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बादल बनाम बादल: चाचा-भतीजे के बीच पंजाब में पैंतरेबाजी

राजीव खन्ना | Updated on: 11 April 2016, 8:36 IST
QUICK PILL
  • मनप्रीत बादल साल 2014 के संसदीय चुनाव में भटिंडा सीट पर प्रकाश सिंह बादल की पुत्रवधु और केंद्र में मंत्री हरसिमरत कौर से काफी कम अंतर से हारे थे.
  • इस बार कांग्रेस पार्टी ने मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के गढ़ रहे \r\nलाम्बी विधानसभा क्षेत्र से उन्हें मैदान में उतार कर बादल को \r\nउनके गढ़ में चुनौती दे दी है.

आगामी विधानसभा चुनावों में मौके का पहले फायदा उठाते हुए पंजाब राज्य कांग्रेस ने राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ उनके विधानसभा क्षेत्र लाम्बी से उनके ही भतीजे मनप्रीत बादल को चुनाव में उतारने का फैसला किया है. मनप्रीत ने खुद ही इस बार अपने चाचा के खिलाफ चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त की थी.

इस चुनाव के दौरान मनप्रीत पहले ऐसे उम्मीदवार हैं जिनके नाम की घोषणा की गई है. हालांकि उनके नाम को अभी भी पार्टी आलाकमान से आधिकारिक मुहर लगने का इंतजार है.

इसी के साथ लाम्बी बादल परिवार के सदस्यों के बीच होने वाली हाई प्रोफाइल चुनावी लड़ाई का साक्षी बनने को तैयार है. हालांकि बीते संसदीय चुनावों में मनप्रीत भटिंडा सीट पर प्रकाश सिंह बादल की पुत्रवधु हरसिमरत कौर से काफी कम अंतर से हारे थे.

मनप्रीत को चुनाव में उतारकर कांग्रेस इस चुनावी मुकाबले को मुख्यमंत्री और उनके परिवार के गढ़ में ले जाने में सफल रही है.

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मनप्रीत ने हाल ही में अपनी पीपल्स पार्टी आॅफ पंजाब (पीपीपी) का विलय कांग्रेस में कर दिया था. उन्होंने वर्ष 2011 में राज्य के वित्तमंत्री के पद से इस्तीफा दिया था और उन्हें शिरोमणि अकाली दल से निष्काषित कर दिया गया था. इसके बाद मनप्रीत ने पीपीपी के नाम से अपनी पार्टी बनाई थी.

मनप्रीत का अपने चाचा प्रकाश सिंह बादल और उनके पुत्र सुखबीर बादल, जो राज्य के उपमुख्यमंत्री भी हैं, को छोड़ना वस्तुतः अकाली दल के विभाजन का भी कारण बना.

मनप्रीत का अपने चाचा प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर बादल को छोड़ना अकाली दल के विभाजन का भी कारण बना

मनप्रीत का कहना है कि उस समय वे राज्य के वित्तमंत्री के रूप में राज्य सरकार के केंद्र सरकार से ऋण माफी को लेकर बातचीत करने को लेकर नाराज थे और इसी बात पर मतभेद पैदा हुए. इसके बाद उनके ऊपर अनुशासनहीनता के आरोप लगे जिनके चलते आखिरकार उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया.

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक सुखबीर उनमें एक प्रतिद्वंदी देखने लगे थे और वे पार्टी कार्यकर्ताओं के अलावा आम जनता के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता को लेकर चिंतित थे.

पीपीपी ने 2012 के विधानसभा चुनावों में सीपीआई (एम), सीपीआई और अकाली दल (लोंगोवाल) को साथ लेकर बनाए सांझा मोर्चा के तहत चुनाव लड़ा था जिसने मनप्रीत को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया था. हालांकि यह मोर्चा चुनाव में खाता खोलने में असफल रहा लेकिन इसके बावजूद यह कुल पड़े मतों का 6 प्रतिशत पाने में सफल रहा.

उनके विरोधी उन्हें चुका हुआ बताते हैं लेकिन अकालियों के खिलाफ उनका आक्रामक रवैया उन्हें मतदाताओं के बीच खासा लोकप्रिय बनाता है.

