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मध्य प्रदेश: सत्ता के सामने गौर

शैलेंद्र तिवारी | Updated on: 28 July 2016, 8:22 IST
(फाइल फोटो)

ये सरकार कर्ज लेकर घी पी रही है... वित्तीय संकट में सरकार है और फिर भी मंत्रियों के ऊपर 15 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं. सरकार के खर्चे अनियंत्रित हैं.' ये आरोप मध्यप्रदेश विधानसभा के भीतर और बीजेपी सरकार पर लग रहे हैं. आरोप लगाने वाला कोई कांग्रेसी नहीं हैं, बल्कि कल तक विधानसभा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बगल वाली सीट पर बैठने वाले बाबूलाल गौर के हैं, जो इन दिनों मंत्री पद से हटाए जाने के बाद शिवराज से पांच लाइन छोड़कर पीछे की सीट पर बैठ रहे हैं.

मंत्रिमंडल में नंबर टू की हैसियत और गृह विभाग की जिम्मा संभाल रहे गौर अचानक से बेपटरी हो गए हैं. 86 साल के बाबूलाल गौर को भाजपा ने 75 साल के फॉर्मूले पर मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. यह बात गौर को नागवार गुजरी है.

उनका अपना तर्क है. बाबूलाल गौर कहते हैं, 'आदमी के काम करने की क्षमता को देखना चाहिए या फिर उम्र को. मैं पूरी तरह से फिट हूं. दूसरे विधायकों और मंत्रियों की तुलना में ज्यादा दौरे कर रहा हूं. काम संभाल रहा हूं. फिर तकलीफ क्या है? कई मंत्री कम उम्र के हैं, लेकिन बिलकुल भी काम नहीं कर पा रहे हैं.'

गौर तो फॉर्मूले को ही गलत करार देते हैं. कहते हैं, 'भला यह कैसा फॉर्मूला है.' आप आदमी की काम करने की क्षमता की तुलना नहीं करना चाहते. उनको सरकार से इस तरह से बेखदल किए जाने पर भी ऐतराज है. खुलकर बोलते हैं, 'भाई जब टिकट दिया था, तभी मना कर देते. बीच रास्ते में क्यों धक्का मारकर निकाल दिया. यह तो ठीक ऐसा है कि कोई रेल में सफर करने के लिए टिकट ले और बीच रास्ते में उसे धक्का मारकर ट्रेन से उतार दिया जाए.'

बाबूलाल गौर के विधानसभा में हमले का हाल यह है कि सीएम शिवराज तक उनका सामना करने की हिम्मत नहीं दिखा रहे हैं. विधानसभा के भीतर सीएम तभी नजर आए, जब गौर दिल्ली किसी काम से चले गए. शिवराज को भी मालूम है कि उनके सामने गौर ज्यादा उग्र हो सकते हैं. क्योंकि गौर सरेआम बोल चुके हैं कि जब पार्टी ने इतने दिनों तक ढोया है तो दो साल और ढो लेते और उसके बाद टिकट नहीं देते. गौर का दो साल से मतलब सरकार के दो साल पूरे होने से हैं.

गौर शिवराज के विरोधियों या कहें कि बीजेपी के एक असंतुष्ट वर्ग से भी अपनी सांठ-गांठ बनाने में लगे हुए हैं. दो दिन पहले वह विदिशा से पूर्व वित्तमंत्री राघवजी से भी मिलने पहुंच गए. राघवजी कभी शिवराज सरकार के सबसे मजबूत स्तंभ हुआ करते थे. पेशे से सीए राघवजी को अनैतिक संबंधों की सीडी सार्वजनिक होने के बाद सरकार से बाहर का रास्ता दिखाया गया था. जेल भी गए और बाहर भी आ गए हैं, लेकिन राजनीतिक वनवास जारी है.

राघवजी से मुलाकात के बाद गौर ने एक ही बयान दिया कि घायल का दर्द तो सिर्फ घायल ही जान सकता है. मतलब पूछने पर बोले कि जो समझदार हैं, वह समझ गए और जो नहीं समझ पाए, वो नासमझ हैं. गौर का मतलब साफ था कि राघवजी को जानबूझकर निपटाया गया है और उनके साथ भी ऐसा ही किया गया है.

86 साल के बाबूलाल गौर बीजेपी में कमजोर किरदार नहीं है. 1974 में गोविंदपुरा सीट से उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. उसके बाद उस सीट से कभी कोई दूसरा जीत नहीं पाया. गौर लगातार जीतते रहे और बीजेपी के अंदर एक नई ताकत के तौर पर उभरते रहे.

1990 में पहली बार राज्य सरकार में मंत्री बने. 1992 के चुनाव में कांग्रेस दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में जीत गई और बीजेपी विपक्ष की भूमिका में आ गई. 2002 में विपक्ष के नेता का जिम्मा मिला और फिर उमा भारती सरकार में मंत्री बने. उमा भारती जब तिरंगा यात्रा लेकर निकलीं तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी बाबूलाल गौर के खाते में आई.

मुख्यमंत्री के तौर पर गौर एक छुपे हुए रुस्तम के तौर पर सामने आए. उमा भारती से अंदरूनी समझौता था कि जब भी वह वापस आएंगी, गौर उनके लिए कुर्सी छोड़ देंगे. लेकिन गौर को श्यामला हिल्स ऐसी रास आई कि उन्होंने छोड़ने से इंकार कर दिया. बीजेपी के अंदर नया विवाद खड़ा हो गया. उमा भारती अलग नाराज हो गईं.

इस संकट के दौर में बीच का रास्ता निकाला गया और करीब एक साल बाद बाबूलाल गौर की विदाई कर दी गई. नए मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज सिंह आए. गौर ने उनके मंत्रिमंडल में बतौर मंत्री शामिल होने की जिद पकड़ ली और आखिर में मंत्री बन गए. तब से लगातार मंत्री रहे, कई विभाग संभाले और उसके साथ विवादों का भी साया उनके साथ जुड़ा रहा.

अब गौर की निगाहें उत्तर प्रदेश पर हैं. उनकी चाहत है कि बीजेपी उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाकर भेज दे. विवादों के बयान की वजह भी यही है. विधानसभा में हास-परिहास में वह इस बात को स्वीकार भी कर चुके हैं कि उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बना दिया जाए तो वह चुपचाप यहां से चले जाएंगे. गौर असल में यादव हैं और उन्हें मालूम है कि बीजेपी को उनकी जरूरत सिर्फ उत्तर प्रदेश चुनावों तक है.

ऐसे में वह पार्टी को एक ही फॉर्मूला बताने में जुटे हुए हैं कि अगर उन्हें उत्तर प्रदेश भेज दिया जाए तो वहां पर पार्टी के हित में संदेश जाएगा. भला हो जाएगा तो वह चुप्पी भी अख्तियार कर लेंगे. नहीं तो वह खुलेआम बोल ही चुके हैं कि आगे-अागे देखिए होता है क्या?

First published: 28 July 2016, 8:22 IST
 
शैलेंद्र तिवारी @catchhindi

लेखक पत्रिका मध्यप्रदेश के स्टेट ब्यूरो चीफ हैं.

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