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'गांधी के भारत की मैं हर बात समझ पाता था, 20-22 सालों में यहां की जबान बदल गई'

तारेंद्र किशोर | Updated on: 7 February 2016, 9:41 IST
QUICK PILL
छह फरवरी सीमांत गांधी बादशाह खान की जन्मतिथि है. बंटवारे के बाद महात्मा गांधी के जन्मशती वर्ष 1969 में वो पहली बार भारत आए. इस यात्रा में वो बिहार भी गए थे. पेश है उससे जुड़ा एक संस्मरण.

भारत रत्न खान अब्दुल गफ्फार खान (बादशाह खान) सालों बाद तब चर्चा में आए जब उनके नाम पर बनी एक पाकिस्तानी यूनिवर्सिटी पर आतंकियों ने हमला कर दिया. हमले में कई लोग मारे गये. हमलावरों ने इस कुकत्य के लिए फ्रंटियर गांधी कहे जाने वाले बादशाह खान की पुण्यतिथि को ही चुना था. उनकी मृत्यु 97 वर्ष की आयु में 20 जनवरी, 1988 को हुई थी.

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बादशाह खान भारत के विभाजन के खिलाफ थे लेकिन उनके पास इसे स्वीकार करने का अलावा कोई विकल्प नहीं था. आज़ादी के बाद वो पहली बार महात्मा गांधी के जन्म शताब्दी वर्ष 1969 में भारत आए.  इस वृत्तचित्र में आप देख सकते हैं कि एक बूढ़ा आदमी हवाईजहाज से अपनी छोटी सी सफेद पोटली लिए उतर रहा है और भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण उनकी आगवानी करते दिख रहे हैं.

छह फ़रवरी 1890 को अब पाकिस्तान में स्थित ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के चारसद्दा ज़िले में जन्मे बादशाह खान महात्मा गांधी के पक्के अनुयायी थे. उन्होंने गांधीवादी तरीके से आज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए खुदाई खिदमतगार नामक संगठन बनाया था. जिन्हें लाल कुर्ती वाला भी कहा गया.

1969 में अपनी भारत यात्रा में वो सुरक्षा संबंधी सलाहों को नज़रअंदाज करते हुए पूरे देश में घूमे और लोगों से मिले. गांधी शताब्दी वर्ष होने के कारण हर जगह जलसों का आयोजन हो रहा था.

जब मैं गांधी के भारत में था तब मैं यहां की हर बात समझ पाता...अब यहां की जबान बदल गई है: बादशाह खान

बादशाह खान देश भर में लोगों से मिलते-जुलते बिहार के मुजफ्फरपुर पहुंचे. उनके उस दौरे के चश्मदीद क़ैसर शमीम बताते हैं, "वो रमजान का महीना था. खान साहब रोजे से थे. शाम को इफ्तार करने और नमाज़ पढ़ने के बाद वो बैठे हुए थे. तभी हम कई नौजवान उनसे मिलने जा पहुंचे."

लेकिन उस मुलाकात में कुछ ऐसा हुआ जिसने बादशाह खान समेत सभी को झकझोर दिया.

एकेडमीशियन और सेंट्रल वक्फ कौंसिल के पूर्व सचिव क़ैसर शमीम बताते हैं, "बातचीत के दौरान कुछ नौजवानों की बात खान साहब पूरी तरह समझ नहीं पा रहे थे." 

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शमीम बताते हैं कि जब एक नौजवान ने कुछ पूछा तो खान साहब बोले, "जब मैं गांधी के भारत में था और उस वक्त बिहार आता था तब मैं यहां की हर बात समझ पाता था और अपनी बात कह पाता था. लेकिन पिछले 20-22 सालों में यहां की जबान इतनी बदल गई है कि मैं समझ नहीं पाया."

शमीम बताते हैं, "तब मैंने खान साहब से कहा कि यहां एक ऐसी जबान बनाई गई है जो या तो आकाशवाणी में सुनाई पड़ती है या फिर सरकारी जलसों में. इस जबान का आम जबान से कोई ताल्लुक नहीं है. सरकारी तौर पर एक नकली भाषा लादने की कोशिश की जा रही है, ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?"  

शमीम याद करते हैं, तब उन्होंने मेरी आंखों में देखते हुए कहा, "जद्दोजहद करो, जद्दोजहद करो, जद्दोजहद करो."

'जब पैगंबर पर पत्थर मारे जा रहे थे तो उन्होंने जवाब नहीं दिया, कहा कि मैं सब्र कर रहा हूं. यह भी तो सत्याग्रह था'

शमीम बताते हैं, "उन्होंने तीन बार यह बात कही. मुझे ऐसा लगा कि मेरे जिस्म में बिजली सी भर गई हो. मैं उस कैफियत को आज तक नहीं भूला और आज भी ये वाकया याद करके मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं."

बादशाह भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न पाने वाले पहले और अब तक के आख़िरी पाकिस्तानी हैं. राजीव गांधी की सरकार ने उन्हें 1987 में यह सम्मान दिया था. 

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साल 2011 में भारत में दोबारा खुदाई खिदमतगार की शुरुआत करने वाले फैसल खान उनसे जुड़ा एक वाकया सुनाते हैं.

फैसल खान कहते हैं,  "जब खान अब्दुल गफ़्फार खान ने सत्याग्रह की बात की तो लोगों ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि देखिए ये गांधी के रास्ते पर चल निकले हैं. तब उन्होंने जवाब दिया कि जब पैगंबर मोहम्मद पर मदीना से 100 किलोमीटर दूर एक गांव ताईफ में पत्थर मारे जा रहे थे तो उन्होंने जवाब नहीं दिया और कहा कि मैं सब्र कर रहा हूं. यह भी तो सत्याग्रह था."

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First published: 7 February 2016, 9:41 IST
 
तारेंद्र किशोर @catchhindi

दिल्ली स्थित स्वतंत्र पत्रकार

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