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अकाली नेतृत्व का कहना है कि उन्होंने मनप्रीत को 1995, 1997 और 2007 में अपने मजबूत गढ़ गिद्दड़बाहा से जितवाकर विधायक बनवाया लेकिन इसके बावजूद उन्होंने पीठ दिखाई और पार्टी उन्हें अक्सर इस बात के चलते अहसानफरामोश भी कहती है.

मनप्रीत का कांग्रेस में शामिल होना दोनों के लिये ही फायदेमंद रहा है. कांग्रेस को बैठे-बिठाये विरोधी खेमे का एक साफ सुथरी छवि वाला अनुभवी राजनीतिज्ञ मिल गया और मनप्रीत को प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे सुखबीर के खिलाफ अपनी जंग को जारी रखने के लिये एक बहुत जरूरी मंच मिल गया.

मनप्रीत का कांग्रेस में शामिल होना दोनों के लिये ही फायदेमंद रहा है

पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मनप्रीत के लाम्बी विधानसभा क्षेत्र से प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ चुनाव लड़ने के फैसले का स्वागत करते हुए इस फैसले का खुलकर समर्थन किया है. उन्होंने कहा है कि वे उन्हें न सिर्फ पूरा समर्थन देंगे बल्कि यह भी सुनिश्चित करेंगे कि वे एक रिकार्ड अंतर से यह सीट जीतें.

लाम्बी से मनप्रीत के नाम का समर्थन करते हुए अमरिंदर ने कहा है कि वे 2017 में आयोजित होने वाले चुनावों के लिये पार्टी आलाकमान के सामने उनके नाम की सिफारिश करेंगे.

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अमरिंदर का दावा है कि मनप्रीत का यह निर्णय समूची पार्टी के भीतर के सकारात्मक माहौल को दर्शाता है और साथ ही उनका कहना है कि उनके इस निर्णय से आने वाले समय में राज्यभर में फैले पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मनोबल काफी बढ़ेगा.

अपने चाचा के खिलाफ चुनाव लड़ने के मनप्रीत के फैसले को लेकर उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हरसिमरत कौर ने उन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि अगर वे लाम्बी से चुनाव लड़ते हैं तो उन्हें भारी अंतर से हार का सामना करना पड़ेगा और उनकी जमानत तक जब्त हो जाएगी.

हरसिमरत के मुताबिक चार राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करने वाले मनप्रीत को लोकसभा चुनावों में जनता पहले ही खारिज कर चुकी है.

यहां तक कि उन्होंने कुछ दिन पहले तो यहां तक कहा था कि मनप्रीत की पीपीपी हमेशा से कांग्रेस की ‘बी’ टीम थी और इस विलय ने इस बात को पुष्ट कर दिया है कि मनप्रीत हमेशा से एक कांग्रेसी था.

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जानकारों का मानना है कि कांग्रेस द्वारा प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ मैदान में मनप्रीत को उतारना एक अच्छा कदम होगा. राजनीतिक विचारक नलिन आचार्य कहते हैं, ‘‘चूंकि दोनों एक ही परिवार से आते हैं और ऐसे में साफ छवि वाले मनप्रीत को राज्य स्तर पर भारी सत्ता विरोधी लहर से जूझ रहे अपने चाचा के सामने चुनाव लड़ते देखना काफी रोचक होगा. इस सीट पर जीत सुनिश्चित करने के लिये अकालियों को एड़ी-चोटी का जोर लगाना होगा.’’

लुधियाना के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘‘प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ मनप्रीत को चुनावी मैदान में उतारकर कांग्रेस यह संदेश देने में सफल रहेगी कि वह इस लड़ाई को सीधे उनके किले में लड़ने में जा रही है. इस वजह से बादल परिवार को अपना अधिकतर समय इस निर्वाचन क्षेत्र में देना पड़ेगा.”

इस लड़ाई का एक कोण आना अभी बाकी है. यह देखना दिलचस्प होगा कि आम आदमी पार्टी इस सीट से किसे अपना उम्मीदवार चुनती है. खबर है कि इससे पहले पार्टी के सांसद भगवंत मान सुखबीर बादल के खिलाफ चुनाव लड़ने की मंशा जाहिर कर चुके हैं. इतना तय है कि आने वाले समय में लाम्बी विधानसभा क्षेत्र एक हाई-प्रोफाइल चुनावी रण का साक्षी बनने जा रहा है.

First published: 11 April 2016, 8:36 IST
 
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