मामले में दिलचस्पी कम ले रहे हैं? आतंकवाद के नाम पर आरोपी बनाए जाने वाले मुसलमानों की अदालती में पैरवी करने वाले संगठन रिहाई मंच के अध्यक्ष एडवोकेट मोहम्मद शुऐब कहते हैं ‘मुसलमान इस नतीजे तक पहुंच चुका है कि अदालतों की दिलचस्पी उसके साथ न्याय करने में नहीं है और इसीलिए उसके हितों से जुड़े मामलों में ज्यादा देरी होती है.’

वे सवाल करते हैं कि एक आम मुसलमान को यह सच्चाई तो परेशान करती ही है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप हुए मुम्बई विस्फोटों के आरोपी तो फांसी पर लटका दिए गए लेकिन मूल घटना के आरोपियों पर अदालत 25 साल बाद यह तय कर पा रही है कि किस-किस पर मुकदमा चलना चाहिए.

इस आधार पर हम कह सकते हैं कि मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा अदालतों को सरकार और मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक मानसिकता से प्रभावित मानने लगा है. ऐसी स्थिति में ऐसे किसी भी अदालती निर्देश को वह अंतिम तौर पर अपने खिलाफ चले जाना वाला मानकर उस पर किसी तरह की फौरी खुशी का इजहार नहीं करना चाहता. शुऐब आगे कहते हैं कि बाबरी मस्जिद विवाद पर 30 सितम्बर 2010 को आए फैसले ने अदालतों के प्रति मुसलमानों के नजरिए को काफी हद तक बदल दिया है.

उन्हें लगने लगा है कि जिन मामलों में उनका पक्ष निर्विवाद तौर पर प्रतिवादी से मजबूत है, उसमें भी अदालत उसके साथ अन्यायिक और गैरपेशेवराना व्यवहार कर सकती है. मुसलमान अपनी आंतरिक बहसों में अयोध्या फैसले को एक मजाक की तरह देखते हैं कि कैसे किसी अदालत ने मिल्कियत के विवाद के मुकदमे में बंटवारे का फैसला सुना दिया.

आजमगढ़ के रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और आंतकवाद के आरोपों से बरी हुए बेगुनाहों पर आयी ‘बेगुनाह दहशतगर्द’ किताब के लेखक मसीहुद्दीन संजरी कहते हैं ‘उस फैसले ने अयोध्या विवाद पर आगे वाने वाले फैसलों के प्रति एक तरह से मुसलमानों में यह धारणा बैठा दी कि उन्हें अदालतों से अब बहुत उम्मीद नहीं करनी चाहिए.’


वे बताते हैं कि उस फैसले से जितना ज्यादा मुसलमान स्तब्ध थे उससे कहीं ज्यादा हिंदुत्ववादी तत्व स्तब्ध थे. क्योंकि फैसला आने से एक हफ्ते पहले से ही उनके द्वारा मोबाइल पर ऐसे मैसेज भेजे जा रहे थे जिसमें फैसला उनके खिलाफ आने पर मुसलमानों के खिलाफ हिंसा करने का आह्वान था. जाहिर वे आश्वस्त थे कि फैसला उनके खिलाफ आएगा. इसलिए उस फैसले के प्रति मुसलमानों में छले जाने का बोध बहुत गहरे तक है.

 

न्यायपालिका कटघरे में?


दरअसल किसी अन्य तरह के मुकदमों से अलग बाबरी मस्जिद मामले में ऐतिहासिक तौर पर मुसलमानों का अनुभव न्यायपालिका से बहुत सकारात्मक नहीं रहा है. जिसपर 30 सितम्बर 2010 के फैसले को वह निर्णायक मुहर मानता है जिसकी शुरूआत 1986 में ताला खोलने के फैसले से हुई थी. तब फैजाबाद के जिला जज केएम पांडेय ने ताला खोलने का आदेश दिया था जिसपर हैरतअंगेज़ तरीके से आधे घंटे के अंदर ही अमल ही नहीं किया गया था बल्कि सुबह में एक घंटे का कार्यक्रम रिले करने वाले दूरदर्शन ने सीधा प्रसारण भी किया था.

फैजाबाद के सामाजिक कार्यकर्ता गुफरान सिद्दीकी सवाल उठाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह 1992 में सांकेतिक कारसेवा की अनुमति दी थी उसी से उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठ गए थे. क्योंकि पांच महीने पहले ही जुलाई में कारसेवकों ने मस्जिद के करीब चबूतरा बना दिया था जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को यथास्थिति न बनाए रख पाने के लिए नोटिस भी दिया था.

वो कहते हैं कि जाहिर है सुप्रीम कोर्ट के पास पर्याप्त वजह थी कि वो कारसेवा की अनुमति नहीं देती. लेकिन बावजूद इसके ऐसा किया जाना क्या साबित करता है? वे आगे पूछते हैं ‘बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायधीश एमएन वेंकटचलैया ने कल्याण सिंह और विजय राजे सिंधिया को बाबरी मस्जिद की सुरक्षा करने की लिखित शपथ के बावजूद इससे मुकरने के खिलाफ अदालत की अवमानना का नोटिस तो दिया लेकिन जब वेंकटचलेया के नेतृत्व वाली पांच सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला सुनाया तो उसमें भी कल्याण सिंह को सिर्फ एक दिन की सांकेतिक सजा सुनाई और वो भी जुलाई में कारसेवकों द्वारा चबूतरा बनाने से न रोक पाने के लिए.’

गुफरान सिद्दीकी कहते हैं ‘आज अगर सुप्रीम कोर्ट बाबरी मस्जिद ध्वंस के अपराधियों को सजा देने में सचमुच गम्भीर हो तब भी इस मामले में मुसलमान अदालतों से इतना धोखा खा चुका है कि इसपर एकबारगी वो यकीन नहीं कर पाएगा. ज़ाहिर है, इस मुकदमें में अब सिर्फ आडवाणी और उनके सह आरोपी ही कटघरे में नहीं हैं बल्कि खुद न्यायपालिका भी कटघरे में है.

 

First published: 23 April 2017, 11:28 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी